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यहां तैनाती की फिराक में थे भ्रष्टाचार के आरोपी डा. मृत्युंजय मिश्रा, ऐसे सारी प्लानिंग हुई फेल

Tue, 04 Dec 2018 05:00 AM IST
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 04 Dec 2018 05:00 AM IST
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Accused of corruption dr. mrityunjay mishra planing fail for Join in Lucknow
डा. मृत्युंजय मिश्रा

अपर स्थानिक आयुक्त पद से हटने के बाद डा. मृत्युंजय मिश्रा इस कोशिश में थे कि उसकी तैनाती लखनऊ पुनर्गठन आयुक्त के पद पर हो जाए। इसके लिए उन्होंने शासन में बैठे अपने कुछ पैरोकारों की मदद से फाइल भी चलाई थी। सूत्रों के अनुसार फाइल मुख्य सचिव कार्यालय में आकर अटक गई, जिसके चलते उसकी कोशिश नाकाम रही। 

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प्रदेश में भाजपा सरकार आने के बाद मृत्युंजय मिश्रा की आयुर्वेदिक विवि के कुलसचिव पद से नियुक्ति अपर स्थानिक आयुक्त नई दिल्ली हुई। तब भी माना गया कि कुलसचिव पद पर बढ़ते विवादों के चलते उसने अपने रसूख से दिल्ली में तैनाती करवाई है।
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इस दौरान दिल्ली में उनकी खासी पैठ बन गई। हालांकि किन्हीं कारणों से सरकार ने पांच माह पहले उनकी नियुक्ति एक बार फिर आयुर्वेदिक विवि के कुलसचिव के पद पर कर दी। इस बीच स्टिंग प्रकरण सामने आया, जिसमें उस पर बतौर स्थानिक आयुक्त अपर मुख्य सचिव ओम प्रकाश से मुलाकात करवाने का आरोप है। इसके अलावा कुलसचिव पद पर दो बार के कार्यकाल में कई तरह के आरोप हैं। 

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रिटायर्ड जज से जांच का आदेश रद्द

भर्तियों के साथ वित्तीय अनियमितताओं के आरोप गरमाने के बाद एक बार फिर मृत्युंजय ने लखनऊ में अपनी तैनाती के लिए तंत्र चालू किया। इस संबंध में मुख्य सचिव ने बताया कि उन्हें मृत्युंजय मिश्रा की लखनऊ में पोस्टिंग के प्रस्ताव की जानकारी नहीं है, लेकिन अगर लखनऊ में पुनर्गठन से संबंधित मामलों को लेकर एक आफिस है। उस आफिस को समाप्त करने की प्रक्रिया चल रही है, जिसके चलते वहां कोई तैनाती संभव ही नहीं है।

आयुर्वेद विवि के कुलपति ने रिटायर्ड जज से पूर्व कुलसचिव मृत्युंजय मिश्रा की जांच का आदेश रद्द कर दिया है। कुलपति के इस आदेश को लेकर सवाल खड़े हो रहे थे। हालांकि कुलपति का कहना है कि विजिलेंस जांच के आगे बढ़ने का पता चलने के बाद आदेश रद्द किया गया है। 


आयुर्वेद विवि के पूर्व कुलसचिव मृत्युंजय के खिलाफ विजिलेंस, एसआईटी सहित तमाम जांचों के बीच हाल ही में कुलपति प्रो. अभिमन्यु कुमार ने उनके कार्यकाल की जांच रिटायर्ड जज से कराने का आदेश जारी किया था। इस आदेश पर सवाल खड़े हो गए थे। सवाल यह था कि आखिर किसी विवि के कुलपति अपने स्तर से कैसे रिटायर्ड जज को जांच अधिकारी बना सकते हैं, जबकि इसके लिए सरकार को भी हाईकोर्ट से इजाजत लेनी पड़ती है।


 

लगातार सवालों में हैं कुलपति के आदेश

यहां सवाल यह भी था कि कुलसचिव का पद शासन के स्तर से भरा जाता है। इस पद की नियुक्ति, जांच और हटाने की शक्ति शासन के पास निहित है। ऐसे में कुलपति ने बिना शासन की अनुमति किस आधार पर जांच समिति गठित कर दी। विवाद बढ़ा तो एक-दो दिन बाद ही कुलपति ने जांच का आदेश रद्द कर दिया। मामले में जब कुलपति प्रो. अभिमन्यु कुमार से बात की गई तो उन्होंने कहा कि उन्हें विजिलेंस जांच के आगे बढ़ने का पता चल गया था। इसलिए उन्होंने रिटायर्ड जज से जांच कराने का आदेश रद्द किया है।

आयुर्वेद विवि के फैसलों पर पहले भी सवाल उठते आ रहे हैं। विवि में नियम विरुद्ध मंत्री, उनके पीए सहित कई प्रभावशाली लोगों के रिश्तेदारों की भर्ती में भी शासन को विश्वास में नहीं लिया गया था। जब इस पर सवाल उठे तो शासन ने सभी भर्तियों पर रोक लगा दी। इसके बाद विवि में एक विशेष पद के लिए एक संगठन विशेष के पदाधिकारी के भाई को इंटरव्यू के लिए बुला लिया गया। सवाल उठे तो शासन ने इस पर रोक लगा दी।

इसके बाद बीते सप्ताह विवि में स्थायी कुलसचिव की अनुपस्थिति में उपकुलसचिव की भर्ती को साक्षात्कार की तिथि तय कर दी गई। इस पर भी सवाल उठे तो शासन ने रोक लगा दी। लगातार विवि में हो रहे इस तरह के विवादों को कई लोग कुलपति की मनमानी मान रहे हैं तो कई लोग अज्ञानता।

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