मोदी और शाह के फॉर्मूले से अलग यहां ‘राम’ की भाजपा में हुआ ‘दशरथ’ का ‘राजतिलक’
- इस बार युवा चेहरे की जगह उम्रदराज और अनुभवी नेता को सौंपी कमान
- हरबंस कपूर के बाद सबसे अधिक चुनाव जीतने वाले नेताओं में हैं शुमार
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उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से दो वर्ष के फासले पर खड़ी भाजपा ने संगठन की कमान उम्रदराज नेता बंशीधर भगत के हाथों में सौंपी है। भगत खांटी सियासतदां होने के साथ रामलीला में ‘दशरथ’ का किरदार निभाते आ रहे हैं।
जिस रामलीला में वे दशरथ बनते हैं, उसमें ‘राजतिलक’ ‘राम’ का ही होता आया है। रामलीलाएं राम के राजतिलक के लिए जानी जाती हैं। लेकिन युवाओं के प्रतीक ‘राम’ की भाजपा में इस बार ‘दशरथ’ का ‘राजतिलक’ हुआ है।
ये मोदी और शाह के फॉर्मूले से कुछ जुदा प्रयोग माना जा रहा है। केंद्र और राज्यों की सत्ता पर काबिज होने के लिए उनका अब तक एक ही फार्मूला रहा है, अनुभवी युवा चेहरा। इसी फॉर्मूले के दम पर पार्टी युवा वोट बैंक को साधने में कामयाब रही। प्रदेश में करीब 30 फीसदी युवा मतदाता हैं।
इस वोट बैंक को ध्यान में रखकर ही केंद्रीय नेतृत्व ने मुख्यमंत्री से लेकर प्रदेश संगठन मंत्री के पद पर युवा चेहरे पर भरोसा किया। मगर भाजपा के रथ की कमान ‘दशरथ’ के हाथों में सौंपकर पार्टी ने कौन सी सियासी चाल चली है, ये प्रश्न पार्टी के तमाम नेताओं और कार्यकर्ताओं को मथता रहा है।
भाजपा के रथ के सारथी बने बंशीधर
मगर इस प्रश्न से जुदा भाजपा के रथ के सारथी बंशीधर की निगाहें 2022 के चुनावी ‘महाभारत’ पर टिकी हैं। कमान संभालते ही उनकी जुबां से जो सबसे पहला शब्द निकला तो वह 2022 की चुनावी महाभारत का था।
विनम्र और हंसमुख स्वभाव के बंशीधर अनुभवी और चतुर नेताओं में गिने जाते हैं। ये उनकी राजनीतिक उपलब्धियों से बयान हो जाता है। 70 के दशक में जनसंघ से जुड़ने और किसानों के लिए संघर्ष करने के साथ ही वे पंचायत और सहकारी समितियों की चुनावी सियासत के खिलाड़ी रहे। वे पार्टी के उन चुनिंदा नेताओं में से हैं जो संघ और संगठन की विचारधारा की घुट्टी पीकर जमीन से सत्ता के शीर्ष तक पहुंचे हैं।
1991 में पहली बार नैनीताल विधानसभा से विधायक चुने जाने के बाद उन्होंने जीत का जो सिलसिला शुरू किया तो 1993 व 1996 तक जारी रहा। 2002 में इंदिरा से चुनाव हारने के बाद उन्होंने फिर हार का मुंह नहीं देखा। 2007 में उन्होंने खांटी सियासतदां डॉ.इंदिरा हृदयेश को हराकर हिसाब चुकता किया।
भट्ट की खींची लंबी लकीर लांघने की चुनौती
इस कार्यकाल में वे कैबिनेट मंत्री भी रहे। नैनीताल, हल्द्वानी और फिर कालाढूंगी विधानसभा से विधायक रहे बंशीधर पार्टी में हरबंस कपूर के बाद सबसे अधिक चुनाव जीतने वाले नेताओं में शुमार हैं। उनके इसी राजनीतिक अनुभव पर मुग्ध केंद्रीय नेतृत्व ने अपने युवा चेहरे के फॉर्मूले से हटकर उन्हें कमान सौंपी है।
प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अजय भट्ट के कार्यकाल में पार्टी ने कई चुनावी कामयाबियों की लंबी लकीर खींची हैं। भगत के सामने इस लकीर को लांघने की चुनौती है। दोनों नेता स्वभाव से काफी जुदा हैं। अजय भट्ट धीर- गंभीर नेता माने जाते हैं, जबकि भगत का स्वभाव विनम्र और हसंमुख है।
वे मुखर भी हैं। उनका सबसे मजबूत पक्ष उनका लंबा राजनीतिक अनुभव है। विधानसभा का चुनाव जीतने की कला वे अच्छे से जानते हैं। लेकिन अब उनके सामने पार्टी को विधानसभा चुनाव जिताने की जिम्मेदारी है। नैनीताल लोकसभा का चुनाव भारी मतों से जीतने से पूर्व अजय भट्ट अपने चुनाव क्षेत्र में कम अंतर से हारने का दंश झेल चुके हैं। लेकिन पार्टी को चुनाव जीताने का श्रेय उन्हें भी जाता है।