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उत्तराखंड: 556 किमी दूर से देहरादून पहुंचा नीली आंखों वाला सफेद बाघ, 20 दिन का एकांतवास; महीने भर बाद दीदार
Sat, 03 Oct 2026 03:38 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, देहरादून
अमर उजाला नेटवर्क, देहरादून
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Sat, 03 Oct 2026 03:38 AM IST
सार
सफेद रंग, गहरी धारियों और नीली आंखों वाला तेजस उत्तराखंड का पहला सफेद बाघ बताया जा रहा है।
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- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
ग्वालियर जूलॉजिकल पार्क से सफेद बाघ ‘तेजस’ को बाघ विनिमय कार्यक्रम के तहत देहरादून चिड़ियाघर लाया गया है। सफेद रंग, गहरी धारियों और नीली आंखों वाला तेजस उत्तराखंड का पहला सफेद बाघ बताया जा रहा है। तेजस ने सड़क मार्ग से करीब 556 किलोमीटर की दूरी 12 से 14 घंटे में तय की। उसे विशेष रेस्क्यू वाहन से 13 सदस्यीय टीम, जिसमें पशु चिकित्सक और वन विभाग के अधिकारी शामिल थे, देहरादून लेकर पहुंचे।
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नए वातावरण में स्वास्थ्य और व्यवहार की निगरानी के लिए तेजस को करीब 20 दिनों तक क्वारंटीन में रखा जाएगा। इस दौरान केवल केयरटेकर और पशु चिकित्सक ही उसकी देखभाल करेंगे। अधिकारियों के अनुसार, पर्यटक करीब एक माह बाद उसका दीदार कर सकेंगे। कार्यक्रम के तहत देहरादून चिड़ियाघर से करीब पांच वर्षीय रॉयल बंगाल टाइगर भोला को ग्वालियर भेजा गया है।
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अलग प्रजाति नहीं है सफेद बाघ
सफेद बाघ कोई अलग प्रजाति या नस्ल नहीं है। उसका सफेद रंग एक दुर्लभ आनुवंशिक विशेषता के कारण होता है। अल्बिनो जानवरों के विपरीत सफेद बाघों के शरीर पर धारियां बनी रहती हैं। यह बंगाल टाइगर में पाई जाने वाली प्राकृतिक रंग विविधता है।
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आठ साल बाद बक्सा में फिर गूंजेगी बाघ की दहाड़
पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार स्थित बक्सा टाइगर रिजर्व में आठ साल बाद स्थायी बाघ आबादी बसाने की मुहिम शुरू हो गई है। बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से लाई गई तीन वर्षीय रॉयल बंगाल बाघिन को शुक्रवार को प्राकृतिक घेरे में छोड़ा गया। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री भूपेंद्र यादव और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की मौजूदगी में शुरू हुआ यह बंगाल का पहला बाघ पुनर्वास कार्यक्रम है। बाघिन को फिलहाल सॉफ्ट रिलीज के तहत प्राकृतिक घेरे में रखा गया है। यहां उसके स्वास्थ्य, शिकार क्षमता और व्यवहार की निगरानी होगी। ब्यूरो
दो साल में छह और बाघ लाने की योजना
बक्सा में 2018 के बाद स्थायी बाघ आबादी नहीं रही। हालांकि कैमरा ट्रैप में बाद के वर्षों में बाघों की मौजूदगी दर्ज हुई, लेकिन माना गया कि ये आसपास के भूटान या असम के मानस क्षेत्र से यहां पहुंचे थे। बाघों की स्थायी आबादी विकसित करने की योजना है। मुख्यमंत्री के अनुसार, अगले दो महीनों में तीन और बाघ छोड़े जाएंगे, जबकि अगले दो वर्षों में कुल छह और बाघ लाने की तैयारी है।