Dehradun: क्लाइमेट चेंज पर बोलीं राष्ट्रपति- पर्यावरण संरक्षण में इस्तेमाल हो जनजातीय समाज का संचित ज्ञान
राष्ट्रपति ने कहा कि विकास रथ के दो पहिये होते हैं, परंपरा और आधुनिकता। विशेष प्रकार की आधुनिकता के मूल में प्रकृति का शोषण है। इस प्रक्रिया में पारंपरिक ज्ञान को उपेक्षित किया जाता है, जबकि जनजातीय समाज ने प्रकृति के नियमों को अपने जीवन का आधार बनाया है।
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जनजातीय समाज के सदियों से संचित ज्ञान का उपयोग पर्यावरण को बेहतर बनाने में किया जाए। उनकी संतुलित जीवन शैली के आदर्शों से पुन: सीखें और विकास यात्रा में बराबर का भागीदार बनाएं।
उपरोक्त बातें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी के दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए कहीं। उन्होंने वन संपदा के दोहन की ब्रिटिश मानसिकता से मुक्त होने और जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर पाठ्यक्रम में यथोचित संशोधन पर विचार करने को कहा। कहा, विश्व के कई भागों में वन संसाधनों की क्षति बहुत तेजी से हुई है। वनों का विनाश किया जाना एक तरह से मानवता का विनाश करना है।
कहा, विकास रथ के दो पहिये होते हैं, परंपरा और आधुनिकता। विशेष प्रकार की आधुनिकता के मूल में प्रकृति का शोषण है। इस प्रक्रिया में पारंपरिक ज्ञान को उपेक्षित किया जाता है, जबकि जनजातीय समाज ने प्रकृति के नियमों को अपने जीवन का आधार बनाया है। उनकी जीवन शैली मुख्यत: प्रकृति पर आधारित है। इस समाज के लोग प्रकृति का संरक्षण भी करते है। वहीं कुछ लोगों ने जनजातीय समुदाय और उनके ज्ञान भंडार को रूढ़िवादी मान लिया है।
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राष्ट्रपति ने कहा, जलवायु की इस आपातकालीन स्थिति को देखते हुए प्रशिक्षार्थियों के पाठ्यक्रम में यथोचित संशोधन करने पर विचार करे। कहा, पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण एवं जंगलों की महत्ता के बारे कहा कि जंगलों के महत्व को जान-बूझकर भुलाने की गलती मानव समाज कर रहा है। हम यह भूलते जा रहे हैं कि वन हमारे लिए जीवन दाता हैं। यथार्थ यह है कि जंगलों ने ही धरती पर जीवन को बचा रखा है।
कहा कि क्लाइमेट चेंज की गंभीर चुनौती विश्व समुदाय के सामने है। हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से मुक्त होने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मौलिक अधिकार का दर्जा दिया है। उन्होंने प्रशिक्षण प्राप्त अफसरों से कहा, भारतीय वन सेवा के पी. श्रीनिवास, संजय कुमार सिंह, एस. मणिकन्दन जैसे अधिकारियों ने लाइन ऑफ ड्यूटी में अपने प्राण न्योछावर किए।
कहा, और भी ऐसे बहुत से अधिकारी देश को दिए हैं, जिन्होंने पर्यावरण के लिए अतुलनीय कार्य किए हैं। उन सभी को आप अपना रोल मॉडल और मेंटर बनाएं एवं उनके दिखाए आदर्शों पर आगे बढ़ें। उन्होंने विज्ञान एवं तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस द्वारा संचालित उपकरणों से भारत की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप समाधान विकसित करने की आवश्यकता बताई। उधर, अकादमी से 101 प्रशिक्षु वन सेवा अधिकारी पास आउट हुए। इनमें 99 भारतीय और दो मित्र देश भूटान के अधिकारी हैं।
पशु क्रूरता पर जताया दुख
राष्ट्रपति ने कहा, 1875 से 1925 तक की अवधि में 80 हजार से अधिक बाघों, डेढ़ लाख से अधिक तेंदुओं और दो लाख से अधिक भेड़ियों का शिकार लोगों को प्रलोभन देकर कराया गया। जब वे ऐसे म्यूजियम में जाती हैं, जहां पशुओं की खाल या कटे सिर को दीवारों पर सजाया गया है, तो ऐसा लगता है कि वह प्रदर्शन मानव सभ्यता के पतन की कहानी कह रहे हैं।
महिला अधिकारियों को दी विशेष बधाई
राष्ट्रपति ने 10 महिला अधिकारियों को बधाई दी। कहा, वे समाज के प्रगतिशील बदलाव की प्रतीक हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि आने वाले समय में महिला अधिकारियों की संख्या और भी बढ़ेगी।
‘जनजातीय लोगों का अर्जित करें स्नेह और विश्वास’
राष्ट्रपति ने अफसरों से अपील की कि वे जब अपने कार्यक्षेत्र में जाएं तो वहां के जनजातीय लोगों के बीच समय बिताएं। उनका स्नेह एवं विश्वास अर्जित करें। वहां के समाज की अच्छी आदतों एवं जीवन शैली से सीखें और उनका प्रचार-प्रसार भी करें। उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता के मानकों में सुधार के लिए कार्य करें। आपका कार्य ऐसा हो जो उस क्षेत्र के बच्चों को वन सेवा के क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित करे।