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नई पीढ़ी को पुरानी वस्तुओं से रूबरू करा रहे एनआरआई बेंजामिन
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ब्यूरो/अमर उजाला, विकासनगर।
अपने वतन की मिट्टी और सांस्कृतिक विरासत हर किसी को आकर्षित करती है। संस्कृति के प्रति लगाव सात समुद्र पार जाने के बाद भी कम नहीं होता है। इसका उदाहरण हैं 40 साल पहले परिवार के साथ विकासनगर से जर्मनी जाकर बसे एनआरआई बेंजामिन प्रकाश। जिन्होंने पिछले 40 साल से पुरानी परंपरागत वस्तुओं को संजो कर रखा हुआ है। वह हर दो माह में विकासनगर आते हैं और नई पीढ़ी को इन पुरानी वस्तुओं की जानकारी देते हैं।
यूं तो इन दिनों युवा पीढ़ी पाश्चात्य संस्कृति की ओर आकर्षित हो रही है, जिससे वे अपनी संस्कृति और परंपराओं को भूलते जा रहे हैं, लेकिन कुछ लोग अभी भी परंपराओं के संरक्षण का प्रयास कर रहे हैं। इनमें से एनआरआई बेंजामिन प्रकाश भी एक हैं। विकासनगर से एक किमी की दूरी गंगभेवा बावड़ी के समीप अपने फार्म हाउस में उन्होंने पुरानी वस्तुओं को संग्रहित कर रखा है। उनके फार्म हाउस में खासकर ग्रामोफोन, बैलगाड़ी से लेकर गेहूं पीसने का पत्थर का उपकरण, सूत कातने का चरखा, बैलों से हल जोतने के उपकरण, दूध से मठ्ठा बनाने का पारंपरिक उपकरण सहित करीब 40 वर्ष पूर्व ग्रामीणों के दिन चर्या के उपयोग में आने वाले कई पारंपरिक उपकरण और संसाधन मौजूद हैं।
बेंजामिन प्रकाश ने बताया कि वह स्थानीय युवाओं के साथ ही विदेशों से शोध के लिए उत्तराखंड आने वाले छात्रों को भी इन उपकरणों की जानकारी मुहैया कराते हैं। साथ ही उनके फार्म हाउस में जैविक सब्जियों का उत्पादन भी किया जा रहा है, जिसे वे अपने साथ जर्मनी भी ले जाते हैं।
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अपने वतन की मिट्टी और सांस्कृतिक विरासत हर किसी को आकर्षित करती है। संस्कृति के प्रति लगाव सात समुद्र पार जाने के बाद भी कम नहीं होता है। इसका उदाहरण हैं 40 साल पहले परिवार के साथ विकासनगर से जर्मनी जाकर बसे एनआरआई बेंजामिन प्रकाश। जिन्होंने पिछले 40 साल से पुरानी परंपरागत वस्तुओं को संजो कर रखा हुआ है। वह हर दो माह में विकासनगर आते हैं और नई पीढ़ी को इन पुरानी वस्तुओं की जानकारी देते हैं।
यूं तो इन दिनों युवा पीढ़ी पाश्चात्य संस्कृति की ओर आकर्षित हो रही है, जिससे वे अपनी संस्कृति और परंपराओं को भूलते जा रहे हैं, लेकिन कुछ लोग अभी भी परंपराओं के संरक्षण का प्रयास कर रहे हैं। इनमें से एनआरआई बेंजामिन प्रकाश भी एक हैं। विकासनगर से एक किमी की दूरी गंगभेवा बावड़ी के समीप अपने फार्म हाउस में उन्होंने पुरानी वस्तुओं को संग्रहित कर रखा है। उनके फार्म हाउस में खासकर ग्रामोफोन, बैलगाड़ी से लेकर गेहूं पीसने का पत्थर का उपकरण, सूत कातने का चरखा, बैलों से हल जोतने के उपकरण, दूध से मठ्ठा बनाने का पारंपरिक उपकरण सहित करीब 40 वर्ष पूर्व ग्रामीणों के दिन चर्या के उपयोग में आने वाले कई पारंपरिक उपकरण और संसाधन मौजूद हैं।
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बेंजामिन प्रकाश ने बताया कि वह स्थानीय युवाओं के साथ ही विदेशों से शोध के लिए उत्तराखंड आने वाले छात्रों को भी इन उपकरणों की जानकारी मुहैया कराते हैं। साथ ही उनके फार्म हाउस में जैविक सब्जियों का उत्पादन भी किया जा रहा है, जिसे वे अपने साथ जर्मनी भी ले जाते हैं।
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