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कैंट बोर्ड भंग होते ही बिछने लगी चुनाव की बिसात
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देहरादून। उत्तराखंड के नौ कैंट बोर्डों के साथ ही देशभर के 56 कैंट बोर्ड बुधवार को भंग हो चुके हैं। बृहस्पतिवार से कैंट बोर्ड वैरी बोर्ड के हवाले हो गए हैं। बोर्ड भंग होते ही कैंट क्षेत्रों में चुनावों की बिसात बिछनी शुरू हो गई है। निवर्तमान सभासद हो या पूर्व में मात खा चुके प्रत्याशी या नए प्रत्याशी। सभी अपने-अपने वार्डों में सक्रियता बढ़ाने की जुगत में हैं। भाजपा-कांग्रेस ने भी कैंट क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ानी शुरू कर दी है।
बता दें, कैंट बोर्डों का कार्यकाल बुधवार को समाप्त हो चुका है। बृहस्पतिवार से कैंट बोर्डों में वैरी बोर्ड ने काम करना शुरू कर दिया है। कैंटोनमेंट एक्ट 2006 में संशोधन की प्रक्रिया चल रही है। लिहाजा एक साल से पहले चुनाव की संभावना कम ही है। इसके बावजूद चुनाव लड़ने वाले सक्रिय हो चुके हैं। किसी ने किसी बहाने वे अपने वार्ड में सक्रियता दिखाने की तैयारी में हैं। भाजपा और कांग्रेस ने भी कैंट क्षेत्रों में अपनी निगाहें गढ़ा ली हैं। दो दिन में पहले कैंट गढ़ी में तीन बार कैंट उपाध्यक्ष रही राजेंद्र कौर सौंधी और सभासद मधु खत्री का कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल होने को भी कैंट बोर्ड चुनाव की तैयारियों के तौर पर देखा जा रहा है। इसके साथ ही अब विभिन्न समस्याओं को लेकर चुनाव लड़ने के इच्छुक नेताओं ने कैंट बोर्ड कार्यालयों में धरने-प्रदर्शन करना शुरू कर दिए हैं।
सालभर रुतबा कायम रखना चुनौती
कैंट बोर्ड के निवर्तमान सभासदों को उम्मीद थी कि बोर्डों के भंग होने से कैंट क्षेत्रों में चुनाव के लिए भी अभिसूचना भी जारी जाएगी। लेकिन इसको दरकिनार करते हुए रक्षा मंत्रालय की ओर से कैंट बोर्डों को भंग कर वैरी बोर्ड के गठन को मंजूरी दी गई है। संभावना जताई जा रही है कि कम से कम एक साल तक वैरी बोर्ड ही काम करेंगे। ऐसे में निवर्तमान सभासदों को अपने वार्डों में रुतबा कायम करना किसी चुनौती से कम नहीं है। पूर्व उपाध्यक्ष क्लेमेंटटाउन भूपेंद्र कंडारी, सुनील कुमार, कैंट गढ़ी के सभासद कमलराज, विनोद पंवार भी इससे इत्तेफाक रखते हैं अब एक साल और उन्हें जनता के बीच रहकर काम करना पडे़गा। जबकि नए प्रत्याशियों के लिए सालभर वार्डों में सक्रिय होकर अपना जनाधार बनाने का मौका मिल रहा है।
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बता दें, कैंट बोर्डों का कार्यकाल बुधवार को समाप्त हो चुका है। बृहस्पतिवार से कैंट बोर्डों में वैरी बोर्ड ने काम करना शुरू कर दिया है। कैंटोनमेंट एक्ट 2006 में संशोधन की प्रक्रिया चल रही है। लिहाजा एक साल से पहले चुनाव की संभावना कम ही है। इसके बावजूद चुनाव लड़ने वाले सक्रिय हो चुके हैं। किसी ने किसी बहाने वे अपने वार्ड में सक्रियता दिखाने की तैयारी में हैं। भाजपा और कांग्रेस ने भी कैंट क्षेत्रों में अपनी निगाहें गढ़ा ली हैं। दो दिन में पहले कैंट गढ़ी में तीन बार कैंट उपाध्यक्ष रही राजेंद्र कौर सौंधी और सभासद मधु खत्री का कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल होने को भी कैंट बोर्ड चुनाव की तैयारियों के तौर पर देखा जा रहा है। इसके साथ ही अब विभिन्न समस्याओं को लेकर चुनाव लड़ने के इच्छुक नेताओं ने कैंट बोर्ड कार्यालयों में धरने-प्रदर्शन करना शुरू कर दिए हैं।
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सालभर रुतबा कायम रखना चुनौती
कैंट बोर्ड के निवर्तमान सभासदों को उम्मीद थी कि बोर्डों के भंग होने से कैंट क्षेत्रों में चुनाव के लिए भी अभिसूचना भी जारी जाएगी। लेकिन इसको दरकिनार करते हुए रक्षा मंत्रालय की ओर से कैंट बोर्डों को भंग कर वैरी बोर्ड के गठन को मंजूरी दी गई है। संभावना जताई जा रही है कि कम से कम एक साल तक वैरी बोर्ड ही काम करेंगे। ऐसे में निवर्तमान सभासदों को अपने वार्डों में रुतबा कायम करना किसी चुनौती से कम नहीं है। पूर्व उपाध्यक्ष क्लेमेंटटाउन भूपेंद्र कंडारी, सुनील कुमार, कैंट गढ़ी के सभासद कमलराज, विनोद पंवार भी इससे इत्तेफाक रखते हैं अब एक साल और उन्हें जनता के बीच रहकर काम करना पडे़गा। जबकि नए प्रत्याशियों के लिए सालभर वार्डों में सक्रिय होकर अपना जनाधार बनाने का मौका मिल रहा है।
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