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गोली और बम के धमाकों के बीच आगे बढ़ीं बेटियां
अंशुल डांगी/अमर उजाला, देहरादून
Updated Sat, 11 Jan 2014 09:34 AM IST
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होनहार बेटियों की आगे बढ़ने की ललक, जोश और जज्बे ने तमाम विसंगतियों को बौना कर दिया है। बेटियों के बढ़ते कदमों को न तो बंदूक की गोलियां रोक पा रही हैं और न ही बम के धमाकों का शोर।
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सामाजिक बंधन भी इनके सपनों की उड़ान से परे हो चुके हैं। खेल का यही जुनून छत्तीसगढ़, असम की महिला खिलाड़ियों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिला रहा है।
छत्तीसगढ़, झारखंड, असम और त्रिपुरा में नक्सलवाद और बोडो आतंकवाद का बोलबाला है। बावजूद इसके यहां खेल जिंदा है। इसकी मिसाल हैं झारखंड, छत्तीसगढ़ की महिला खिलाड़ी। ये गोली और बम के धमाकों के साथ ही सामाजिक मोर्चों से भी जूझ रही हैं।
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छत्तीसगढ़ के टीम के कोच जितेंद्र सिंह बताते हैं कि नक्सलियों को जो लड़की अच्छी लगे उसे उठा ले जाते हैं। हालांकि नक्सली खेलने से नहीं रोकते, फिर भी दहशत में खेलना चुनौती भरा रहता है।
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खिलाड़ियों के लिए गांव-गांव घूमते हैं। परिजनों से कई बार बात करते हैं, तब जाकर कोई अपनी बेटी खेलने के लिए भेजने को तैयार होता है। वहीं कई गांवों में बेटियों को सामाजिक बंधनों का सामना करना पड़ता है।
मसलन जल्दी शादी या घर से बाहर न निकलने की आजादी कई बार अच्छे खिलाड़ी को आगे नहीं बढ़ने देती। इसके बावजूद कर्बधा, महासमुद आदि ऐसे नक्सलप्रभावित क्षेत्र ऐसे हैं जहां की लड़कियां आज राज्य की टीम में शामिल हैं और अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। राज्य से अभी तक सिर्फ रेखा पदम ही ऐसी लड़की है जो नेशनल टीम में शामिल हो पाई है।
परंपराएं तो हैं, लेकिन सपोर्ट भी
बोडो आतंकियों से त्रस्त असम की बालिकाएं भी खेल के मैदान में छाने को तैयार हैं। यहां परंपराएं तो हैं लेकिन बेटियों को पूरा सपोर्ट मिलता है।
असम की महिला टीम मैनेजर रीमा दत्ता जुहार क्षेत्र से हैं। कहा कि खेल को बढ़ावा मिल रहा है और लोग भी बेटियों को खेलने के लिए भेज रहे हैं। मगर कई ग्रामीण क्षेत्रों में अभी परंपराएं हावी हैं। इसके चलते कई अच्छी खिलाड़ी आगे नहीं बढ़ पातीं। गुवाहाटी की प्रिया क्षेत्री ने बताया कि वे 6 साल से खेल रही हैं। कई बार खिलाड़ियों से ऐसी बातें सुनी हैं। मगर मुझे परिवार से पूरा सहयोग मिलता है।
मुझे खेल से बहुत प्यार है, गांव में हम कोच से खेल सीखते थे। मगर डर भी लगा रहता है। इसलिए हॉस्टल में रहकर सीख रही हूं।
- काजल धनंजय, कर्वधा
नक्सलवाद तो है, लेकिन खेलने के लिए कोई टोकता नहीं है। फिर भी डर लगा रहता है। हम लोग हॉस्टल में रहकर खेल सीख रहे हैं।
- पायल प्रधान, महासमुद