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'हां, मारते हैं डंडी, करते हैं कालाबाजारी'

Sat, 20 Sep 2014 07:41 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून Updated Sat, 20 Sep 2014 07:41 PM IST
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corruption in public distribution system.

‘सिर्फ 18 रुपये में कैसे और आखिर कब तक टिकेगा ईमान।’ राशन की कालाबाजारी की शिकायतों और जिला पूर्ति विभाग की छापामार कार्रवाई के बीच ये शब्द हैं एक सरकारी राशन विक्रेता के। अमर उजाला से बातचीत में इस दुकानदार ने माना कि अधिकतर राशन विक्रेता गड़बड़ी करते हैं, लेकिन वह इसे जायज बताता है।

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उसका कहना है कि सिस्टम में सुधार की उम्मीद केवल दुकानदारों से क्यों की जाती है? जबकि धांधली की शुरुआत गोदाम से ही हो जाती है। दुकानदार बताता है कि राशन विक्रेताओं की कमीशन बढ़ाने की मांग वर्षों पुरानी हो गई है।
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कमीशन बढ़े और गोदामों से ही कार्रवाई हो तो कालाबाजारी पर कुछ लगाम लग सकती है। जानते हैं राशन की कालाबाजारी की कहानी इस दुकानदार की जुबानी।

बच्चे तो हमें भी पालने हैं...

corruption in public distribution system.

कालाबाजारी न करें तो गुजारा होना मुश्किल है। यही वजह है कि जहां मौका मिलता है डंडी मारते हैं। कम तोलने से लेकर उपभोक्ताओं को राशन नहीं देने तक की तिकड़म करनी पड़ती है। एक क्विंटल में 18 रुपये कमीशन मिलता है और अहसान के तौर पर खाली बोरे का दाम। इतनी कम कमाई में ईमान कहां से दिखाएं?

परिवार है, बच्चे हैं, कहां से पालें? डंडी मारना आसान नहीं है। प्रशासन, उपभोक्ता और विभाग हर समय पीछे पड़े रहते हैं। 100 ग्राम अनाज बचाने के लिए हजार तरह की तिकड़म करनी पड़ती है।

यही वजह है कि कई दुकानदारों ने साइड बिजनेस कर लिया है। किसी की परचून की दुकान है तो कोई प्रापर्टी का धंधा कर रहा है।

'चपरासी भी इससे ज्यादा वेतन पाता है'

corruption in public distribution system.

दिल्ली सरकार ने राशन डीलरों का कमीशन 35 रुपये प्रति क्विंटल किया है, लेकिन उत्तराखंड में गेहूं और चावल पर 18 रुपये प्रति क्विंटल कमीशन मिल रहा है। चीनी पर 9.30 रुपये प्रति क्विंटल कमीशन है। खाली बोरे की कीमत 15 से 18 रुपये मिलती है। किसी दुकान में 50 तो कहीं सौ से दो सौ क्विंटल राशन जाता है।

गोदाम से दुकान तक राशन ले जाने के लिए दुकानदारों को गाड़ी का भाड़ा मिलता है, लेकिन यह इतना कम है कि जेब से देना पड़ जाता है। तेल के दाम बढ़ रहे हैं, लेकिन भाड़ा नहीं। गेहूं-चावल के लिए 10 रुपये प्रति क्विंटल तीन किलोमीटर की दूरी तक मिलता है। इसके आगे तीन रुपये प्रति क्विंटल प्रति किलोमीटर मिलता है।

दुकान में औसत सौ क्विंटल खपत मान लें तो सब मिलाकर भी मासिक आय 6000-6500 से अधिक नहीं होती। इससे अधिक तो सरकारी चपरासी वेतन पाता है।

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बीस फीसदी तो गोदाम से गायब

corruption in public distribution system.

राशन गोदाम से ही दुकानदार के कोटे में सीधे-सीधे दस फीसदी कटौती कर दी जाती है। इसके अलावा गोदाम में ही कुछ दलाल रहते हैं। वे बाजार में सीधे डील करते हैं और दुकानदारों के राशन से दस फीसदी एक्स्ट्रा काट लेते हैं। यह बीस प्रतिशत राशन बाजार में बेचा जाता है।

ऐसे करते हैं ‘बचत’
बाजार में बेचने के लिए राशन बचाने के लिए ज्यादातर दुकानदार डंडी मारते हैं। इसके अलावा उन कार्डों का इस्तेमाल किया जाता है, जिन पर राशन नहीं लिया जाता या जिनका ट्रांसफर किया जा चुका है। ग्रामीण क्षेत्रों में तय दिन पर जो आया उसे ही राशन (वह भी तय से कम) मिलता है, नहीं आया तो उसका हिस्सा बाजार में बेच दिया जाता है।

बाजार में दोगुने मिलते हैं दाम
बाजार में राशन बेचकर कुछ कमाई हो जाती है। गेहूं 10.50 से 12 रुपये प्रति किलो और चावल 13.50 से 15 रुपये प्रति किलो तक बिक जाता है। चीनी 25-30 रुपये किलो तक बिकती है, लेकिन इसमें रिस्क ज्यादा होता है। इसे बेचने से बचते हैं। केरोसिन पर 50 पैसे प्रति लीटर कमीशन है, लेकिन इसे भी कम ही बेचा जाता है।

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