Amar Ujala Samvad: कारोबारी बोले- रेरा के पास असीमित अधिकार, खरीदारों का पैसा पहले, बैंक का बाद में
कारोबारियों का कहना है कि वर्ष 2018 से वे हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। करीब 90 लोगों की जीवनभर की पूंजी फ्लैटों में लगी हुई है लेकिन सरकारी तंत्र सुनने को तैयार नहीं है।
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पुष्पांजलि की आर्किड पार्क और अन्य परियोजनाओं में जीवनभर की पूंजी लगाने के बाद भी खरीदारों को फ्लैट नहीं मिल रहे हैं। बिल्डर पर मुकदमे दर्ज कराए गए तो वह फरार हो गया। पांच साल से फ्लैट के लिए लड़ाई लड़ रहे खरीदार बुधवार को अमर उजाला के संवाद कार्यक्रम में पहुंचे और अपना दर्द बयां किया।
कहा, वर्ष 2018 से वे हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। करीब 90 लोगों की जीवनभर की पूंजी फ्लैटों में लगी हुई है लेकिन सरकारी तंत्र सुनने को तैयार नहीं है। भू-संपदा नियामक प्राधिकरण (रेरा) से भी इंसाफ नहीं मिल पा रहा है। आरोप लगाया कि रेरा कठपुतली बनकर काम कर रहा है। वहीं, रेरा के पूर्व सदस्य एमसी जोशी ने कहा कि प्राधिकरण के पास असीमित अधिकार हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि बैंक का पैसा बाद में है, पहले खरीदारों का पैसा है। बैंक ने केवल लोन दिया है जबकि खरीदारों की मेहनत की पूंजी लगी है।
ऐसे में जब तक प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो पाएगा, फ्लैट नहीं बिकेंगे और बैंक का पैसा नहीं निकलेगा। ऐसी स्थिति में बैंक से वार्ता कर बीच का रास्ता निकालना चाहिए। नए बिल्डर से अधूरा निर्माण पूरा कराकर फ्लैटों को बेचकर बैंक और खरीदारों दोनों को राहत मिल सकती है।
इसलिए रेरा को खरीदारों के हक की लड़ाई में अपने अधिकारों को पहचानकर उनका प्रयोग करना होगा। खरीदारों ने कहा कि सरकारी तंत्र पुष्पांजलि समेत अन्य परियोजनाओं के बिल्डर्स को बचाने में लगा है। इन लोगों ने वर्ष 2016 में फ्लैट बुक कराया। पहले चेक से भुगतान लिया गया। बाद में कैश देने का दबाव बनाया गया तो नकद भुगतान किया गया। लेकिन, निर्माण बीच में ही रोक दिया गया। इस बीच खरीदारों की जीवनभर की पूंजी लेकर बिल्डर फरार हो गया। कहा, पुष्पांजलि इंफ्राटेक प्रा. लि. की धोखाधड़ी के शिकार बायर्स हर जगह गुहार लगा चुके हैं लेकिन आर्किड पार्क और एमिनेंट हाइट्स के फ्लैट खरीदारों को कहीं से इंसाफ नहीं मिल रहा है।
सरकारी तंत्र दे रहा भगोड़े बिल्डर को संरक्षण
खरीदारों ने कहा, सरकारी तंत्र पुष्पांजलि के निदेशक दीपक मित्तल और उसकी पत्नी राखी मित्तल समेत एक अन्य निदेशक राजपाल वालिया को संरक्षण दे रहा है। नौ मुकदमे और रेरा में 61 शिकायतें दर्ज होने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। पहले तो पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज करने में छह माह लगा दिए। इसके बाद भी आरोपी हरिद्वार में अपनी जमीन बेच गया। यह तंत्र की नाकाफी है। मुख्यमंत्री के यहां शिकायत की गई तो बगैर निस्तारण के रिपोर्ट दे दी गई कि शिकायत निपट गई। केंद्रीय शहरी विकास मंत्री हरदीप सिंह पुरी से शिकायत की, पर वहां से भी कोई राहत नहीं मिली।किसी और बिल्डर से निर्माण कराने पर जोर
खरीदारों ने कहा कि सेक्शन-8 का प्रयोग कर जैसे आम्रपाली प्रोजेक्ट को एनबीसीसी के हवाले कर फ्लैटों का निर्माण पूरा कराया गया, वैसे ही पुष्पांजलि इंफ्राटेक के फ्लैैटों को किसी अन्य डेवलपर से पूरा कराया जाए। रेरा इसमें असमर्थता क्यों जाहिर कर रहा है। रेरा अधिकार दिलाए तो अधूरी परियोजना का निर्माण कराने के लिए बिल्डर वे खुद लाएंगे। आरोप लगाया कि रेरा की लापरवाही के कारण ही ईडी ने बिल्डर्स की संपत्ति को अटैच कर लिया है। अब रेरा, ईडी से पूछ रहा है कि खरीदारों के हित में क्या किया।सेक्शन-8 देता है रेरा को असीमित कार्रवाई की ताकत
बतौर विशेषज्ञ पहुंचे सेवानिवृत्त आईएएस एवं रेरा के पूर्व सदस्य एमसी जोशी ने कहा कि खरीदारों को हक दिलाने के लिए प्राधिकरण उपयुक्त मंच है। इसके लिए खरीदारों को जागरूक होना चाहिए। कई बार बिल्डर्र अपना प्रभाव बना ले जाने में कामयाब हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि सेक्शन-8 रेरा को काफी अधिकार देता है। इसमें रेरा को असीमित कार्रवाई करने की ताकत मिली है। एसोसिएशन ऑफ बायर्स को अधिकार है कि वह अपने हक की लड़ाई लड़े।रेरा के औचित्य पर उठाए सवाल
पुष्पांजलि की आर्किड पार्क और अन्य परियोजना में मेहनत की पूंजी लगाने के बाद भी फ्लैट नहीं मिलने के बाद साल 2018 से बायर्स की लड़ाई लड़ रही हूं। पुष्पांजलि का निदेशक दीपक मित्तल और उसकी पत्नी राखी मित्तल 2020 से फरार हैं। एक अन्य निदेशक राजपाल वालिया खुलेआम घूम रहा है। पुलिस में नौ मुकदमे दर्ज हैं और रेरा में 61 शिकायतें दर्ज कराई गई हैं। वर्ष 2018 से बिल्डर ने निर्माण बंद करा रखा है। इसके बाद भी सुनवाई नहीं हो रही है। जब रेरा में सुनवाई नहीं तो इसका औचित्य क्या है।
- कविता भाटिया
बिल्डरों ने उनकी जीवन भर की खून पसीने की कमाई को लूट लिया है। सभी लोग न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। कहने को रेरा को बायर्स के हितों की रक्षा के लिए बनाया है। लेकिन वहां भी सुनवाई नहीं हो रही है। वहां भी उन्हें कई बार बुलाया जाता है, लेकिन सुनवाई नहीं होती है। कहा जा रहा है कि कोर्ट की शरण लोग। पुलिस भी मामले में खानापूर्ति कर रही है। आखिर पीड़ित जाए तो जाए कहां। अब एकजुट होकर लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन जिस प्रकार से रेरा की ओर से हाथ खड़े जा रहे हैं।
- ईरा
सालों से अपना हक पाने के लिए भटक रहे हैं। रेरा की ओर से न तो उचित कार्रवाई तो दूर बायर्स जहां जाते हैं तो उनसे अच्छा व्यवहार तक नहीं किया जाता है। उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से फ्लैट के लिए आवेदन किया था। लेकिन न तो उन्हें फ्लैट मिला है और न ही उनके पैसें वापस मिले हैं। रेरा को कई अधिकार मिले हैं, लेकिन वह अपने अधिकारों का प्रयोग नहीं कर रहा है।
- मिथलेश
लाखों रुपये खर्च किए और छह साल से रेरा के चक्ककर काटते-काटते परेशान हो गए हैं। लेकिन आज तक उन्हें न्याय नहीं मिला है। रेरा की ओर से खाली उन्हें बार-बार बुलाया जाता है लेकिन आज तक न तो उन्हें फ्लैट दिलवाया गया और न ही उनके पैसे आज तक वापस हुए। आज भी वह रेरा के चक्कर काट रहे हैं। ऐसे में रेरा का क्या औचित्य रह गया, समझ से परे हैं।
- आलोका
रेरा में बिल्डर्स बिना बकालतनामा किए वकीलों को पेश कर रही है। लेकिन रेरा इसके बाद भी उनकी ही सुन रही है। बायर्स की बात सुनने को रेरा तैयार नहीं है। जबकि पीड़ित इस बात की शिकायत रेरा से कर चुके हैं। लेकिन रेरा की ओर से पीड़ितों की बजाए बिल्डरों की ज्यादा सुनवाई हो रही है। जिसके कारण आज सैकड़ों लोग धक्का खाने को मजबूर हो रहे हैं।
- शिखा
रेरा को असीमित अधिकार दिए गए हैं। लेकिन रेरा अपने अधिकारों का प्रयोग नहीं कर रहा है। इसलिए आज सैकड़ों शिकायतों के बाद भी बिल्डर लोगों की खून-पसीने की कमाई को लूट रहे हैं। जबकि बिल्डरों की मनमानी पर रोक लगाने को ही रेरा का गठन किया गया है। रेरा बायर की शिकातयों को भी गंभीरता से नहीं लेता है।
- टीएन जोहर
रेरा के पास असीमित अधिकार हैं। एक्ट भी सरल है। लेकिन इसके बाद भी पीड़ितों को समय से न्याय नहीं मिल पा रहा है। जो गंभीर विषय है। पीड़ितों को चाहिए कि रेरा में अगर सुनवाई नही हो रही है, तो वह अपीलेंट कोर्ट का दरवाजा खटखटाए। अगर उन्हें रिसीविंग और कार्रवाई की जानकारी नहीं दी जा रही है तो वह आरटीआई का सहारा लें और कोर्ट में इन दस्तावेजों को रखें।
-शिवा वर्मा अधिवक्ता