रामदेव का 'उत्थान' न होता तो योग का इतना नाम न होता
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पिछले 20 वर्षों में सचमुच योग क्रांति हो गई। हरिद्वार से शुरू हुई नव चेतना पूरे संसार तक पहुंची।
यह बात तय है कि यदि योगगुरु के रूप में रामदेव का उत्थान न होता तो योग का इतना नाम न होता। विश्व को पतंजलि के वे दुर्लभ और गूढ़ सूत्र रामदेव के जरिए सहज रूप से प्राप्त हो गए, जो अब तक किताबों में छिपे हुए थे।
प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र संघ में योग दिवस की चर्चा पर भारतीय योग को उच्चतम सोपान पर पहुंचा दिया। इससे पहले ऐसा न हो पाया था। रामदेव से पूर्व धीरेंद्र ब्रह्मचारी, प्रोफेसर एम लाल, स्वामी शिवानंद, स्वामी गणेशानंद, ओमकारानंद, स्वामी विद्यानंद सरस्वती, आयंगर जैसे अनेक योग मनीषियों ने विश्व का परिचय योग से कराया। भारत से गया योग पश्चिम में जाकर योगा तो बन गया, किंतु उसे अंतरराष्ट्रीय दिवस का दर्जा दिलाने की सोच रामदेव ने ही पैदा की।
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जब पूछा गया कि वर्ष का कौन सा दिन योग के नाम से अंतरराष्ट्रीय दिवस बन सकता है, तब प्रधानमंत्री ने बाबा रामदेव से जानकारी ली। रामदेव, आचार्य बालकृष्ण तथा पतंजलि योगपीठ के करीब 100 विद्वानों की टीम ने पूरे एक महीने तक खोजबीन कर 21 जून का दिन तय किया।
क्योंकि यह दिन सबसे लंबा होता है। 25 दिसंबर को भी पूरी दुनिया बड़ा दिन मानती है। वह दिन क्रिसमस के रूप में पहले ही विख्यात है। अत: बाबा द्वारा सुझाई गई 21 जून की तारीख ही अंतरराष्ट्रीय दिवस बन गई।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस से विश्व रोग मुक्ति का सूत्रपात हो रहा है। योग और प्राणायाम के साथ-साथ धीरे-धीरे ध्यान और अष्टांग योग को बढ़ावा दिया जाएगा। वह दिन दूर नहीं जब न केवल भारत अपितु पूरी दुनिया से रोग दूर भाग जाएंगे। योग को आयुर्वेद का साथ देकर दुनिया को महंगी दवाओं से मुक्ति दिलाई जाएगी। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस विश्व स्वास्थ्य की दिशा में मील का पत्थर बनेगा।
- योग गुरु बाबा रामदेव
कहां से चले थे और कहां आ पहुंचे...
कनखल के दिव्य योग मंदिर से वर्ष 1995 में योग का सफर शुरू हुआ था। रामदेव, बालकृष्ण और कर्मवीर की तिगड़ी ने योग का ऐसा शंखनाद किया कि योग पूरी दुनिया का बन गया। बाबा और आचार्य की जोड़ी आज भी यथावत बनी हुई है। कर्मवीर अवश्य नई राह पर निकल गए।
कृपालु महाराज के कनखल स्थित आश्रम में ये तीनों योगी शिक्षार्थी के रूप में आचार्य शंकरदेव के पास आए थे। देखते ही देखते गुरुकुलों से निकले रामदेव, बालकृष्ण और कर्मवीर ने दिव्य योग मंदिर को पूरे देश में लोकप्रिय बना दिया।
योग को जब व्यवसाय से जोड़ा जाने लगा तो आचार्य कर्मवीर इसके विरोध में साथ छोड़कर चले गए। यह और बात है कि आज कर्मवीर स्वयं भी उसी प्रकार के आयुर्वेदिक उत्पादन लेकर बाजार में हैं, जिनका उन्होंने विरोध किया था।
रामदेव ने जब हरिद्वार में संतों के भूपतवाला, सप्तऋषि, भीमगोड़ा और कनखल के गढ़ों को छोड़कर रुड़की की ओर रुख किया तो सभी ने आश्चर्य जताया था। किसी को भी नहीं लगा था कि बहादराबाद और रुड़की के बीच में बाबा की पतंजलि योगपीठ एक दिन योग का मक्का बन जाएगी।
यह स्वप्न जैसा ही लगता है, जो साधक साइकिल पर अपनी दवाओं का प्रचार करता था, वह अब योग का शिखर पुरुष बन चुका है। अलबत्ता दिव्य योग मंदिर का वह लाल भवन आज तक उसी रूप में कायम है, जहां से बाबा की योग यात्रा प्रारंभ हुई थी।
योग से कई बीमारियों के खत्म होने के परिणाम आए सामने
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाए जाने से गदगद बाबा रामदेव ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय दिवस का दर्जा देकर योग को विज्ञान मान लिया गया है। यह देश की बड़ी जीत है। पतंजलि पीठ द्वारा योग के प्रभाव पर पहली बार क्लीनिकल परीक्षण कराए गए। इनके परिणामों ने ही दुनिया को योग को विज्ञान मानने के लिए बाध्य किया।
अमर उजाला से फोन पर बाबा रामदेव ने कहा कि भारतीय उदात्त परंपराएं महान हैं। अष्टांग योग उन परंपराओं का एक हिस्सा है। आज दुनिया जिस ध्यान, धारणा, समाधि और आसनों को जानती है, उसे अभी और बहुत कुछ अभी जानना है। प्रसन्नता का विषय है कि योग को अब प्रत्येक वर्ष एक दिवस के रूप में याद किया जाएगा। जाहिर है भारतीय मनीषा का नया परिचय संसार से होने जा रहा है।
बाबा रामदेव ने कहा कि पतंजलि योगपीठ में पिछले 15 वर्षों में लाखों शिविरार्थियों के क्लीनिकल परीक्षण योग करने से पहले और बाद में कराए गए। पांच, सात अथवा 11 दिन के शिविरों में ही ब्लड प्रेशर, शुगर आदि कई बीमारियां कम या समाप्त होने के चमत्कारिक परिणाम सामने आए हैं।
इसका प्रचार पूरे विश्व में हुआ। दुनिया भर के लोगों को हमने इसके औषधीय गुणों से परिचित कराया। परिणामस्वरूप आज संसार को मुफ्त में स्वस्थ रहने का एक बड़ा अधिकार मिला है। 21 जून को दुनिया का एक-एक आदमी यदि योग करे तो नए युग का आगमन हो जाएगा।