कोयले की बिजली बिगाड़ रही पर्यावरण
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घर में जिस बिजली के जरिये हम एसी का आनंद लेते हैं, वह पर्यावरण के लिए बेहद घातक है।
मिशन ट्रू बायोलॉजिस्ट संस्था के अध्ययन में यह बात सामने आई है। संस्था ने मांग उठाई है कि बिजली नीति में परिवर्तन होना चाहिए, ताकि हर व्यक्ति के लिए बिजली खर्च की सीमा तय हो सके।
संस्था के मुताबिक देशभर में कुल बिजली उपलब्धता प्रतिव्यक्ति दो यूनिट प्रतिदिन है।
उत्तराखंड में यह करीब साढ़े तीन यूनिट प्रतिदिन, यूपी में यह करीब 1.2 यूनिट प्रतिदिन और गोवा जैसे राज्य में यह करीब सात यूनिट प्रतिदिन है।
पर्यावरण के लिए बिजली नीति में बदलाव होना जरूरी
संस्था के संस्थापक पर्यावरणविद् डॉ. एमएस मेहता ‘इकोमैन’ का कहना है कि कारपोरेट घराने आज एक पूरे शहर के हिस्से की बिजली एक दिन में खर्च कर रहे हैं जबकि देश में 30 करोड़ से ज्यादा लोग आज भी ऐसे हैं।
जिन्हें बिजली मयस्सर नहीं है। उन्होंने बताया कि कोयले से ग्रीन हाउस गैस निकलती है, जिससे सीधे पर्यावरण पर बुरा असर पड़ता है। उन्होंने मांग की है कि बिजली नीति में परिवर्तन होना जरूरी है।
इसके तहत एक तो ऊर्जा उत्पादन के विकल्प देखने होंगे और दूसरे हर व्यक्ति के लिए यह तय होना चाहिए कि किसे कितनी बिजली का उत्पादन करना है।
एक यूनिट यानी एक लाख रुपए
वैसे तो एक यूनिट बिजली की कीमत करीब तीन रुपए होती है लेकिन पर्यावरणीय नुकसान के लिहाज से देखें तो यह करीब एक लाख के खर्च पर मिलती है।
इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कोयला आज भी पर्यावरण के लिए कितना खतरनाक है।
विकल्पों पर काम करने की जरूरत
डॉ. मेहता का कहना है कि कोयले से बिजली का उत्पादन तत्काल बंद करने के साथ ही इसके विकल्पों पर गौर करना चाहिए।
उनका कहना है कि हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट से होने वाला नुकसान, कोयले के नुकसान की तुलना में महज 20 प्रतिशत है। इसके अलावा न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट, सौर ऊर्जा के अलावा कई और विकल्पों पर काम करने की सख्त जरूरत है।