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कृषि कानून वापसी का एलान: उत्तराखंड के किसानों में खुशी, कहा- आंदोलन के दौरान जिनकी मौत हुई उन्हें शहीद का दर्जा दें

Fri, 19 Nov 2021 03:11 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Fri, 19 Nov 2021 03:11 PM IST
सार

देहरादून जिले में डोईवाला के किसानों ने खुशी का इजहार किया है। उन्होंने कहा कि लंबे समय से डोईवाला किसान आंदोलन का केंद्र रहा है। संयुक्त किसान मोर्चा के अध्यक्ष ताजेंद्र सिंह ने कहा कि किसानों के लिए यह बड़ी जीत है।

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all three farm laws repeal: uttarakhand reaction of farmers and politicians
किसानों ने सरकार का आभार जताया - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

गुरु पर्व पर शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा केंद्रीय कृषि कानूनों को वापस लेने के एलान के बाद उत्तराखंड के किसानों ने खुशी का इजहार किया है। केंद्र सरकार की ओर से तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा पर रुद्रपुर में किसानों ने सरकार का आभार जताया। साथ ही मिठाई बांटकर एक दूसरे को बधाई दी।

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खुशी का इजहार किया
इसे लेकर देहरादून जिले में डोईवाला के किसानों ने खुशी का इजहार किया है। उन्होंने कहा कि लंबे समय से डोईवाला किसान आंदोलन का केंद्र रहा है। यहां टोल बैरियर और रेल रोको आंदोलन के अलावा नियमित धरना प्रदर्शन होते रहे हैं। किसान आंदोलन के लिए संयुक्त किसान मोर्चा गठित कर यहां किसानों ने आंदोलन को गति दी। संयुक्त किसान मोर्चा के अध्यक्ष ताजेंद्र सिंह ने कहा कि किसानों के लिए यह बड़ी जीत है। केंद्र सरकार को आंदोलन में शहीद हुए किसानों को शहीद का दर्जा देना चाहिए।
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किसानों का संघर्ष रंग लाया
वरिष्ठ किसान गुरदीप सिंह ने कहा कि किसानों के लिए आज बेहद खुशी का मौका है। किसान आंदोलन से जुड़े उम्मेद वोरा ने कहा कि किसानों का संघर्ष रंग लाया है। भारतीय किसान यूनियन टिकैत ग्रुप के जिला अध्यक्ष सुरेंद्र सिंह खालसा ने कहा कि किसानों की एकता से केंद्रीय कृषि बिल वापस हुए हैं। किसान सभा के दलजीत सिंह, जाहिद, अंजू, बलवीर सिंह समेत तमाम वरिष्ठ आंदोलनकारी किसानों ने इसे किसानों की जीत बताया है।
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भारी मन से किसान बिल वापस लिया गया: दुष्यंत कुमार
भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री दुष्यंत कुमार गौतम का कहना है कि भारी मन से किसान कानून वापस लेने का एलान किया गया है। सालों की मेहनत के बाद कानून बनाया गया था। विरोधियों ने इसको राजनीतिक रंग दे दिया था। किसान आंदोलन  को हिंसक बना दिया था। अमन चैन के लिए कानून वापस लेना पड़ा।

किसानों की अभूतपूर्व विजय: हरीश रावत
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने प्रधानमंत्री के इस एलान को किसानों की अभूतपूर्व विजय बताया है। उन्होंंने कहा कि मैं किसानों को बधाई देता हूं और इसे लोकतंत्र की भी विजय मानता हूं। क्योंकि सत्ता का अहंकार जनता के संघर्ष के सामने झुका है। अहंकार से चूर सत्ता द्वारा तीन काले कानून जो किसानाें का गला घोंट रहे थे उनको वापस लेने की घोषणा की है। ये किसान भाइयों की संघर्ष की जीत है। उन शहीदों की जीत है, जिन्होंने अपने प्राण उत्सर्ग कर दिए ताकि उनको विजय हासिल हो सके। 

किसानों के संघर्ष की जीत: कांग्रेस
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने इसे किसानों के संघर्ष की जीत करार दिया है। उन्होंने कहा है कि पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस किसानों के संघर्ष के साथ पहले दिन से ही खड़ी थी। तीनों काले कानून देश के अन्नदाता के साथ छलावा थे। केंद्र सरकार ने अपने चहेते उद्योगपतियों के लाभ के लिए ये कानून बनाए थे।

वहीं कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव काजी निजामुद्दीन ने कहा कि ये तीनों कानून किसानों पर सबसे बड़ा अभिशाप थे। जिनकी वजह से किसानों का भविष्य असुरक्षा में आ गया था। लंबे समय से किसान आंदोलन कर रहे थे। लाठी-गोली खाने के बावजूद वो डिगे नहीं और आखिर में केंद्र सरकार को झुकना ही पड़ा।

एक साल के लंबे संघर्ष के बाद सरकार जगी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा का हरिद्वार के किसान नेताओं ने स्वागत किया है। भारतीय किसान यूनियन जिला अध्यक्ष विजय कुमार शास्त्री ने कहा कि एक साल के लंबे संघर्ष के बाद सरकार जगी है। उन्होंने कहा यह हमारी पहली जीत है।

उन्होंने कहा कि हमारे राष्ट्रीय नेता राकेश टिकैत ने कहा है कि जब तक सरकार संसद में इस बिल को पास नहीं करती, तब तक धरना प्रदर्शन जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि जब तक हमारे नेताओं का कोई आदेश नहीं आता, तब तक धरना जारी रहेगा। जिला अध्यक्ष ने कहा कि किसान एक साल से सर्दी, धूप और बरसात में अपने हक के लिए सड़क पर पड़ा है। लेकिन सरकार नहीं चेती।

किसान आंदोलन में सैकड़ों शहादतें हो चुकी है। आंदोलन के दौरान सैकड़ों किसानों ने अपनी शहादत दी है। जिसे भुलाया नहीं जा सकता। किसानों की शहादत पर ही यह जीत मिली है। जिले के किसानों ने प्रधानमंत्री की इस घोषणा का स्वागत किया है।

मोदी सरकार का फैसला काश्तकारों के हित में
लालढांग में मोदी सरकार द्वारा लिए गए फैसले पर नेताओं व किसानों अपनी अलग प्रतिक्रिया व्यक्त की। वरिष्ठ कांग्रेस नेता गुरजीत सिंह लहरी ने कहा कि कृषि कानून के वापस होने का एलान देश के किसानों की बहुत बड़ी जीत है। मोदी ये काम पहले कर देते तो किसी किसान की शहादत न होती। राहुल गांधी ने पहले ही कह दिया था कि आने वाले समय में सरकार को ये काले कानून वापस लेने पड़ेंगे।

किसान शैलेंद्र पाठक का कहना है कि मोदी सरकार का फैसला काश्तकारों के हित में है। काश्तकारों को अधिकार है कि अपनी फसल को कहीं भी उचित दामों पर बेचकर बिचौलियों से बच सके। ब्रजमोहन पोखरियाल रसूलपुर ने कहा कि सरकार को यह फैसला पहले ही ले लेना चाहिए था। विनोद कुमार नयागांव ने कहा कि किसानों को इसका फायदा मिलेगा, वह अपना अनाज कहीं भी खुले बाजार में बेच सकते हैं।

सत्ता के मद में चूर को झुकाने के लिए एकजुट आंदोलन ही एक मात्र रास्ता

भाकपा के गढ़वाल सचिव इंद्रेश मैखुरी का कहना है कि यह देश के किसान आंदोलन की जीत है। देश का इतिहास यह याद रखेगा कि जिस समय इस देश के तमाम संसाधनों की हुकूमत द्वारा बोली लगाई जा रही थी, उस वक्त इस देश के किसानों ने अपनी जान की बाजी लगाकर न केवल कृषि भूमि को कॉरपोरेट के शिकंजे में जाने से बचाया, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा को बचाने के लिए भी अपना जीवन होम कर दिया।
 
कहा कि यह किसान आंदोलन, देश में अपने हक-अधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों को प्रेरित करेगा कि बहुमत के मद में चूर सत्ता को झुकाने के लिए एकजुट आंदोलन ही एक मात्र रास्ता है। यह याद रखा जाना चाहिए कि इसी सरकार ने किसानों को दिल्ली आने से रोकने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग खुदवा दिए, पानी की बौछारें कीं और लाठी-डंडे चलाए, किसानों को खालिस्तानी और आतंकवादी तक कहा।

आंदोलन में फूट डालने और हिंसा फैलाने के कुत्सित प्रयास किए। खुद प्रधानमंत्री ने आंदोलनजीवी कह कर उनका उपहास उड़ाया और जब इतने से भी मन नहीं भरा तो केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र के बेटे ने अपनी गाड़ी से किसानों को रौंद दिया। अभी भी केंद्र सरकार ने उस मंत्री को मंत्रिमंडल में बनाए रखा है। इतने सब के बावजूद यदि प्रधानमंत्री को कृषि बिलों को वापस लेने की घोषणा करनी पड़ी है तो यह किसान आंदोलन की एकजुटता और उसके जहीन नेतृत्व के दम पर ही संभव हो पाया है, जिसने विपरीत से विपरीत परिस्थिति में संघर्ष की लौ को कमजोर नहीं पड़ने दिया।

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