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अभी नहीं बैठी है भितरघात की धूल
Updated Mon, 29 Oct 2018 12:51 AM IST
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ब्यूरो/अमर उजाला/ऋषिकेश।
नगर निगम मेयर के दावेदारों की लड़ाई अब दिलचस्प मोड़ पर आ पहुंची है। भाजपा में बागियों का तूफान तो शांत हो गया है, लेकिन अंदरखाने की सच्चाई यह है कि भितरघात की धूल पूरी तरह बैठी नहीं है। वहीं कांग्रेस में भी स्थिति सामान्य नहीं है।
भाजपा ने बागियों को चुनाव में बैठाकर फौरी सफलता भले ही हासिल कर ली हो, लेकिन जमीनी स्तर पर मनभेद की खाई अभी जस की तस है। कांग्रेस में भी कमोबेश यही हालात हैं। दोनों ही बड़ी पार्टियों के कार्यकर्ताओं और स्थनीय पदाधिकारियों को शिद्दत से महसूस हो रहा है कि शीर्ष पदों पर बैठे नेता जो राजनीति कर रहे हैं उसी के अनुरूप उन्हें भी जवाब देना चाहिए। यही वजह है कि नाम वापसी के बाद भी कार्यकर्ताओं में स्वाभाविक उत्साह नहीं लौट पाया है। शनिवार को पर्चा वापसी के बाद चारू कोठारी और कुसुम कंडवाल के पीछे कार्यकर्ताओं की भीड़ नहीं दिखी। दूसरा अहम पहलू यह भी है कि कांग्रेस से चुनाव लड़ रही लक्ष्मी सजवाण भाजपा की पृष्ठभूमि से हैं। ऐसे में उनकी पैठ भाजपा के लिए वोट कटवा का रोल अदा करेगी। रही बात कांग्रेस की तो अंदरखाने असंतोष के कारण यहां भी जमीनी कार्यकर्ता पूरे समर्पण के साथ अब तक नहीं जुड़ पाए हैं। मेयर की दावेदारी से नाम वापस लेने वाली अनीता असवाल की पृष्ठभूमि कांग्रेस की रही है। लिहाजा वे कांग्रेस के किले में सेंधमारी कर सकती हैं।
वाद के सहारे नैया पार लगाने की जुगत
पहाड़ और मैदान वाद चुनावों में काफी पुराने फैक्टर रहे हैं। इस बार डैमेज कंट्रोल के चक्कर में ऐसा समीकरण बन गया है कि दो पहाड़ी प्रत्याशियों के बीच में एक मैदानी छवि का प्रत्याशी है। इस नजरिए से देखा जाए तो दोनों बड़ी पार्टियों के प्रत्याशी अपने बुनियादी वोटों के तितर-बितर होने का शिकार हो सकते हैं।
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नगर निगम मेयर के दावेदारों की लड़ाई अब दिलचस्प मोड़ पर आ पहुंची है। भाजपा में बागियों का तूफान तो शांत हो गया है, लेकिन अंदरखाने की सच्चाई यह है कि भितरघात की धूल पूरी तरह बैठी नहीं है। वहीं कांग्रेस में भी स्थिति सामान्य नहीं है।
भाजपा ने बागियों को चुनाव में बैठाकर फौरी सफलता भले ही हासिल कर ली हो, लेकिन जमीनी स्तर पर मनभेद की खाई अभी जस की तस है। कांग्रेस में भी कमोबेश यही हालात हैं। दोनों ही बड़ी पार्टियों के कार्यकर्ताओं और स्थनीय पदाधिकारियों को शिद्दत से महसूस हो रहा है कि शीर्ष पदों पर बैठे नेता जो राजनीति कर रहे हैं उसी के अनुरूप उन्हें भी जवाब देना चाहिए। यही वजह है कि नाम वापसी के बाद भी कार्यकर्ताओं में स्वाभाविक उत्साह नहीं लौट पाया है। शनिवार को पर्चा वापसी के बाद चारू कोठारी और कुसुम कंडवाल के पीछे कार्यकर्ताओं की भीड़ नहीं दिखी। दूसरा अहम पहलू यह भी है कि कांग्रेस से चुनाव लड़ रही लक्ष्मी सजवाण भाजपा की पृष्ठभूमि से हैं। ऐसे में उनकी पैठ भाजपा के लिए वोट कटवा का रोल अदा करेगी। रही बात कांग्रेस की तो अंदरखाने असंतोष के कारण यहां भी जमीनी कार्यकर्ता पूरे समर्पण के साथ अब तक नहीं जुड़ पाए हैं। मेयर की दावेदारी से नाम वापस लेने वाली अनीता असवाल की पृष्ठभूमि कांग्रेस की रही है। लिहाजा वे कांग्रेस के किले में सेंधमारी कर सकती हैं।
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वाद के सहारे नैया पार लगाने की जुगत
पहाड़ और मैदान वाद चुनावों में काफी पुराने फैक्टर रहे हैं। इस बार डैमेज कंट्रोल के चक्कर में ऐसा समीकरण बन गया है कि दो पहाड़ी प्रत्याशियों के बीच में एक मैदानी छवि का प्रत्याशी है। इस नजरिए से देखा जाए तो दोनों बड़ी पार्टियों के प्रत्याशी अपने बुनियादी वोटों के तितर-बितर होने का शिकार हो सकते हैं।
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