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यादें: बिरजू महाराज आठ बार आए थे हरिद्वार, जयपुर घराने से ताल्लुक रखने वाले गोवर्द्धन महाराज से थी मित्रता
Tue, 18 Jan 2022 01:18 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal
संवाद न्यूज एजेंसी, हरिद्वार
संवाद न्यूज एजेंसी, हरिद्वार
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Tue, 18 Jan 2022 01:18 PM IST
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पंडित बिरजू महाराज। (फाइल फोटो)
- फोटो : PTI
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अपने पिता पंडित अच्छन महाराज, चाचा शंभू महाराज और लच्छू महाराज से कथक की तालीम लेने वाले पंडित बृजमोहन मिश्र उर्फ बिरजू महाराज आठ बार धर्मनगरी आए थे। 1995 में ज्वालापुर निवासी गोवर्द्धन महाराज के घर पर भी आयोजित एक सादे समारोह में बिरजू महाराज आए थे। इस दौरान उन्होंने गोवर्द्धन महाराज की बेटी इंदु सिंह को अपना आशीर्वचन देते हुए कहा था कि लड़की बड़ी होकर कुछ अवश्य करेगी।
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कथक सम्राट पद्म विभूषण पंडित बिरजू महाराज अब हमारे बीच नहीं हैं। रविवार देर रात उन्हें हार्ट अटैक आया और उनका निधन हो गया। वे 83 साल के थे। यूं तो पंडित बिरजू महाराज की वंशावली पर लखनऊ घराने की मुहर लगी थी लेकिन उनकी हस्ती कभी जयपुर घराने से जुदा नहीं समझी गई।
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ज्वालापुर निवासी कथक नर्तकी इंदु सिंह बताती हैं कि बिरजू महाराज व उनके पिता जयपुर घराने से ताल्लुक रखने वाले गोवर्द्धन महाराज ने सन 1965 से 70 के बीच भारतीय कला केंद्र दिल्ली में एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। गोवर्द्धन महाराज की बेटी इंदु सिंह ने बताया कि बिरजू महाराज सात से आठ बार 1997 से पहले कई बार उनके घर पर आए थे। इंदु सिंह ने बताया कि 1995 में घर में एक सादा समारोह आयोजित किया गया था। इसमें बिरजू महाराज ने उनके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया था।
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कथक सम्राट के निधन पर गमगीन हुआ हर वर्ग
पारंपरिक भारतीय नृत्य शैली कथक को विश्व पटल पर ले जाने वाले प्रख्यात कथक नर्तक बिरजू महाराज का सोमवार तड़के यहां अपने घर पर निधन हो गया। महाराज के नाम से विख्यात बिरजू महाराज अगले महीने 84 वर्ष के होने वाले थे। देश के सबसे प्रसिद्ध एवं पसंदीदा कलाकारों में से एक, बृज मोहन नाथ मिश्रा (पंडित बिरजू महाराज के नाम से मशहूर) लखनऊ के कालका-बिंदादिन घराना से ताल्लुक रखते थे। बिरजू महाराज के निधन से हर कोई गमगीन है। धर्मनगरी में भी उनके निधन पर शोक की लहर है। उनके निधन पर विभिन्न वर्ग के लोगों ने श्रद्धांजलि अर्पित की...
भारतीय नृत्य कला को विश्वभर में विशिष्ट पहचान दिलाने वाले पंडित बिरजू महाराज के निधन से अत्यंत दुख हुआ है। उनका जाना संपूर्ण कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। शोक की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिजनों और प्रशंसकों के साथ है। संगीत जगत में उनकी क्षतिपूर्ति को कभी पूरा नहीं किया जा सकता।
- श्री महंत रविंद्रपुरी, अध्यक्ष अखाड़ा परिषद व सचिव निरंजनी अखाड़ा
बिरजू महाराज के साथ कथक का एक युग समाप्त हुआ है। बिरजू महाराज केवल एक व्यक्ति ही नहीं एक पूरी संस्कृति, परंपरा थे। बिरजू महाराज कहते थे कि जिस कला का शागिर्द हूं अगर उसे अपने शिष्यों को रोज ईमानदारी से नहीं सिखाया तो मेरी उस ईश्वर के यहां हाजिरी नहीं लगेगी। मैं गैरहाजिर नहीं रहना चाहता। जब लोग मुझे गुरु कहते हैं मैं उन्हें टोककर कहता हूं मैं एक अच्छा शागिर्द हूं। शागिर्द नहीं रहूंगा तो खोजूंगा कैसे इस संसार की अद्भुत कलाओं को।
- ज्योति शर्मा, कवयित्री
कथक सम्राट, पद्म विभूषण पंडित बिरजू महाराज का निधन अत्यंत दु:खद है। उनका जाना कला जगत की अपूरणीय क्षति है। ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्री चरणों में स्थान व शोकाकुल परिजनों को दु:ख सहने की शक्ति प्रदान करे। कथक में उन्होंने अपने साथ ही देश को भी अलग पहचान दिलाई।
-भवानी सिंह, संगीतज्ञ मध्य हरिद्वार
बचपन से मिली संगीत व नृत्य की घुट्टी के दम पर बिरजू महाराज ने विभिन्न प्रकार की नृत्यावलियों जैसे गोवर्द्धन लीला, माखन चोरी, मालती-माधव, कुमार संभव व फाग बहार की रचना की। सत्यजीत रॉय की फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ के लिए भी इन्होंने उच्च कोटि की दो नृत्य नाटिकाएं रचीं। इन्हें ताल वाद्यों की विशिष्ट समझ थी। जैसे तबला, पखावज, ढोलक, नाल और तार वाले वाद्य वायलिन, स्वर मंडल व सितार के सुरों का भी उन्हें गहरा ज्ञान था।
- इंदु सिंह, मध्य हरिद्वार
पंडित बिरजू महाराज देश की कला और संस्कृति के प्रवर्तक थे। उन्होंने कथक नृत्य के लखनऊ घराने को दुनिया भर में लोकप्रिय बनाया। उनके निधन से गहरा दुख हुआ है। उनका निधन कला जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है।
- अधीर कौशिक, समाजसेवी
बिखरे कथक नृत्य को एक मंच पर लाए बिरजू महाराज
भारत के कथक नृत्य सम्राट बिरजू महाराज अपने चेहरे की भाव भंगिमा से नृत्य सीख रहे कलाकारों को नृत्य कला समझा देते थे। उन्होंने बिखरे हुए कथक नृत्य को समेटते हुए एक मंच पर लाकर उसके संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह नृत्य कला सीख रहे प्रशिक्षु के सामने रहते थे तो कलाकारों को और अधिक ऊर्जा मिलती थी।
बिरजू महाराज की शिष्या रहीं नूपुर नृत्य कला केंद्र की संचालिका मीनू अग्रवाल बिष्ट ने अपने प्रशिक्षण के दौर के अनुभव साझा करते हुए बताया कि महाराज के दिल्ली स्थित कथक केंद्र से उन्होंने 1996-97 में ऑनर्स की डिग्री ली। उनके संरक्षण में ही उन्होंने कथक नृत्य सीखा। जब-जब वह सामने रहते, नई ऊर्जा मिलती थी। वह हर बार कुछ नया सिखाते थे और नया करने के लिए प्रेरित करते थे। वह सिखाने के दौरान अपने चेहरे की भाव भंगिमा से पूरी नृत्य कला को समझा देते थे।
मिलनसार, हंसमुख स्वभाव और बेहद मजाकिया व्यक्ति थे। सभी के साथ दोस्ताना व्यवहार करते थे। कभी लगता ही नहीं था कि इतने महान व्यक्तित्व के साथ हैं। संगीत ही उनकी दुनिया थी। उनका उद्देश्य कथक को आगे बढ़ाना था। उन्होंने बिखरे कथक नृत्य को समेट कर एक मंच पर लाने का काम किया था। कथक नृत्यांगना डॉ. दीपा जोशी बताती हैं कि महाराज जमीन से जुड़े रहे। उन्होंने कथक कला को आम लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया। वह कहते थे कथक ऐसी कला है जो कभी धोखा नहीं दे सकती। यह मृत्यु शैय्या पर ही साथ छोड़ती है। वह सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। संगीत की तीनों विधाओं गायन, वादन और नृत्य में उन्हें महारत हासिल थी।