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2014 में बदमाशों ने पुलिस को बनाया घनचक्कर

Wed, 31 Dec 2014 11:52 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून Updated Wed, 31 Dec 2014 11:52 AM IST
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crime year ender.

साल 2014 अपराध के लिहाज से देहरादून के लिए बुरा सपना बन गया। चौरी, डकैती, हत्या, अपहरण की ताबड़तोड़ वारदातों से पुलिस चकरघिन्नी बनी रही। बदमाश वारदातों को अंजाम देकर पुलिस को छकाते रहे और पुलिस जांच के नाम पर सिर्फ लकीर पीटती रही। सबसे पहले चोरों की बारात ने पुलिस का खूब बैंड बजाया।

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बेहिसाब घटनाओं से राजधानी में असुरक्षा का माहौल बन गया। कानून व्यवस्था का मुद्दा गरमाया तो सरकार को दखल देना पड़ा। तत्कालीन एसपी सिटी नवनीत भुल्लर को हटाने के साथ कई थाना प्रभारियों पर गाज गिरी।
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फिर नकरौंदा में सहायक कृषि अधिकारी के आवास पर डकैती के दौरान बेटे अंकित थपलियाल की हत्या ने पुलिस और सरकार की खूब किरकिरी कराई।

एक पखवाड़े तक पुलिस के खिलाफ आंदोलन का बिगुल बजा। सीएम को पुलिस को दो बार दिए गए अल्टीमेटम से मुंह चुराना पड़ा। बिजनौर पुलिस की मदद से आरोपियों को पकड़कर पुलिस जैसे-तैसे लाज बचा पाई।
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इसके बाद आदर्श नगर के चौहरे हत्याकांड ने लोगों को दहला दिया। इस बीच रिश्वतखोरी में मयूर चौकी प्रभारी के जेल जाने से भी पुलिस की साख को बट्टा लगा।

ऑपरेशन भूरा में उलझी पुलिस

crime year ender.

साल जाते-जाते रुड़की कांड के आरोपी अमित उर्फ भूरा के 15 दिसंबर को दून पुलिस की अभिरक्षा में बागपत से फरारी ने एसएसपी अजय रौतेला की कुर्सी पलट दी। पूरा अमला सब कुछ भूल ऑपरेशन भूरा में उलझकर रह गया।

उपलब्धियां
बीएसएनएल अधिकारी के अगवा बेटे हर्षित को बरामद करने के साथ फिरौती की रकम 34 लाख वापस लाना बड़ी उपलब्धि रही। आदर्श नगर के चौहरे हत्याकांड में 24 घंटे के अंदर आरोपी हरमीत सिंह का चेहरा बेनकाब करने में कामयाबी मिली।

शहर में सिटी पेट्रोल यूनिट बनना भी कारगर रहा है। हेलमेट की अनिवार्यता में यूनिट के जवानों का अहम रोल रहा है।
सिपाही मनीष रावत ने एथलेटिक्स में राष्ट्रीय चैंपियन बनकर उत्तराखंड पुलिस का सम्मान बढ़ाया है।

मुख्य नाकामियां
- अभिरक्षा से अमित उर्फ भूरा की फरारी सबसे बड़ी नाकामी रही है।
- नकरौंदा कांड का मुख्य आरोपी अकरम को अब तक नहीं दबोचा जा सका है।
- राजपुर के कुणाल हत्याकांड की पहेली भी पुलिस सुलझा नहीं सकी।
- स्कूल-कॉलेजों में नशे की खपत रोकने के लिए बनाई कार्ययोजना नहीं चढ़ी परवान।

अमर उजाला का असर
(21 जून को पेज नंबर नौ पर छपा, 22 जून को पेज नंबर 12 पर असर)
आपदा में मारे गए 631 लोगों के शवों का एक भी वारिस न मिलने का मामला उठाया। शवों के डीएनए सैंपल के मिलान को भेजे गए नमूने पुलिस भूल गई थी। आला अफसरों ने संज्ञान लेकर पैरोकारी कराई तो डीएनए मिलान से नौ लावारिसों को वारिस मिले।

(14 अक्तूबर को पेज नंबर दो)
अमर उजाला ने खराब पड़ी पांच क्रेनों का मुद्दा उठाया था। डीजीपी के संज्ञान के बाद उन्हें चालू कर सीपीयू को क्रेन की जिम्मेदारी सौंपी गई। अब सड़क किनारे खड़े वाहनों को उठाने में उन क्रेनों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

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