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एक साल में शिक्षा को मिला घोषणाओं का तोहफा
बिशन सिंह बोरा / अमर उजाला, देहरादून
Updated Tue, 03 Feb 2015 01:31 PM IST
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शिक्षा वह मुद्दा है, जिसके प्रति मुख्यमंत्री हरीश रावत मौके-बेमौके सबसे अधिक चिंता जताते रहते हैं।
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वह अकसर कहते हैं कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार हो तो प्रदेश की तस्वीर बदलते देर नहीं लगेगी। इसके लिए वे अधिकारियों से लेकर शिक्षकों तक को कड़ी नसीहत देने से भी गुरेज नहीं करते।
लेकिन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपने एक साल के कार्यकाल में खुद शिक्षा के क्षेत्र में जो घोषणाएं की, उनका हाल न उन्हें मालूम है न संबंधित अधिकारियों को इससे लेना-देना है।
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एक साल में रावत ने शिक्षा क्षेत्र में घोषणाओं की जितनी बरसात की, बदहाली उतनी बढ़ती चली गई। 120 घोषणाओं में से सिर्फ 15 पर ही अमल हो सका है। बाकी घोषणाएं यक्ष प्रश्न बनकर रह गई हैं।
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यह घोषणाएं नहीं हुई पूरी
- अल्मोड़ा के जागेश्वर में महेंद्र सिंह धोनी के नाम पर खेल मैदान
- दून में कारगिल शहीद राजीव पुंडीर के नाम पर स्कूल का नाम
- स्कूली पाठ्यक्रम में योग शामिल करना और योगाचार्यों की नियुक्ति
- प्रशिक्षित बेरोजगारों की नियुक्ति के लिए भर्ती विज्ञप्ति लटकी
- पौड़ी के राउमावि कुलासू का इंटर कालेज के रूप में उच्चीकरण
- हाईस्कूल और जूनियर हाईस्कूल का अलग से संचालन
- शिक्षक कल्याण कोष के लिए एक करोड़ रुपये मदद की घोषणा
- प्रदेश के हर ब्लाक में राजीव गांधी अभिनव विद्यालय की स्थापना
- बीपीएड प्रशिक्षितों को नहीं मिली नियुक्ति
- 1251 बीएड टीईटी प्रशिक्षितों की नियुक्ति की घोषणा
इन चुनौतियों पर नहीं ध्यान
प्रदेश के 750 से अधिक स्कूलों के भवन जर्जर हाल
1117 स्कूलों में अब तक पेयजल सुविधा नहीं
546 स्कूलों में शौचालय नहीं बनाए जा सके हैं
3289 विद्यालयों में बिजली का संयोजन नहीं है
11756 शिक्षकों एवं प्रधानाध्यापकों की कमी
संशोधन में हुई देरी, शिक्षक नहीं चढ़े पहाड़
शिक्षकों की तबादला नियमावली समय रहते संशोधित न होने से पूरे साल एक भी शिक्षक पहाड़ नहीं चढ़ा। मंत्रिमंडल में एक राय नहीं बनी तो मुख्यमंत्री को इसे विचलन से अनुमोदित करना पड़ा।
इस बीच शिक्षकों के मनमाने तबादले जारी रहे। अगस्त में नियमावली में संशोधन के बिना ही 159 शिक्षकों का स्थानांतरण कर दिया गया। हालांकि, अमर उजाला में खुलासे के बाद ये तबादले निरस्त किए गए।
बच्चों को शिक्षकों का इंतजार
मुख्यमंत्री हरीश रावत ने चंपावत जिले में 30 अक्तूबर 2014 को राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय नीड़ एवं राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय रियासी बवनगांव में शिक्षकों की नियुक्ति की घोषणा की।
लेकिन दोनों विद्यालय में शिक्षकों के सात-सात पद सृजित होने के बावजूद दोनों स्कूलों में एक भी शिक्षक की नियुक्ति नहीं हो सकी है। बच्चे आज तक शिक्षकों के इंतजार में हैं। प्रदेश में ऐसे कई स्कूल हैं।
कहां गया कमला नेहरू पुरस्कार?
शिक्षा विभाग में पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की घोषणाएं भी अधूरी हैं। बहुगुणा ने प्रदेश के मेधावी छात्रों को लैपटाप और उनकी माताओं को कमला नेहरू पुरस्कार देने की घोषणा की थी। लेकिन न मेधावी बच्चों को लैपटॉप मिले, न ही उनकी माताओं को कमला नेहरू पुरस्कार।
उत्तराखंड घोषणाओं का राज्य बनकर रह गया है। सरकार का अधिकारियों पर नियंत्रण नहीं है। वे शासन में फाइलें इधर-उधर घुमाते रहते हैं और घोषणाएं धरी रह जाती हैं। जब तक अधिकारी कसे नहीं जाएंगे, हालात में सुधार संभव नहीं है।
- करनैल सिंह, प्रदेश अध्यक्ष, राजकीय शिक्षक संघ
न शिक्षा व्यवस्था में र्कोई सुधार है, न ही शिक्षकों की समस्याओं का कोई निस्तारण किया जा रहा है। प्रदेश में स्कूलों की बदहाली बढ़ती ही जा रही है। यही हाल रहा तो न जाने प्रदेश का क्या हाल होगा। जल्द इसके विरोध में आंदोलन किया जाएगा।
- सुभाष चौहान, प्रदेश अध्यक्ष, जूनियर हाईस्कूल शिक्षक संगठन