फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   amar ujala chaupal

लोकतंत्र के पर्व में हाशिये पर अन्नदाता

Mon, 21 Apr 2014 10:29 AM IST
अमर उजाला, देहरादून
अमर उजाला, देहरादून Updated Mon, 21 Apr 2014 10:29 AM IST
विज्ञापन
amar ujala chaupal

छात्र, युवा, बुजुर्ग, नौकरीपेशा, उद्यमी हर दल के घोषणापत्रों में इन वर्गों के लिए योजनाओं का पुलिंदा जुटाया गया है। लेकिन, अन्नदाता किसानों को लोकतंत्र के महापर्व में हाशिये पर रख दिया गया है।

विज्ञापन


कहीं भूख तो कहीं गरीबी का दंश
देश संसदीय चुनाव 2014 में 16 वीं लोकसभा के लिए अपने प्रतिनिधियों को भेजने की तैयारी में जुटा है। लेकिन देश की भूख मिटाने वाले किसान आज भी बदतर हालात में जी रहे हैं। कहीं भूख तो कहीं गरीबी का दंश उन्हें खा रहा है।
विज्ञापन


न तकनीक, न शोध, न योजनाएं, न खेती के अच्छे तरीके, न फसल का लाभ और न सरकार से कोई खास मदद। आखिर कब तक इन हालात में जीएंगे।

यही वजह है कि अन्नदाता अब रोजगार की तलाश में खेतों को बंजर छोड़ शहरों की ओर पलायन करने लगे हैं। यह दर्द उभरा रविवार को अमर उजाला फाउंडेशन के चुनावी संवाद कार्यक्रम में।
विज्ञापन
विज्ञापन


सरकारी उदासीनता से खेती पर बुरा असर
किसानों ने साफ कहा कि सरकारी उदासीनता से खेती पर बुरा असर पड़ रहा है। कहने को अनुसंधान होते हैं, लेकिन ये फाइलों से निकलकर कभी किसानों के खेतों तक पहुंचते ही नहीं।

बीज, खाद के लिए किसान दर-दर भटकते हैं। उनका कहना है कि सरकारें किसानों को बचाए रखना चाहती हैं तो इन सब समस्याओं पर फोकस करना जरूरी है। लोकसभा चुनाव में भ्रष्टाचार और महंगाई को किसान बड़ा मुद्दा मानते हैं।

जंगली जानवरों से कैसे बचाएं फसल
पहाड़ी क्षेत्रों में पहले ही फसलें बारिश पर निर्भर हैं, बारिश हुई तो थोड़ी बहुत फसल हो जाती है। लेकिन जंगली जानवर खेती को नुकसान पहुंचाते हैं।

हर्रावाला निवासी मूलचंद शीर्षवाल ने कहा कि नकरौंदा और हर्रावाला में हाथी, बंदर और सुअर फसलों को चौपट कर रहे हैं। फसलों को जंगली जानवरों से बचाने के लिए ठोस पहल की आवश्यकता है।


जंगली जानवरों से प्रभावित क्षेत्रों में परंपरागत खेती के बजाए सरकार ऐसी फसलों को बढ़ावा दे, जिसे जंगली जानवर नुकसान न पहुंचाते हों।

सरकारी योजनाओं का नहीं मिलता लाभ
किसानों के लिए सरकार की ओर से जो योजनाएं चलाई जा रही हैं। लेकिन विभागीय अफसरों की उदासीनता के चलते इनका लाभ किसानों को नहीं मिल पाता। गिने-चुने किसान ही इसका लाभ उठा पाते हैं।

शंकरपुर के किसान ज्ञानेंद्र पाल सिंह कहते हैं कि योजनाओं पर ईमानदारी से काम हो तो किसान जमीन बेचने या काम की तलाश में पलायन को मजबूर न हों।

दस रुपए में बेचा, बीस में खरीदा
वक्ताओं ने कहा कि किसान हित के दावे तो होते हैं, लेकिन जमीन पर कोई काम नहीं होता।

स्थिति यह है किसान यदि आलू दस रुपए किलो में बेचता है तो बाजार में उसे वही आलू 20 रुपए किलो के हिसाब से खरीदना पड़ता है।

किसानों को फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। नीति इस तरह की बनी है कि किसान नहीं बिचौलिये मुनाफा कमा रहे हैं।

अधिकार के लिए एकजुट हों किसान
किसानों ने कहा कि उन्हें हर बार हाशिये पर छोड़ दिया जाता है। अपने हितों के लिए उन्हें एकजुट होना होगा, जब तक वे एकजुट नहीं होंगे बात नहीं बनने वाली।

हर्रावाला के किसान विनोद कुमार ने कहा कि कुछ करने के लिए किसानों में जज्बा होना चाहिए। अपने अधिकारों के लिए उन्हें जागरूक होना होगा।

तकनीकी ज्ञान की है जरूरत
प्रभारी कृषि वैज्ञानिक डॉ. एसएस सिंह बताते हैं कि किसान परंपरागत खेती करते आ रहे हैं।

कृषि भूमि लगातार घट रही है, ऐसे में व्यावसायिक एवं आधुनिक तकनीकी की जानकारी का होना आवश्यक है।

परिचर्चा में कृषि वैज्ञानिक डॉ. संजय सचान, द्वारा रायपुर के किसान गोपाल सिंह नेगी, केसरवाला रायपुर के किसान जगमोहन सिंह आदि ने विचार रखे।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed