बदहाल हो गई दून की एतिहासिक पहचान, घंटाघर बना शौचालय
जिस एतिहासिक घंटाघर को देहरादून की शान कहा जाता है वह अब शौचालय में तब्दील हो चुका है। चौंकिए नहीं, यह बिल्कुल सच है। सड़क किनारे रात काटने वाले कई लोग घंटाघर के पार्क को शौचालय की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। बदहाली के चरम पर पहुंच चुका यह वही घंटाघर है जिसकी नींव सरोजिनी नायडू ने रखी थी और उद्घाटन लालबहादुर शास्त्री ने किया था।
बदहाली का आलम यह है कि घंटाघर की छत पर पौधे और घास उग आई है तो जड़ों को चूहों ने बिल बनाकर खोखला कर दिया है। क्लॉक टावर की सभी घड़ियां अर्से से बंद पड़ी हैं। बुनियाद कमजोर हो गई है और रेलिंग टूटी पड़ी है। छोटे से पार्क में शराब की टूटी बोतलें, मानव मल और जूठन भरी पॉलीथिन बिखरी रहती है।
नगर निगम ने इस ओर से आंखें मूंद रखी हैं। घंटाघर के रखरखाव की पूरी जिम्मेदारी नगर निगम की है। इस एतिहासिक इमारत की हर ईंट चीख-चीख कर बदहाली की कहानी सुना रही है, लेकिन न किसी को कुछ दिखाता है और न किसी ने कुछ करने की कोशिश की।
लंबे समय से जीर्णोद्धार न होने से इमारत जगह-जगह से टूट गई है। घंटाघर चौराहे से मंत्रियों से लेकर नेता और अधिकारी रोज गुजरते हैं, लेकिन किसी को कुछ खराबी नजर नहीं आती। साल में एक-दो बार जब किसी बड़े नेता का राजधानी में आगमन होता है तो कुछ घंटों के लिए घंटाघर के पार्क को गंदगी से मुक्ति जरूर मिल जाती है।
ये है घंटाघर का इतिहास
घंटाघर का शिलान्यास 24 जुलाई 1948 को यूपी की तत्कालीन राज्यपाल सरोजिनी नायडू ने किया। करीब पांच साल में इसकी इमारत बनकर तैयार हुई। इसका उद्घाटन 19 अक्तूबर 1953 को तत्कालीन केंद्रीय रेलवे व यातायात मंत्री लालबहादुर शास्त्री ने किया।
उस समय सिटी बोर्ड के अध्यक्ष केशवचंद्र थे और महाराज प्रसाद जैन, डा. बृजलाल भंडारी उप प्रधान थे। घंटाघर चौक का लोकार्पण वर्ष 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने किया।
घंटाघर लाल आनंद सिंह रईस ने अपने पिता स्व. लाला बलबीर सिंह रईस की याद में बनवाया था। 1936 में उनका देहांत हो गया था। इसके निर्माण में बलबीर सिंह की पत्नी मनभरी देवी का खास योगदान रहा। तब इसका नाम बलबीर क्लॉक टावर रखा गया था। सिटी बोर्ड को 25 हजार रुपये दान राशि दी गई थी।
इसके अलावा लाला हरि सिंह, लाला शेर सिंह और लाला अमर सिंह ने भी घंटाघर निर्माण में दान किया था। उस वक्त नगर पालिका के चेयरमैन आनंद स्वरूप और इंजीनियर एसएस गुप्ता थे।
ये कहते हैं जिम्मेदार
मेयर एवं विधायक विनोद चमोली का कहना है कि घंटाघर की बुनियाद की स्थिति अच्छी नहीं है। वह कमजोर हो गई है। उसे मजबूत करने के लिए खास तकनीक की जरूरत है। इसमें अपेक्षाकृत अधिक धनराशि लग रही है। ओएनजीसी और नगर निगम मिलकर घंटाघर का जीर्णोद्धार कर रहे हैं। कुछ तकनीकी परेशानियों की वजह से इसमें विलंब हुआ है। उत्तराखंड अवस्थापना विकास निगम इसका पुनरोद्धार करेगा। इसमें करीब एक करोड़ का खर्च आएगा। हम इसकी पुरानी पहचान को फिर कायम करेंगे।
राजपुर विधायक खजानदास ने बताया कि घंटाघर मेरे विधानसभा क्षेत्र में है। इसकी बदहाली से मैं वाकिफ हूं। इसे लेकर मेरी मेयर विनोद चमोली से बातचीत हुई है। निगम के स्तर पर इसके पुनरोद्धार की प्रक्रिया शुरू हो गई है। जल्द ही घंटाघर की खूबसूरती लौट आएगी।