अमर उजाला बेस संवाद : प्रवासी बोझ नहीं, बदल सकते हैं उत्तराखंड की तस्वीर
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कहते हैं पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी कभी उसके काम नहीं आते। जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही युवा रोजगार की तलाश में पलायन करने को मजबूर हो जाता है। कुछ मूलभूत सुविधाओं की कमी के चलते घर छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। धीरे-धीरे गांव से जुड़ाव कम होता जाता है। एक वक्त ऐसा भी आता जब वर्षों तक वो गांव की तरफ मुड़कर नहीं देखता। गांव का घर, खेत खलिहान सब बंजर हो गए। कई बार वो गांव लौटना भी चाहता है लेकिन सवाल फिर वही रोजगार और सुविधाओं का। वर्षों पहले जिन दिक्कतों के चलते गांव छोड़ा वे आज भी वैसी ही हैं।
बंजर हो चुके गांवों को दोबारा हरा-भरा करने के लिए पहाड़ लगातार अपने बेटों को आवाज देता है। कोविड के चलते लाखों लोग वापस अपने गांव लौटने को मजबूर हुए हैं। वे दोबारा शहरों में खस्ताहाल जिंदगी नहीं जीना चाहते। वो पहाड़, अपने गांव, अपने लोगों के बीच रहना चाहते हैं। लेकिन सवाल पेट और भविष्य का है। सरकार उन्हें रोकने के लिए तमाम योजनाएं बनाने का दावा कर रही है। लेकिन सरकारी योजनाओं का हश्र किसी से छुपा नहीं है।
इसलिए सिर्फ सरकारी योजनाओं के भरोसे रुकने का जोखिम शायद ही लोग लेना चाहें। पहाड़ लौटे ये युवा अभी कोरोना के चलते अपनों को किसी दुश्मन से कम नहीं लग रहे। लेकिन अगर उनकी ऊर्जा और हुनर का सही इस्तेमाल किया जाए तो पहाड़ की रंगत एक बार फिर लौट सकती है। अमर उजाला बेस संवाद में वक्ताओं ने इन्हीं बिंदुओं पर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि प्रवासियों को राज्य की तरक्की में भागीदार बनाने की जरूरत है।
राज्य सरकार लगातार
रिवर्स पलायन की बात करती है। युवाओं को रोजगार देने और गांवों को दोबारा गुलजार करने का दावा करती है। लेकिन पहले हमें इसके कारणों को देखना होगा। लोग न खुशी से गए थे और ना ही खुशी से लौटे हैं। उनके सामने आज भी रोजगार और सुविधाओं की कमी है। शहरों में होटल या फैक्ट्रियों में आठ-दस हजार की नौकरी करने वाले युवा पहाड़ लौटना चाहते हैं। लेकिन सच तो ये है कि पहाड़ में उतना भी मयस्सर नहीं है। क्योंकि अगर उनके पास यहां संसाधन होते तो शायद वो बड़े शहरों के पीछे नहीं भागते। दूसरी बात बड़ी तादाद में युवा ऐसे हैं, जो अकुशल हैं। उनके स्किल डेवलपमेंट के लिए कभी कुछ नहीं किया गया। अब सरकार की जिम्मेदारी है कि उन्हें रोजगार और सुविधाएं उपलब्ध कराए ताकि वो फिर लौटने के लिए मजबूर न हों। सरकार उनके लिए अच्छी योजनाएं बनाए और उनका फायदा दिलाए। अगर ऐसा हुआ तो अर्थव्यवस्था में उनका योगदान ज्यादा हो सकता है।
-शिवा वर्मा, युवा अधिवक्ता
महामारी की वजह से जो लोग लौटे हैं, उन्हें यहीं रोक पाना आसान नहीं है। शहरों में भी उनके हालात अच्छे नहीं है। अगर उनके हालात अच्छे होते तो इस संकट के समय शायद वे लौटते ही नहीं। लेकिन जब वो गांवों से तुलना करते हैं तो शहरों की वो छोटी सी नौकरी भी उन्हें बहुत बड़ी लगती है। जो लोग आज उनके गांव आने का विरोध कर रहे हैं, वे भी गलत हैं। हर आदमी को रोजगार करने और अपने घर लौटने का कानूनी अधिकार भी है। केवल सरकार के भरोसे रहने से कुछ हासिल नहीं होगा। सरकार लोगों की जान को लेकर कितनी गंभीर है, इस संकट के दौरान साफ दिखता है। गंभीर बीमारी का खतरा होने के बावजूद लोगों को बसों और ट्रेन में ठूंस-ठूसकर लाया और भेजा गया। प्रवासियों और सरकार दोनों के लिए ये बड़ा मौका है कि वो राज्य के लिए कुछ करें।
- त्रिशला
कोरोना के चलते हजारों लोग अपने घर वापस आ गए हैं। लेकिन वो राज्य के लिए वरदान बनेंगे या अभिशाप, इस पर कुछ कहना अभी जल्दबाजी है। संकट टलने और हालात सामान्य होने के बाद कितने लोग यहां रुकते हैं, उस पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। अगर लोग ये सोचकर काम करें कि उन्हें अब यहीं रहना है तो फिर बहुत कुछ किया जा सकता है। ऐसे बहुत से लोग होंगे, जो हालात सुधरते ही वापस अपने काम वाली जगह लौट जाएंगे। हमारे यहां हुनरमंद और मेहनती लोगों की कमी नहीं है। अब तक सरकार इसलिए परेशान थी कि उन्हें वापस कैसे बुलाएं। अब वो वापस लौट आएं हैं तो सरकार को कुछ ऐसा करना चाहिए कि वो दोबारा न जाएं। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जहां प्रवासियों ने स्कूलों की सूरत बदल दी। सड़कें और रास्ते बना दिए। इसी ऊर्जा को सही जगह लगाने की जरूरत है।
- शाश्वत पंडित, सिंगर
सरकार शुरूआत में सावधानी बरतती तो लोगों को शायद इतनी दिक्कत नहीं होती। गांवों में लोग अपनों के लौटने पर उनसे बेरुखी कर रहे हैं। क्वारंटीन सेंटरों के हालात भी बहुत अच्छे नहीं हैं। इस सब के लिए पढ़े लिखे और समझदार लोगों को आगे आना होगा। उनसे किसी तरह का भेदभाव न करके उन्हें अनुभव और हुनर का फायदा उठाना चाहिए। सरकार को चाहिए कि लौटे हुए लोगों के लिए स्किल डेवलपमेंट के प्रोग्राम चलाए। ऐसे बहुत से काम हैं, जिन्हें कई कारणों से लोग नहीं करते। लेकिन आज वो काम हजारों लोगों को रोजगार दे रहे हैं। हमें अपने माइंड सेट में बदलाव करना होगा। प्रवासियों को भी समझना होगा कि यहीं रहकर उन्हें शहरों से ज्यादा कमाई वाला काम मिल सकता है। कई छोटे-मोटे काम करके वो अपना घर परिवार चला सकते हैं।
-श्वेता
सरकार ज्यादातर फंसे हुए लोगों को वापस ला चुकी है। लेकिन अब ये लोग विकास में भागीदार बनें और अर्थव्यवस्था को मजबूती दें, इसके बारे में गंभीरता से सोचना होगा। कई जगह उनसे भेदभाव और दुर्व्यवहार की खबरें भी मिल रही हैं। हमें बीमारी से लड़ना है बीमार से नहीं। कोरोना संकट के बाद कैसे वे अर्थव्यवस्था में अपना योगदान दे सकते हैं, सरकार को इसके बारे में अभी से सोचना होगा। दूसरे राज्यों के ज्यादातर लोग भी लौट चुके हैं। उनके जाने से बने रोजगार के अवसरों को स्थानीय लोगों को दिया जाना चाहिए ताकि वे यहीं रुक सकें। 20 से 30 फीसदी लोग भी मुश्किल से यहां रहेंगे। पहाड़ पर अगर उन्हें किसी तरह रोजगार दे भी दिया जाए तब भी शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं के लिए वो पलायन करने को मजबूर रहेंगे।
- स्वप्निल सिन्हा, सामाजिक कार्यकर्ता