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वैज्ञानिकों ने कैंसर पीड़ितों के लिए की क्रांतिकारी खोज, इलाज में बेहद कारगर
रजा शास्त्री, अमर उजाला, देहरादून
Updated Thu, 11 Jan 2018 03:01 PM IST
सार
-बॉटेनिकल सर्वे आफ इंडिया ने की पहचान
-संरक्षण न होने पर गायब हो सकती वनस्पति प्रजाति
-भारतीय हिमालयी क्षेत्र में सिर्फ नुब्रा घाटी में होती है पैदा
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Lycium ruthenicum plant
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
लद्दाख की नुब्रा घाटी भारतीय हिमालयी क्षेत्र में इकलौता ऐसा स्थान है जहां कैंसर के फैलाव को रोकने वाली वनस्पति खीचर (लाइसियम रूथेनिसियम) पैदा होती है।
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बॉटेनिकल सर्वे आफ इंडिया ने इस वनस्पति की पहचान करके संरक्षण का मशविरा दिया है। साथ ही इसके गायब हो जाने की आशंका व्यक्त की है। विज्ञानियों का कहना है कि गढ़वाल और कुमाऊं हिमालयी क्षेत्र में खीचर की खेती हो सकती है। खीचर कैंसर के अलावा गुर्दा, लीवर, नपुंसकता, बांझपन आदि रोगों के इलाज में बहुत कारगर है।
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बॉटेनिकल सर्वे आफ इंडिया के विज्ञानियों का कहना है कि लाइसियम रूथेनिसियम के क्षेत्रीय लोग विभिन्न नामों से पुकारते हैं। इसे खीचर, खितसर, कितसरमा, ब्लैक गोजी भी कहा जाता है। वैसे यह पाकिस्तान, कजाकिस्तान, मंगोलिया, चीन, दक्षिणी-पूर्बी रूस, ताजिकस्तान, उजबेकिस्तान आदि देशों में भी होती है, लेकिन भारतीय हिमालयी क्षेत्र में यह नुब्रा घाटी में ही होती है। जलवायु परिवर्तन के कारण नष्ट होते वासस्थलों और इसका संरक्षण न किए जाने से यह दुर्लभ प्रजाति की श्रेणी में आ रही है।
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इन रोगों में कारगर
विज्ञानियों का अंदेशा है कि संरक्षण न होने पर भारतीय हिमालय क्षेत्र में यह वनस्पति प्रजाति गायब हो सकती है। बीएसआई के निदेशक डॉ. परमजीत सिंह और नार्दन रीजनल सेंटर के कार्यालयाध्यक्ष डॉ. कुमार अम्बरीश ने लद्दाख की नुब्रा घाटी में इसकी पहचान की है।
यह समुद्र तल से 2800 और 3200 मीटर ऊपर कोल्ड डिजर्ट में पाई गई। इस पर विज्ञानियों ने खीचर पर व्यापक शोध किए जाने की संस्तुति की है। इसके साथ ही यह मशविरा दिया है कि उच्च हिमालयी क्षेत्र में इसकी खेती की जाए। विभिन्न देशों की कंपनियां इससे औषधियां तैयार कर रही हैं। डॉ. अम्ब्रीश ने बताया कि इसके संरक्षण और प्रसार की जरूरत है। भारतीय हिमालयी क्षेत्र में यह नुब्रा घाटी में ही उपलब्ध है।
इन रोगों में कारगर है खीचर
कैंसर, हृदय रोग, मासिक धर्म के डिस्आर्डर, लीवर, गुर्दा रोग, थकान और कमजोरी, घुटनों और कमर तकलीफ, नेत्र रोग, ब्लड सरकुलेशन की दिक्कत, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता के रोग, त्वचा रोग, एजिंग समस्याएं आदि। इसके अलावा इसे शरीर के अंदर पैदा होने वाले विषाक्त तत्वों को हटाने के लिए एंटी ऑक्सीडेंट के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
यह समुद्र तल से 2800 और 3200 मीटर ऊपर कोल्ड डिजर्ट में पाई गई। इस पर विज्ञानियों ने खीचर पर व्यापक शोध किए जाने की संस्तुति की है। इसके साथ ही यह मशविरा दिया है कि उच्च हिमालयी क्षेत्र में इसकी खेती की जाए। विभिन्न देशों की कंपनियां इससे औषधियां तैयार कर रही हैं। डॉ. अम्ब्रीश ने बताया कि इसके संरक्षण और प्रसार की जरूरत है। भारतीय हिमालयी क्षेत्र में यह नुब्रा घाटी में ही उपलब्ध है।
इन रोगों में कारगर है खीचर
कैंसर, हृदय रोग, मासिक धर्म के डिस्आर्डर, लीवर, गुर्दा रोग, थकान और कमजोरी, घुटनों और कमर तकलीफ, नेत्र रोग, ब्लड सरकुलेशन की दिक्कत, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता के रोग, त्वचा रोग, एजिंग समस्याएं आदि। इसके अलावा इसे शरीर के अंदर पैदा होने वाले विषाक्त तत्वों को हटाने के लिए एंटी ऑक्सीडेंट के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।