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जादूंग में फिर रहना चाहते हैं जाड़ समुदाय
Updated Tue, 13 Jun 2017 10:11 PM IST
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उत्तरकाशी। भारत तिब्बत सीमा पर बसे जादूंग गांव से विस्थापित किए गए बगोरी, डुंडा और हर्षिल में बसे जाड़ जनजातिय समुदाय के लोग जादूंग में फिर से स्थापित होना चाहते हैं। ग्रामीण अपने पैैैतृक गांव को फिर से संजो कर होम स्टे से पर्यटन को बढ़ावा दे सकते हैं।
बीते शुक्रवार को रिगांली देवी व लाल देवता की पूजा-अर्चना के लिए डुंडा व बगोरी गांव से 15 वाहनों के काफिले के साथ जाड़ जनजाति के लोग अपने पैतृक गांव जांदूग पहुंचे। सीमावर्ती क्षेत्र का नेलांग व जांदूग गांव 1962 के चीन युद्ध के समय खाली कराया गया था, जो कि अब खंडहर हो गए हैं। जनजातिय लोगों ने रिंगाली देवी की गुफा में पूजा-अर्चना की और इसके बाद जांदूग गांव के लाल देवता के मंदिर की ओर प्रस्थान किया। फोटोग्राफर गुलाब सिंह नेगी का कहना है कि मुआवजे से वंचित नेलांग व जांदूग गांव को पुन: यही पुर्न स्थापित किया जाए, तो ये लोग भारतीय सीमा रक्षकों के लिए काफी मददगार साबित होंगे। जांदूग गांव के आगे जनक ताल व इस सीमावर्ती शीत मरूस्थल की खूबसूरती पर्यटकों को खूब भा सकती है। पूर्व प्रधान नारायण सिंह नेगी कहते हैं कि सरकार यदि उनकी जमीन लौटा दे, तो यहां वे पर्यटन को बढ़ावा दे सकते हैं।
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बीते शुक्रवार को रिगांली देवी व लाल देवता की पूजा-अर्चना के लिए डुंडा व बगोरी गांव से 15 वाहनों के काफिले के साथ जाड़ जनजाति के लोग अपने पैतृक गांव जांदूग पहुंचे। सीमावर्ती क्षेत्र का नेलांग व जांदूग गांव 1962 के चीन युद्ध के समय खाली कराया गया था, जो कि अब खंडहर हो गए हैं। जनजातिय लोगों ने रिंगाली देवी की गुफा में पूजा-अर्चना की और इसके बाद जांदूग गांव के लाल देवता के मंदिर की ओर प्रस्थान किया। फोटोग्राफर गुलाब सिंह नेगी का कहना है कि मुआवजे से वंचित नेलांग व जांदूग गांव को पुन: यही पुर्न स्थापित किया जाए, तो ये लोग भारतीय सीमा रक्षकों के लिए काफी मददगार साबित होंगे। जांदूग गांव के आगे जनक ताल व इस सीमावर्ती शीत मरूस्थल की खूबसूरती पर्यटकों को खूब भा सकती है। पूर्व प्रधान नारायण सिंह नेगी कहते हैं कि सरकार यदि उनकी जमीन लौटा दे, तो यहां वे पर्यटन को बढ़ावा दे सकते हैं।
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