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छात्रवृत्ति घोटाले की जांच: साजिश या संयोग, जिसने सख्ती दिखाई, उसकी हुई विदाई

Sun, 06 Jan 2019 11:23 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal राकेश खंडूडी, अमर उजाला, देहरादून
राकेश खंडूडी, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sun, 06 Jan 2019 11:23 AM IST
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500 crore scholarship scam in uttarakhand inspection
घोटाला - फोटो : amar ujala

500 करोड़ रुपये के छात्रवृत्ति घोटाले में  घोटालेबाजों को बचाने की साजिश कहें या संयोग, जिस अफसर ने छात्रवृत्ति घोटाले की जांच में सख्ती दिखाई, उसकी समाज कल्याण विभाग से विदाई हो गई।

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घोटाले की जांच में हीलाहवाली का मामला अदालत में जाने से पहले ही सचिवालय के गलियारों में ये चर्चा थी कि विभाग के निदेशक मेजर (सेवानिवृत्त) योगेंद्र यादव को भी हटा दिया जाएगा, क्योंकि उन्होंने भी छात्रवृत्ति घोटाले से संबंधित शिकायतों को बेहद गंभीर मानते हुए उच्च स्तर पर विस्तृत जांच की सिफारिश की है। शुक्रवार को एक बड़े प्रशासनिक फेरबदल में यादव समाज कल्याण विभाग के निदेशक पद से विदा हो गए। उनकी विदाई की पटकथा ठीक ऐसे समय में लिखी गई, जब वे एक महीने के चिकित्सकीय अवकाश पर हैं।
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गौरतलब है कि यह मामला अमर उजाला ने उठाया और जब यह मामला दफन करने की कोशिशें परवान पर थीं तो राज्य आंदोलनकारी रविंद्र जुगरान इसे हाईकोर्ट ले गए। अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के छात्रों के वजीफे से जुड़े इस घोटाले में हाईकोर्ट के तल्ख आदेशों से  समाज कल्याण विभाग में हड़कंप है।  
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ये संयोग है या साजिश अधिकारी हटते चले गए 
ये अजब संयोग है कि उनसे पहले भी जिन अधिकारियों को विभाग से विदा किया गया, उसके पीछे भी यही माना गया कि वे छात्रवृत्ति घोटाले की जांच में तेजी और सख्ती दिखा रहे थे। मिसाल के तौर पर तत्कालीन अपर सचिव डॉ. वी. षणमुगम, जिन्होंने छात्रवृत्ति आवंटन की नमूना जांच में घोटाले को पकड़ा और इसकी विस्तृत जांच की सिफारिश की। हालांकि विभागीय स्तर पर हुई दूसरी जांच में डॉ. षणमुगम की जांच पर पलीता लगा दिया। साथ ही वे समाज कल्याण विभाग की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिए गए। प्रभार तत्कालीन अपर सचिव मनोज चंद्रन के पास आया तो उन्होंने डॉ. षणमुगम की जांच को गंभीर माना।

इस बीच उनके पास घोटाले के संबंध में पहुंची शिकायतों और मुख्यमंत्री के जनता दर्शन कार्यक्रम में घोटाले की जांच सीबीआई से कराए जाने के प्रार्थना पत्र प्राप्त हुए। उस दौरान डॉ. षणमुगम की जांच और तमाम शिकायतों के आधार पर मनोज चंद्रन ने मुख्य सचिव से घोटाले की विजिलेंस या सीबीआई जांच कराए जाने की सिफारिश की। वहीं षणमुगम की जांच पर पलीता लगाने वाली विभागीय टीम के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की भी संस्तुति की।  कुछ दिन बाद भारतीय वन सेवा के अधिकारी मनोज चंद्रन को वन मुख्यालय भेज दिया गया। उसी दौरान तत्कालीन सचिव डॉ. भूपिन्दर कौर औलख की भी विभाग से विदाई हो गई।

औलख की विदाई की वजह विभाग के आईटी प्रकोष्ठ की जिम्मेदारी विभाग के अपर निदेशक कांति राम जोशी को सौंपा जाना माना जाता है। उच्च स्तर पर उनसे ये अपेक्षा की गई कि वे जोशी को हटाकर ये जिम्मेदारी देहरादून के समाज कल्याण अधिकारी को सौंपने के आदेश करें। बाद में आईटी प्रकोष्ठ से जोशी को हटाकर उन्हें विभागीय मुख्यालय हल्द्वानी भेजा गया और डॉ. औलख भी विभाग से विदा हो गईं।  मुख्यालय में विभाग के कानूनी मामलों को देख रहे जोशी का भी अप्रत्याशित ढंग से पिथौरागढ़ के समाज कल्याण अधिकारी के पद पर तबादला कर दिया गया। 

समाज कल्याण विभाग के निदेशक व अन्य अधिकारियों को बदला जाना प्रशासनिक प्रक्रिया है। इसे छात्रवृत्ति घोटाले से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। जहां तक अदालत में यह बात सामने आई है कि विभागीय स्तर पर घोटाले की एसआईटी जांच में सहयोग नहीं किया जा रहा है, तो ये बेहद गंभीर मामला है। मैंने अपर मुख्य सचिव से इस संबंध में वार्ता की है और उन्हें उन सहयोग नहीं करने वाले अफसरों की पहचान कर उनकी जवाबदेही तय करने को कहा है। छात्रवृत्ति घोटाले की दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

- यशपाल आर्य, समाज कल्याण मंत्री

समाज कल्याण निदेशक एसआईटी को जांच में पूरा सहयोग कर रहे थे। उन्हें अचानक हटा दिया जाना बड़े सवाल खड़े करता है। सही और जांच में सहयोग करने वाले अधिकारियों को इसी तरह एक-एक करके हटाया जाना सुनियोजित साजिश है। कुछ लोग नहीं चाहते कि घोटाले का पर्दाफाश हो।
- रविंद्र जुगरान, छात्रवृत्ति मामले के याचिकाकर्ता

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