अमर उजाला संवाद : जब निजी ऑपरेटर फल-फूल रहे तो रोडवेज हाशिये पर क्यों?
- राज्य गठन के बाद से उत्तराखंड रोडवेज में नहीं हुआ विस्तार, मौजूदा समय में महज 1364 बसें
- रोडवेज की बसों की तुलना में करीब ढाई गुना हैं निजी बसों की संख्या, तेजी से हो रहा विस्तार
- रोडवेज को हिमाचल सरकार देती है 400 करोड़, उत्तराखंड सरकार देती है महज 10 करोड़ सालाना
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किसी भी प्रदेश में सार्वजनिक परिवहन सुविधाओं की स्थिति से राज्य की तरक्की को आंका जा सकता है। यही वजह है कि हर राज्य सार्वजनिक परिवहन सेवाओं के विकास को प्राथमिकता में रखता है। मगर, उत्तराखंड में हालात इसके ठीक उलट नजर आते हैं। राज्य गठन के बाद सार्वजनिक परिवहन सेवाओं में जो विस्तार होना था, वो हो ही नहीं पाया।
तभी तो राज्य गठन के नौ वर्ष बाद भी रोडवेज के पास महज 1364 बसों का ही बेड़ा है। उनमें भी कई बसों की सेवा समाप्ति की कगार पर है। वो भी तब जब इसी प्रदेश में निजी परिवहन सेवाओं का तेजी से विस्तार हो रहा है। सवाल उठता है कि क्या सरकार और जिम्मेदार अधिकारी आम जनता का सुविधाजनक एवं रियायती दर पर परिवहन सुविधा मुहैया कराने को लेकर गंभीर नहीं हैं?
किसी भी राज्य के रोडवेज के विकास में सरकार की सहायता को जरूरी समझा जा सकता है। तभी सरकारें सार्वजनिक परिवहन के विस्तार के लिए हर वर्ष आर्थिक सहायता देती हैं। मगर, जानकर हैरानी होगी कि वर्तमान में प्रदेश सरकार की ओर से रोडवेज को 10 करोड़ सालाना मदद की जा रही है, जबकि रोडवेज घाटे में चल रहा है।
वहीं, हमारा पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश हर साल 400 करोड़ रुपये की मदद कर रहा है। यही कारण है कि रोडवेज निरंतर कर्ज तले दब रहा है। यह प्रदेश की जनता का दुर्भाग्य की कहा जा सकता है कि सरकारों के लिए रोडवेज का महत्व महज लाभ अर्जित करने तक सीमित रह गया और आम आदमी को आरामदायक परिवहन सुविधा मुहैया कराना सरकार की प्राथमिकता में कभी रहा ही नहीं।
अब पहाड़ के दुर्गम क्षेत्रों को ही ले लीजिए, ऐसे दर्जनों रूट हैं जहां आज भी सार्वजनिक परिवहन सेवाएं न के बराबर हैं। जब भी इन क्षेत्रों में सार्वजनिक बसों के संचालित करने की बात होती तो रोडवेज के अधिकारी उन रूटों पर घाटे का बहाना बनाने लगते हैं। कहीं न कहीं इसी से जिम्मेदार अधिकारियों की आमजन के प्रति उदासीन रवैया का प्रमाण कहा जा सकता है।
वहीं, अधिकारियों द्वारा घाटे का बहाना बनाया जाना भी अपने आप में सवाल खड़ा करता है, क्योंकि प्रदेश में भले ही सार्वजनिक परिवहन तंगी का सामना कर रहे हों, लेकिन निजी परिवहन सेवाएं मुनाफा कैसे कमा सकती हैं। आज निजी क्षेत्रों की 3500 बसें संचालित हैं। इसमें हर साल तेजी से वृद्धि दर्ज की जा रही है।
जबकि, रोडवेज की बसें सीमित रह गई हैं। आखिर क्या कारण है कि निजी परिवहन तो खूब फल-फूल रहे हैं और सार्वनिक परिवहन लगातार हाशिये पर पहुंचते नजर आ रहे हैं। इस ओर जिम्मेदारों को गंभीरता से सोचने की जरूरत है।
आईएसबीटी के पास से चलती हैं डग्गामार बसें
राजधानी से ही दूसरे शहरों के लिए डग्गामार बसें धड़ल्ले से चल रही हैं। खासकर आईएसबीटी के आसपास के क्षेत्रों से इन बसों का संचालन किया जा रहा है। शुक्रवार को अमर उजाला संवाद में डग्गामारी का यह मुद्दा प्रमुखता से उठा।
पूर्व राज्यमंत्री एवं भाजपा नेता रविंद्र जुगरान ने कहा कि डग्गामारी तेजी से बढ़ रही है। बड़ी-बड़ी डीलक्स बसें सड़कों पर खड़ी रहती हैं। यात्री इनमें एसी जैसी सुविधाओं के लालच में आकर यात्रा तो करते हैं लेकिन यह बेहद खतरनाक भी हो सकता है। रविंद्र जुगरान ने आरोप लगाया कि डग्गामारी की यह परंपरा, विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से ही चल रही है।
इन डग्गामार बसों का कहीं कोई हादसा हो गया तो उस पर यात्रियों को सरकार से कोई लाभ या सुविधा भी नहीं मिल पाएगी। परिवहन निगम महाप्रबंधक दीपक जैन ने भी स्वीकार किया कि आईएसबीटी समेत राजधानी के विभिन्न इलाकों से डग्गामार वातानुकूलित बसों का संचालन हो रहा है, जिसके चलते निगम को भारी नुकसान हो रहा है।
...सवारियों को लेकर गली में घुस गए डग्गामार
अमर उजाला संवाद में पहुंचे रोडवेज कर्मचारी संयुक्त परिषद के प्रदेश महामंत्री दिनेश पंत ने डग्गामारों की सेटिंग की पोल भी खोली। उन्होंने बताया कि सहस्रधारा क्षेत्र में चार वातानुकूलित बसों का संचालन किया जा रहा है। जिसे पकड़ने के लिए विभागीय टीम ने जाल बिछाया। मामले की जानकारी परिवहन विभाग के अधिकारियोें को भी दी गई। लेकिन विभाग से ही किसी ने यह सूचना डग्गामार बस संचालकों को लीक कर दी। चालक सवारियों से भरी बस लेकर फरार हो गए। दिलचस्प पहलू यह है कि जिस बस को साढ़े नौ बजे रवाना होना था, वह डेढ़ बजे तक एक जगह खड़ी रही और यात्री एसी में यूं ही खड़ी बस में सोते रहे।
धड़ल्ले से हो रही ऑनलाइन बुकिंग
संवाद में इस बात का भी खुलासा हुआ कि कई आपरेटर्स यात्रियों की ऑनलाइन बुकिंग कर रहे हैं। इसकी कोई जानकारी परिवहन विभाग व निगम अधिकारियों को नहीं है। चौंकाने वाली बात यह है कि निजी आपरेटर्स द्वारा विभागीय अधिकारियों, कर्मचारियों से मिलीभगत करके आईएसबीटी से नई दिल्ली, गुरुग्राम, जयपुर, चंडीगढ़, शिमला समेत तमाम स्थानों के लिए वातानुकूलित बसों का अवैध संचालन किया जा रहा है।
क्या कहता है एमवी एक्ट
मोटर व्हीकल एक्ट के मुताबिक, राष्ट्रीय राजमार्गों पर बसों के संचालन का पहला हक राज्य के परिवहन निगम की बसों को है। उसके बाद परिवहन विभाग की अनुमति व संबंधित परिवहन निगम के अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करने के बाद निजी बसों के संचालन को अनुमति दी जा सकती है। लेकिन निगम से अनापत्ति के लिए बस संचालकों को एकमुश्त भुगतान करना होगा।
बस अड्डे से बाहर बसें दिखें तो सावधान रहें
अगर आईएसबीटी से बाहर कोई चमकती हुई डीलक्स बस दिखे तो सावधान रहें। यह डग्गामार हो सकती है। बस को लेकर जरा भी संशय है तो आईएसबीटी स्थित इन्क्वायरी काउंटर पर जाएं। यहां पूछताछ करने के बाद ही बस में यात्रा करें।
आईएसबीटी समेत राजधानी के विभिन्न इलाकों में वातानुकूलित बसों समेत गाड़ियों की डग्गामारी की जानकारी नहीं है। यदि ऐसा है तो यह गंभीर मामला है। इस संबंध में जल्द ही विभागीय टीम गठित कर कार्रवाई की जाएगी। डग्गामार गाड़ियोें के संचालन पर पूरी तरह रोक लगाई जाएगी।
- डीसी पठोई, आरटीओ