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कंपनी बनाई, माल कमाया और कट लिए
प्रवेश कुमारी/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Thu, 28 Nov 2013 09:36 AM IST
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ऐसा कौन सा तरीका है, जो 11 हजार रुपए को तीन साल में 11 लाख में तब्दील कर सकता है? यह सवाल माजरा के कारपेंटर राजेश के दिमाग में कौंधा जरूर, लेकिन एजेंट के तीन साल में पैसा 10 गुना करने और हर माह निश्चित आय के झांसे में वह इस कदर फंसा कि समझ-बूझ धरी रह गई।
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निश्चित आय का चेक आना बंद
आंगनबाड़ी में कार्यरत पत्नी की मेहनत की कमाई से 11 हजार रुपए एजेंट के सुपुर्द कर दिए। लालच का भूत राजेश के दिमाग से तब उतरा, जब दो माह बाद निश्चित आय का चेक आना बंद हो गया। मालूम चला कि कंपनी बंद हो गई है।
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जग हंसाई का डर
एजेंट के पास चक्कर काटे तो उसने खुद के पैसे फंस जाने और राजेश को देख-भाल कर फार्म साइन करने की बात कहते हुए हाथ खड़े कर दिए। जग हंसाई के डर से राजेश ने किसी को बताया भी नहीं।
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पढ़ें: देहरादून में रह रहा था स्पीक एशिया का मालिक
शहर में राजेश जैसे सैकड़ों निवेशक हैं, जो एजेंट्स के डेमो और पैसा डबल होने के लालच में कमाई लुटा रहे हैं। स्पीक एशिया जैसी कंपनियां गली-गली में फैली हैं, जो लोगों के सपनों से खेल रही हैं।
मोहल्लों में अच्छा रसूख रखने वाले लोग कमीशन के लालच में ऐसी कंपनियों के एजेंट बने हैं। कई ऐसी कंपनियां हैं, जो बीते तीन साल में बंद हो चुकी हैं। निवेश करने वाले एजेंट के घर के चक्कर काट रहे हैं।
दावे असंभव, फिर भी चले
लोगों से पैसे ऐंठने के लिए कंपनियां किस तरह जाल बुनती हैं, इसकी एक मिसाल हैं रंजीत (परिवर्तित नाम)। मल्टी लेवल मार्केटिंग (एमएलएम) का धोखा खाए रंजीत ने चेन्नई की कंपनी हेल्थ कोड इंटरनेशनल के वजन कम करने वाले उत्पाद खरीदे।
दावा था कि बगैर कोई परहेज वजन घटा सकेगा। लेकिन चार हजार रुपए के ये प्राडक्ट कोई करिश्मा न दिखा सके। दावा गलत साबित होने पर रंजीत ने ब्राशर में कंपनी का कार्यालय देखा तो चेन्नई लिखा मिला। स्थानीय एजेंट खुद फंसने और रंजीत से देखभाल कर फार्म पर साइन करने की बात कह पीछा छुड़ा गया।
ऐसे बचती हैं कंपनियां
आवेदन फार्म के पीछे छोटे अक्षरों में रूल्स एंड रेग्युलेशन लिखे जाते हैं। कंपनी इसमें साफ अक्षरों में लिखती हैं कि डिस्ट्रीब्यूटर या मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव की तरफ से किए जाने वाले किसी भी वादे के प्रति वह जिम्मेदार नहीं होगी।
ज्यादातर आवेदक फार्म पर हस्ताक्षर करते हुए इन रूल्स को पढ़ने की जहमत नहीं उठाते। लिहाजा, डिस्ट्रीब्यूटर के पैसा लेकर चंपत हो जाने या दावे पूरे न होने की स्थिति में वह कंपनी को कटघरे में खड़ा नहीं कर पाते और मन मसोसकर चुप बैठ जाते हैं।
चेता चुका है आरबीआई भी
रिजर्व बैंक आफ इंडिया (आरबीआई) भी चीप फंड्स को लेकर ग्राहकों को सचेत कर चुका है। बैंक की तरफ से एक सर्कुलर जारी कर स्पष्ट किया गया है कि इस तरह की फ्राड स्कीमों की जानकारी फ्राड करने वाले ई-मेल, पत्र या एसएमएस के माध्यम से प्रसारित कर रहे हैं।
इससे सावधान रहें। 2010 के बैंक की सीजीएम कल्पना किल्ला की तरफ से जारी इस सर्कुलर को संशोधन के साथ कई बार ग्राहकों के हित में जारी किया गया है।