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Dehradun News: गंभीर मरीज को एंबुलेंस में एक घंटे इंतजार करवाया, दम तोड़ा
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दून अस्पताल की ओपीडी से एक बार फिर से संवेदनहीनता सामने आई है। एक गंभीर मरीज को बेड और विशेषज्ञ न होने की वजह से करीब एक घंटे तक एंबुलेंस में ही इंतजार करना पड़ा। इसके बाद उसे इमरजेंसी में भर्ती किया गया जहां मरीज ने दम तोड़ दिया।
जानकारी के मुताबिक मंगलवार सुबह करीब 11 बजे श्रीनगर निवासी 47 वर्षीय रुघुवीर को ब्रेन हैमरेज होने के बाद दून अस्पताल की इमरजेंसी लाया गया था। उन्हें श्रीनगर बेस अस्पताल से रेफर किया गया था। परिजन मरीज को पहले एम्स ऋषिकेश लेकर गए। वहां पर भी मरीज भर्ती नहीं हो पाया। इसके बाद एक निजी अस्पताल लेकर गये जहां अधिक खर्चा होने की वजह से वहां से दून अस्पताल ले आए। उन्हें यहां पर भी निराशा ही हाथ लगी।
परिजनों के मुताबिक चिकित्सकों ने करीब एक घंटे तक मरीज को भर्ती नहीं किया। वह इमरजेंसी के बाहर एंबुलेंस में ही लेटा रहा। चिकित्सक आईसीयू में बेड न होने की बात कह रहे थे। इसके अलावा अस्पताल में न्यूरो फिजिशियन न होने की वजह से भी मरीज को भर्ती करने से इन्कार कर रहे थे। परिजनों के अनुसार काफी विनती करने पर करीब एक घंटे के बाद वे मरीज को अंदर लेकर गए। थोड़ी ही देर में मरीज ने दम तोड़ दिया। मरीज के भाई करण और मामा देवचंद्र का कहना है कि कम से कम मरीज की प्राथमिक जांच तो करनी चाहिए थी। अगर मरीज को समय पर उपचार मिल जाता तो शायद जान बच जाती।
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जानकारी के मुताबिक मंगलवार सुबह करीब 11 बजे श्रीनगर निवासी 47 वर्षीय रुघुवीर को ब्रेन हैमरेज होने के बाद दून अस्पताल की इमरजेंसी लाया गया था। उन्हें श्रीनगर बेस अस्पताल से रेफर किया गया था। परिजन मरीज को पहले एम्स ऋषिकेश लेकर गए। वहां पर भी मरीज भर्ती नहीं हो पाया। इसके बाद एक निजी अस्पताल लेकर गये जहां अधिक खर्चा होने की वजह से वहां से दून अस्पताल ले आए। उन्हें यहां पर भी निराशा ही हाथ लगी।
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परिजनों के मुताबिक चिकित्सकों ने करीब एक घंटे तक मरीज को भर्ती नहीं किया। वह इमरजेंसी के बाहर एंबुलेंस में ही लेटा रहा। चिकित्सक आईसीयू में बेड न होने की बात कह रहे थे। इसके अलावा अस्पताल में न्यूरो फिजिशियन न होने की वजह से भी मरीज को भर्ती करने से इन्कार कर रहे थे। परिजनों के अनुसार काफी विनती करने पर करीब एक घंटे के बाद वे मरीज को अंदर लेकर गए। थोड़ी ही देर में मरीज ने दम तोड़ दिया। मरीज के भाई करण और मामा देवचंद्र का कहना है कि कम से कम मरीज की प्राथमिक जांच तो करनी चाहिए थी। अगर मरीज को समय पर उपचार मिल जाता तो शायद जान बच जाती।
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