बाजी हार चुके उम्मीदवारों पर कांग्रेस ने चला जीत का दांव
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कांग्रेस ने गढ़वाल की जिन तीन संसदीय सीटों से उम्मीदवारों को मैदान में उतारा तीनों लोकसभा का एक-एक चुनाव हारे हैं। हालांकि उन्हें संसदीय चुनाव लड़ने का अनुभव है।
हरिद्वार से उम्मीदवार रेणुका रावत पति हरीश रावत की तर्ज पर अल्मोड़ा में हार के बाद यहां से लड़ रही हैं। पौड़ी उम्मीदवार हरक सिंह रावत 1998 में बसपा से चुनाव लड़कर हार चुके हैं।
टिहरी से कांग्रेस उम्मीदवार साकेत बहुगुणा ने इस सीट पर 2012 में उपचुनाव लड़ा और माला राज्य लक्ष्मी शाह से चुनाव हार गए।
पति पत्नी दोनों को मिली है बचदा से शिकस्त
रेणुका रावत ने पति का साथ उस समय दिया था जब अल्मोड़ा संसदीय सीट उन्हें लगातार हार मिल रही थी। अल्मोड़ा जब सामान्य सीट थी तो हरीश रावत यहां से पहले तीन बार लगातार चुनाव जीते और फिर लगातार तीन बार हारे भी।
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चौथी बार उनकी पत्नी रेणुका रावत 2004 में चुनाव लड़ीं। गौरतलब है कि हरीश रावत ने तीन चुनाव में जितने अंतर से चुनाव हारते आ रहे थे उससे बहुत कम अंतर से रेणुका रावत हारीं। भाजपा के बची सिंह रावत ने रेणुका को करीब 15 हजार वोटों से मात दी थी।
पौड़ी के लिए नए नहीं हैं हरक
मंत्री हरक सिंह रावत का यह दूसरा लोकसभा चुनाव होगा। पौड़ी संसदीय सीट से हरक सिंह 1998 में बसपा के टिकट से चुनाव लड़े और तीसरे स्थान पर आए थे हालांकि विधानसभा चुनावों में उन्हें जीत मिलती रही है।
रावत का कहना है कि पौड़ी का इलाका उनके लिए नया नहीं है और वहां के लोगों के लिए वह नए नहीं हैं।
आपदा के दौरान में मैंने पौड़ी के लोगों के बीच जाकर काम किया है। उनकी समस्याओं और आवश्यकताओं रूबरू हूं। इलाके के लोगों में कांग्रेस के प्रति स्नेह है जिसका फायदा इस बार जरूर मिलेगा।
पिता की सीट नहीं बचा सके थे साकेत
टिहरी सीट पर पिता विजय बहुगुणा द्वारा खाली की गई सीट पर उपचुनाव लड़ने वाले साकेत बहुगुणा पहला चुनाव हार चुके हैं। 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने पांचों सीटें जीती थीं लेकिन उपचुनाव में यह सीट भाजपा की रानी माला राज्यलक्ष्मी ने करीब 22 हजार वोटों से छीन ली थी।
साकेत मानते हैं कि एक चुनाव की हार आमतौर पर दस साल पीछे ढकेल देती है लेकिन मैंने हारने के बाद भी लोगों को नहीं छोड़ा। प्रदेश सरकार ने 18 महीनों में करीब 15 सौ करोड़ के काम आवंटित किए हैं। रानी को इन 18 महीनों का हिसाब देना होगा।
साकेत का कहना है कि इस दौरान सरकारी कर्मचारियों, आंगनबाड़ी कार्यकत्री और युवाओं से जुड़ी तमाम समस्याओं का समाधान कराया है। साकेत अपने पिता और राजघराने के 30 सालों की तुलना के साथ फैसला टिहरी वालों पर छोड़ रहे हैं।