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श्रीनगर के वायुमंडल में राष्ट्रीय मानक से ज्यादा प्रदूषण
Updated Sat, 08 Dec 2018 10:19 PM IST
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श्रीनगर। पहाड़ के लिए चिंताजनक बात है। श्रीनगर घाटी में राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों (एनएएक्यूएस) से ज्यादा प्रदूषण पाया गया है। एनएएक्यूएस के अनुसार वातावरण में पीएम (पर्टिक्युलर मेटर) 2.5 को 60 माइक्रोग्राम प्रति सेंटीमीटर क्यूब होना चाहिए। श्रीनगर में यह 60 से ऊपर पाया गया। माइक्रोग्राम प्रति सेंटीमीटर क्यूब से ऊपर पाया गया। साथ ही वायुमंडल में सल्फेट का सांद्रण सबसे अधिक पाया गया है।
एचएनबी केंद्रीय गढ़वाल विवि के ग्रामीण प्रौद्योगिकी विभाग और भौतिकी विभाग ने संयुक्त रूप से दीपावली के दौरान पटाखों-आतिशबाजी से अलकनंदा घाटी में वायु की गुणवत्ता पर पड़ने वाले प्रभावों के आकलन के लिए उपकरण (हाई वॉल्यूम सेंपलर) स्थापित किए थे। ग्रामीण प्रौद्योगिकी विभागाध्यक्ष डा. आरएस नेगी, डा. संतोष रावत, भौतिकी विभाग के सहायक प्रो. डा. आलोक सागर गौतम, अजय सिंह की टीम ने विवि कैश काउंटर की छत में स्थापित सेंपलर से कणों के नमूने लिए। शोधकर्ताओं ने परीक्षण से पहले और बाद में फिल्टर के वजन के आधार पर निष्कर्ष निकाले।
वर्तमान में डा. गौतम आईसीटीपी (अंतरराष्ट्रीय सैद्धांतिकी भौतिकी केंद्र) इटली में इस पर विस्तृत शोध कर रहे हैं। उन्होंने व्हाट्स एप के माध्यम से बताया कि श्रीनगर में बड़े कण वाले प्रदूषक तत्व ज्यादा पाए गए हैं। दिसंबर 2015 से विवि में पीएम 2.5 और पीएम 10 (प्रदूषक तत्व) के लगातार नमूने लिए जा रहे हैं। साथ ही आयनक्रोमेटोग्राफ से भी अध्ययन किया जा रहा है। इसमें पाया गया कि वातावरण में सल्फेट का सांद्रण सबसे अधिक और फ्लोरीन का सबसे कम है। डा. गौतम ने बताया कि अलकनंदा घाटी में सल्फेट का मिलना, कहीं न कहीं आवागमन के साधनों में वृद्धि है। पहाड़ों में सामान्यतया पुराने वाहन चलते हैं। इनसे काफी मात्रा में सल्फर डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है, जो पहले सल्फाइड और बाद में सल्फ्यूरिक एसिड में परिवर्तित हो जाती है। जो वायुमंडल को नुकसान पहुंचाती है।
एचएनबी केंद्रीय गढ़वाल विवि के ग्रामीण प्रौद्योगिकी विभाग और भौतिकी विभाग ने संयुक्त रूप से दीपावली के दौरान पटाखों-आतिशबाजी से अलकनंदा घाटी में वायु की गुणवत्ता पर पड़ने वाले प्रभावों के आकलन के लिए उपकरण (हाई वॉल्यूम सेंपलर) स्थापित किए थे। ग्रामीण प्रौद्योगिकी विभागाध्यक्ष डा. आरएस नेगी, डा. संतोष रावत, भौतिकी विभाग के सहायक प्रो. डा. आलोक सागर गौतम, अजय सिंह की टीम ने विवि कैश काउंटर की छत में स्थापित सेंपलर से कणों के नमूने लिए। शोधकर्ताओं ने परीक्षण से पहले और बाद में फिल्टर के वजन के आधार पर निष्कर्ष निकाले।
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वर्तमान में डा. गौतम आईसीटीपी (अंतरराष्ट्रीय सैद्धांतिकी भौतिकी केंद्र) इटली में इस पर विस्तृत शोध कर रहे हैं। उन्होंने व्हाट्स एप के माध्यम से बताया कि श्रीनगर में बड़े कण वाले प्रदूषक तत्व ज्यादा पाए गए हैं। दिसंबर 2015 से विवि में पीएम 2.5 और पीएम 10 (प्रदूषक तत्व) के लगातार नमूने लिए जा रहे हैं। साथ ही आयनक्रोमेटोग्राफ से भी अध्ययन किया जा रहा है। इसमें पाया गया कि वातावरण में सल्फेट का सांद्रण सबसे अधिक और फ्लोरीन का सबसे कम है। डा. गौतम ने बताया कि अलकनंदा घाटी में सल्फेट का मिलना, कहीं न कहीं आवागमन के साधनों में वृद्धि है। पहाड़ों में सामान्यतया पुराने वाहन चलते हैं। इनसे काफी मात्रा में सल्फर डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है, जो पहले सल्फाइड और बाद में सल्फ्यूरिक एसिड में परिवर्तित हो जाती है। जो वायुमंडल को नुकसान पहुंचाती है।
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