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विधानसभा चुनाव में मिले प्रचंड बहुमत से भाजपाई भी बेचैन 

Tue, 14 Mar 2017 10:13 AM IST
मनीष चंद्र भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून
मनीष चंद्र भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 14 Mar 2017 10:13 AM IST
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bjp leader in tension from assembly election winning
bjp

उत्तराखंड में मिले प्रचंड बहुमत को खुद कई भाजपाई भी नहीं पचा पा रहे हैं। भाजपा के लोग भी मान रहे हैं कि इन परिस्थितियों में दबाव की राजनीति खुलकर नहीं चल पाएगी। मुख्यमंत्री और मंत्री बनाने में भी जो दिल्ली तय करेगा, उसे ही सबको स्वीकार करना होगा।

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दरअसल, जनता ने भाजपा को सदन में जो एकतरफा संख्या बल दिया है, वह कई भाजपाइयों के अपने सेटिंग गेटिंग के गणित में फिट नहीं बैठ रहा है। इससे तमाम दिग्गजों से लेकर संगठन में अंदरखाने खेमों में बंटे जिला और मंडल स्तर के नेता भी असहज लग रहे हैं।
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वह इसलिए कि सरकार बनने पर दायित्व मिलने को लेकर कार्यकर्ताओं और नेताओं की महत्वाकांक्षा परवान चढ़ने लगती है। अलग-अलग कैंप में शामिल नेता अपनी अपनी सियासी ताकत के हिसाब से चहेतों को एडजस्ट कराते भी हैं। इसके लिए दबाव और खेमेबाजी भी खूब चलती है। छोटा राज्य होने के नाते उत्तराखंड में पूर्व ऐसा जमकर हुआ भी है।
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बात भाजपा की करें तो कभी मुख्यमंत्री के लिए भुवन चंद्र खंडूरी, भगत सिंह कोश्यारी, रमेश पोखरियाल निशंक के बीच भी खूब गुटबंदी देखी जाती रही है। कांग्रेस शासन में भी किसी दौर में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी व तब के प्रदेश अध्यक्ष हरीश रावत और फिर वर्ष 2012 के बाद तब के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री हरीश रावत में भी खूब गुटबंदी होती रही।

यही स्थिति फिर हरीश रावत के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी समय समय पर सामने आती रही। दूसरी सरकारों में भी अपने-अपने समर्थन में विधायकों का संख्या बल दिखाकर दबाव की राजनीति होती आई है। कुछ यही स्थिति मंत्रिमंडल में जगह बनाने, मंत्रालयों के बंटवारे और यहां तक कि चहेते अफसरों की ट्रांसफर पोस्टिंग में भी रहती है। इसमें भी जमकर गुटबंदी नजर आती है।

कई नेता तो दबाव बनाने के लिए दूसरे कैंप में मिल जाने, यहां तक कि पार्टी का साथ तक छोड़ने की चेतावनी दे देते हैं या फिर कोप भवन में चले जाते हैं। कुछ भाजपाइयों का मानना है कि मंत्रिमंडल या दायित्वों में पहले तो विधायकों को ही तवज्जो मिलेगी।


बाकी नेताओं को दायित्व धारियों के रूप में कितना एडजस्ट किया जाएगा, यह उनके आकाओं की शैली पर निर्भर करेगा। हालांकि पुराने भाजपाइयों और काडर बेस्ड समर्थकों को एक बात का सुकून है। वो यह कि कांग्रेस के बागी और भाजपा में विधायक बने नेता पार्टी के भीतर अपना अलग गुट बनाकर दबाव की राजनीति करने की स्थिति में नहीं हैं।

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