बाबा रामदेव ने बताया कौन होगा उनका उत्तराधिकारी, संभालेंगे पतंजलि का करोड़ों का राज-काज
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योग गुरु बाबा रामदेव ने अपने और आचार्य बालकृष्ण के उत्तराधिकारी की तलाश शुरू कर दी है। पहले चरण में बुधवार को 88 संन्यासियों को दीक्षित किया गया। यह दीक्षा कार्यक्रम रामनवमी तक जारी रहेगा। बाबा एक हजार वैदिक संन्यासियों को दीक्षित करेंगे, जिनमें से आगे चलकर कोई एक बाबा का उत्तराधिकारी बनेगा।
यूं तो बाबा रामदेव बारबार कहते रहे हैं कि उनकी दिनचर्या कुछ ऐसी है कि जो उन्हें दो सौ वर्षों तक जिंदा रखेगी। बाबा कहते है कि यह शरीर रोगों को जर्जर होता है और वे किसी रोग को पास नहीं फटकने देंगे।
इसके बावजूद नवरात्र के शेष बचे पांच दिनों में बाबा अनेक ऐसे युवक-युवतियों को दीक्षित कर रहे हैं जो उच्च शिक्षित हैं। इनमें से अनेक क्षेत्रों से आए साधक शामिल हैं। इंजीनियरिंग, चिकित्सा, वेदों और अन्य प्रकल्पों की उच्च शिक्षा ग्रहण कर आए छात्रों को दीक्षित करने का लंबा कार्यक्रम तैयार किया गया है।
बाबा रामदेव कहते हैं कि भगोड़ों को दीक्षित करना उनका उद्देश्य नहीं है। जो घरों से पलायन कर भागते हैं, उन्हें अन्यत्र दीक्षित किया जाता होगा पतंजलि में नहीं। वास्तव में ऋषियों ने उत्तराधिकार चयन की परंपरा गुरु और शिष्य के आधार पर तय की है। गृहस्थों की भांति संन्यासी का कोई परिवार नहीं होता, इसलिए गुरु अपने योग्य शिष्यों को ही अपना उत्तराधिकारी बनाता है।
बाबा रामदेव ने बताया कि देश-विदेश में कोई उद्योग चलाने वाला अपनी पत्नी, पुत्र या पुत्री को विरासत सौंपता है। तब यह नहीं देखा जाता कि वह उस परंपरा को निर्वाह करने के योग्य है या नहीं, लेकिन संन्यास जगत में ऐसा नही होता।
विशेषरुप से पतंजलि योगपीठ ऋषि परंपरा के अनुसार आचरण करेगी। देशभर में घूम-घूम कर एक हजार योग्य साधकों का चयन कर उनमें से किसी एक को पंतजलि की विशाल परंपरा का वाहक बनाया जाएगा।
इस दीक्षा समारोह में वैदिक यज्ञ कुंडों के माध्यम से नवसंन्यासियों को दीक्षित किया जा रहा है। यहां से निकले साधक रामनवमी के दिन देश के अनेक भागों में योग स्थापना के लिए भेजे जाएंगे। एक ऐसी परंपरा ऋषिकेंद्र से प्रारंभ हो रही है, जो इस रुप में आज तक कभी सामने नहीं आई।
हालांकि अखाड़ों में भी प्रत्येक कुंभ पर दीक्षा समारोह आयोजित कर हजारों संन्यासियों को दीक्षा दी जाती है, लेकिन उनमें से कोई अखाड़ा परंपरा का उत्तराधिकारी नहीं बनता। अखाड़ों में उत्तराधिकार चयन के बजाय उत्तराधिकार मनोनयन की परंपरा है। इसके विपरीत बाबा रामदेव ने संस्कार दीक्षा के माध्यम से उत्तराधिकार चयन की एक नई परंपरा को जन्म दिया है।