एक माह बाद मां ने देखी जवान बेटे की लाश
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मलेशिया में पुलिस हिरासत में मृत जयेंद्र का शव बृहस्पतिवार रात उनके गांव लामकांडे पहुंचा। शव पहुंचते ही परिजन, रिश्तेदारों और क्षेत्र के लोग बिलख-बिलख कर रोने लगे।
रातभर लोग एक-दूसरे को ढाढ़स बंधाते रहे। शुक्रवार सुबह नम आंखों से जयेंद्र का पैतृक घाट कितलागल में अंतिम संस्कार किया गया।
मलेशिया के एक होटल में नौकरी कर रहा जयेंद्र दो जून को मलेशिया से थाइलैंड जा रहा था कि बॉर्डर पर पुलिस ने उसे पकड़ लिया।
उसके पास टूरिस्ट वीजा था जिससे वह विदेश में कार्य नहीं कर सकता था। अगले ही दिन तीन जून को पुलिस हिरासत में उसकी मौत हो गई थी। जयेंद्र के बड़े भाई विजय सिंह ने 9 जून को परिजनों को घटना की सूचना दी थी।
अंतिम संस्कार में नहीं शामिल हो पाए भाई
शव को भारत लाने के लिए परिजन लगातार विदेश मंत्रालय, सांसद माला विजय राज्यलक्ष्मी शाह, डीएम से गुहार लगाते रहे। विदेश मंत्रालय ने शव की शिनाख्त के लिए परिजनों से कई औपचारिकताएं पूरी कराईं।
एक माह बाद शव बृहस्पतिवार रात 11 बजे गांव पहुंच पाया। शव को दिल्ली लेने के लिए पिता वीर सिंह रावत और अन्य रिश्तेदार गए थे। सुबह होते ही परिजन अंतिम संस्कार की तैयारियां करने लगे।
अंतिम संस्कार के लिए क्षेत्र के सैकड़ों लोग जयेंद्र के गांव पहुंचे। शुक्रवार सुबह 10 बजे लामकांडे गांव के पैतृक घाट कितलागल में उनका अंतिम संस्कार किया गया।
मलेशिया में कार्य कर रहे जयेंद्र के बड़े भाई विजय सिंह और चचेरे भाई सोहन सिंह मालिकों की बंदिश के चलते अंतिम संस्कार के लिए भारत नहीं आ पाए।
इंतजार में सूख गए थे आंसू
जयेंद्र की मौत परिजनों को कभी न भुला देने वाला दर्द दे गया। होनहार बेटे की शक्ल देखने के लिए महीने भर से माता-पिता विलाप कर रहे थे। बेटे की याद में रात-दिन रोते-रोते मां ठुमईदे और पिता वीर सिंह रावत की आंखों के आंसू भी सूख चुके थे।
मां एक माह से घर में कुछ भी काम नहीं कर पा रही थी। जयेंद्र के दो छोटे भाई त्रिलोक और अर्जुन भी इस हादसे को सुनकर डरे और सहमे हुए थे।
जब भी मोबाइल की घंटी बजती उन्हें लगता था कि अब ईश्वर ने उनकी पुकार सुन ली है।
शव देखते ही बेहोश हो गई मां
बृहस्पतिवार की आधी रात को जब जयेंद्र का शव घर पहुंचा तो मां ठुमदेई देवी की हालत इतनी खराब हो गई कि वह कई बार बेहोश हो गई।
इस दौरान परिजन बार-बार मलेशिया में रह रहे बडे़ बेटे विजय सिंह और भतीजे सोहन सिंह की सलामती की दुआ मांगते रहे। पिता वीर सिंह ने बताया कि चार भाईयों में जयेंद्र दूसरे नंबर का था और वह बचपन से ही होनहार और मेहनती था।
परिवार को आगे बढ़ाने में बड़े भाई के साथ-साथ जयेंद्र का बहुत बड़ा हाथ था। उसकी मौत से परिवार की रीढ़ ही टूट गई है।