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अमर उजाला संवाद: घर से थाने तक सब समाज का हिस्सा, प्रत्येक निभाएं अपना रोल 

Fri, 07 Feb 2020 10:36 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Fri, 07 Feb 2020 10:36 PM IST
सार

  • महिला अपराध रोकने की जिम्मेदारी, जितनी पुलिस की उतनी परिजनों की  
  • अमर उजाला संवाद में महिला पुलिस अधिकारियों और विभिन्न क्षेत्रों की महिलाओं ने रखी अपनी राय 

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amar ujala samvad : Everyone is part of society, each should play their role
samvad - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

महिला अपराध रोकने की जिम्मेदारी जितनी पुलिस की है उतनी ही परिवारों की भी है। क्योंकि, घर से थाने तक सभी समाज का हिस्सा होते हैं। इसमें हर किसी को अपना अहम रोल अदा करना होगा। यह विचार शुक्रवार को अमर उजाला संवाद में महिला पुलिस अधिकारियों और विभिन्न क्षेत्रों की महिलाओं ने रखे।

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संवाद में निर्भया कांड के बहाने महिला अपराधों और रोकथाम पर चर्चा हुई। मुख्य वक्ता के रूप में मौजूद डीआईजी रिदिम अग्रवाल ने कहा कि हमें सबसे पहले अपने परिवार में सुरक्षित माहौल देना होगा। बच्चों, महिलाओं और बेटियों को अच्छे-बुरे की समझ करानी होगी। इसकी शुरूआत घर से होते हुए पुलिस तक जाती है। लेकिन, पुलिस इसमें बहुत बाद का हिस्सा होता है। लिहाजा, स्थिति में सुधार के लिए सभी को अपने-अपने रोल को पहचानकर जिम्मेदारी के साथ निभाना होगा। 
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इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्र की महिलाओं ने अपने अनुभवों के आधार पर बेबाकी से विचार रखे। महिलाओं ने उस दर्द को भी मंच पर रखा, जिसमें बच्चियों के गुनहगार कोई और नहीं बल्कि उसके घर वाले ही होते हैं। ऐसी कुछ वारदातों की सच्चाई जब मंच पर आई तो सभी की आंखें नम हो गईं। इन वारदातों की रोकथाम पर चर्चा हुई तो बात सिर्फ परिवार और समाज की जिम्मेदारी पर आकर अटक गई। वक्ताओं ने कहा कि हमें सबसे पहले अपने परिवार को बदलना होगा। उसके बाद कानून को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

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साइबर अपराध का भी केंद्र बन रही महिलाएं 

दशकों से महिला अपराध एक बड़ा मुद्दा रहा है। तमाम तरह से महिलाओं को शिकार बनाया जाता रहा है। अब तकनीक के दौर में भी महिलाओं की यही स्थिति है। साइबर अपराध का केंद्र भी महिलाएं ही बनती जा रही हैं। डीआईजी एसटीएफ (साइबर अपराध) रिदिम अग्रवाल ने बताया कि साइबर अपराध के लगभग 60-70 फीसदी मामलों में महिलाएं शिकार बन रही हैं। फिर चाहे पोर्नोग्राफी हो या फिर आर्थिक धोखाधड़ी। ऐसे में महिलाओं को अब साइबर अपराध के बारे में जागरूक करने की ज्यादा जरूरत है।

महिला अपराध की जड़ तक नहीं पहुंचे हम 

महिला अपराध रोकने और दोषियों को सजा दिलाने के लिए कई कानूनों में बदलाव किए गए हैं। बच्चियों और महिलाओं से होने वाले दुष्कर्म के मामलों में फास्ट ट्रैक कोर्ट तक बना दी। निसंदेह उन्हें न्याय मिल रहा है। मगर, आजादी के इतने लंबे समय बाद भी हम इस अपराध की जड़ तक नहीं पहुंच पाए हैं। वक्ताओं ने कहा कि हमने कागजों, विभिन्न मंचों पर चर्चा जरूर की हैं, लेकिन ऐसा कोई सिस्टम विकसित नहीं किया है जिससे इसकी जड़ पर वार किया जा सके।
 

कानून के क्षेत्र में सबसे बड़ी जिम्मेदारी पुलिस की 

कानून है तो उसका दुरुपयोग भी होता है। लेकिन, इसे रोकना पुलिस के हाथ में होता है। क्योंकि, कानून के क्षेत्र में पुलिस की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है। किसी भी अपराध में सिर्फ पुलिस उसे नजदीक से देखती है, जिसके बाद सुबूतों और गवाहों का दौर चलता है। ऐसे में यदि अपराधी छूट जाते हैं तो इसमें चूक भी पुलिस की मानी जाती है। 

संवाद कार्यक्रम में चर्चा इस बात पर भी हुई कि महिला अपराध के मामलों में महिलाएं केवल हथियार के रूप में इस्तेमाल होती हैं। इसके लिए दहेज का कानून विवादों में रहा है। अब दुष्कर्म और छेड़छाड़ जैसे मामलों में ऐसा कुछ देखने को मिलता है। कुछ दिन पहले सिल्वर स्क्रीन पर फिल्म सेक्शन 375 में भी कुछ यही दिखाने का प्रयास किया था। वक्ताओं ने कहा कि ऐसे मामलों में पुलिस पर भी सवाल उठते हैं। 

डीआईजी रिदिम अग्रवाल ने बताया ऐसे मामलों में पुलिस की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। अपराध की सूचना से अदालत में फैसले तक हर चीज पुलिस के सामने होती है। सही मायनों में पुलिस को प्राथमिक जांच के बाद पता चल जाता है कि वास्तव में गुनहगार कौन है? लिहाजा, पुलिस पहले से इस बात का फैसला अपने मन में बनाकर चलती है कि किसे सजा होनी चाहिए और कहां कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है। इन्हीं मामलों को देखते हुए अब एफआईआर के नियम भी बदल दिए हैं। कई अपराधों की सूचना में एफआईआर से पहले जांच जरूरी होती है। 

महिलाओं को खुद आना होगा सामने 

महिला अपराधों के मामलों में कई बार यह देखने में आता है कि मुकदमा विशेष किसी को फंसाने या रंजिशन दर्ज कराया गया था। इनमें भी ज्यादातर महिलाओं या बच्चियों को यह पता नहीं होता कि उन्हें हथियार बनाया जा रहा है। ताकि, कोई खुन्नस निकाल सके। ऐसे में अब यह जागरूकता के माध्यम से दूर किया जा सकता है। यदि इनमें जागरूकता आएगी तो वे इस तरह हथियार बनने से बच सकती हैं।

ये रहे उपस्थित 

डीआईजी एसटीएफ रिदिम अग्रवाल, आईपीएस भदाणे विशाखा अशोक, पार्षद अमिता सिंह, कोमल वोहरा, समिधा गुरुंग, संगीता गुप्ता, एसआई प्रमिला बिष्ट, आशा पंचम, सरिता बिष्ट, अनिता बिष्ट, नीमा रावत, सिपाही सुहाती, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता मीनाक्षी रावत, मंजू मौर्या, रेखा नेगी, सुमति थपलियाल, रानी श्रीवास्तव, शिक्षक आशा नेगी, गोदावरी शर्मा, पार्षद मीना बिष्ट, पार्षद उर्मिला, डॉ. हर्षिता, आयुषी बिष्ट, अर्चना शर्मा, चिराग धवन, भवदीप।  

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