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उत्तराखंड की राजनीति का केंद्र है गैरसैंण
अनूप वाजपेयी/ अमर उजाल, देहरादून
Updated Tue, 10 Jun 2014 04:19 PM IST
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भौगोलिक तौर पर गैरसैंण उत्तराखंड के केंद्र में स्थित है, तो राज्य गठन से अब तक राजनीति का भी केंद्र रहा है।
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अल्मोड़ा से सटा है गैरसैंण
कहने को गैरसैंण गढ़वाल के चमोली जिले की तहसील है लेकिन कुमाऊं के अल्मोड़ा से सटे होने की वजह से गैरसैंण को लेकर पूरे उत्तराखंड की भावना एक सी दिखती है।
गैरसैंण का महत्व उत्तराखंड बनने से भी पहले का है। राज्य बनाने की मांग में शामिल अग्रणी संगठन उत्तराखंड क्रांति दल ने अस्सी केदशक में राज्य का जो खाका खींचा था उसमें गैरसैंण राजधानी के रूप में सामने आई थी।
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गैरसैंण को राजधानी बनाने के लिए भी राजनीति होती रही है तो न बने इसकेपीछे भी राजनीति है। राज्य गठन के बाद मैदानी इलाकों का समावेश होने और मूलभूत सुविधाओं को देखते हुए फौरी तौर पर देहरादून को राजधानी बना दिया गया।
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देहरादून राजधानी के तौर पर स्थापित हुई है और अब तक आठ मुख्यमंत्रियों की सरकारें यहीं से चली हैं। बावजूद गैरसैंण से लोगों की भावनाएं जुड़ी होने के चलते ही राजनैतिक दलों का अपनापन दिखता रहा है।
पहाड़ों से घिरे गैरसैंण में 1994 में उत्तराखंड क्रांति दल ने राजधानी की नींव का पत्थर भी लगा दिया था। 2012 में विजय बहुगुणा सरकार ने गैरसैंण में कैबिनेट की बैठक कर मैसेज देना चाहा।
आज शिलान्यास का पत्थर भी गायब
फिर पार्टी में एक गुट विशेष के दबाव में बहुगुणा ने वहां विधानभवन का शिलान्यास भी करा दिया। हालांकि बहुगुणा सरकार ने गैरसैंण में जिस स्थान पर विधानभवन के शिलान्यास का पत्थर लगवाया था आज वह पत्थर भी गायब है।
बहुगुणा ने इस मुद्दे को सुलझाना चाहा लेकिन विधानभवन का पेंच उनकी सरकार में और उलझ गया जब देहरादून के राजपुर में स्थायी विधानभवन की घोषणा हुई।
उत्तराखंड के राजनेताओं में एक तबका ऐसा भी रहा है जो जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर ग्रीष्मकालीन राजधानी की वकालत करता रहा है।
प्रदेश में राजधानी कहां बने इसे लेकर उत्तराखंड के पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद ने दीक्षित आयोग का गठन किया था। आयोग के गठन को लेकर ही आठ बार उसका एक्सटेंशन किया। दीक्षित आयोग ने 2008 में अपनी रिपोर्ट सौंप थी।
उनकी रिपोर्ट में गैरसैंण को जनभावनाओं की दृष्टि से सबसे ऊपर जगह मिली थी। हालांकि आयोग ने देहरादून में भी दो जगह सुझाईं थीं जहां विधानभवन बनाने की बात कही गई थी।
दीक्षित आयोग का राजधानी के लिए देहरादून और गैरसैंण समेत कुल आठ प्रस्ताव मिले थे। प्रदेश में सरकारें बदलीं लेकिन कमोवेश सभी केएजेंडे में किसी न किसी रूप में गैरसैंण शामिल रहा।
हरीश रावत इशारे में यह तो जरूर कह रहे हैं कि पहले बहू आने दें फिर पोते की बात करें लेकिन सरकार की असल मंशा क्या इसका खुलासा नहीं कर रहे हैं।
कैबिनेट की बैठक या फिर टैंट में विधानसभा सत्र चलाना भावनाओं की कद्र नहीं बल्कि उन्हें भड़काने की तरह है। अगर सचमुच गैरसैंण में ग्रीष्मकालीन सत्र चलाना है तो इसके लिए पहले ढांचागत सुविधाओं की व्यवस्था करनी होगी।