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देश का विभाजन हुआ, लेकिन भावनाओं का नहीं
Updated Thu, 15 Mar 2018 10:32 PM IST
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श्रीनगर। भारत-पाकिस्तान का विभाजन ऐसी घटना है, जिसका दर्द हर किसी को कचोटता है। आजादी के बाद देश के दो टुकड़े होने पर बड़ी तादाद में लोगों को पाकिस्तान से भारत व भारत से पाकिस्तान पलायन करना पड़ा। रिश्ते टूटे और जिंदगियां खत्म हुई। लाखों लोग बेघर हो गए। इस दर्दनाक हादसे में देश की सीमाएं ही नहीं बटी, बल्कि दिल भी बंट गए। दोनों देशों के बीच आज भी यह खटास बरकरार है।
बंटवारे के दौर के इसी मंजर को ‘जश्न-ए-विरासत’ नाट्य महोत्सव के मंच पर दिखाया गया। दिल्ली के अस्मिता थियेटर ग्रुप ने असगर वजाहत के चर्चित नाटक ‘जिस लाहौर नहीं देख्या, वो जम्या ही नहीं’ नाटक का मंचन किया। अरविंद गौड़ के निर्देशन में कलाकारों ने 1947 में हुए बंटवारे के समय की स्थिति का मंचन किया। कथानक के अनुसार, विभाजन के बाद एक परिवार लखनऊ से लाहौर चला जाता है। शरणार्थी शिविर में रहने के बाद उसे एक बड़ा मकान आवंटित होता है, लेकिन जब वो वहां पहुंचते हैं तो देखते हैं कि एक बूढ़ी औरत रह गई है। उन्हें लगता है कि जब तक यह रहेगी, मकान हमारा नहीं हो सकता। वो बूढ़ी औरत भी चाहती है कि वह लोग चले जाएं।
बूढ़ी औरत स्वभाव से बड़ी मददगार है और धीरे-धीरे दोनों परिवारों के बीच एक रिश्ता पनपने लगता है। जब शहर के गुंडों को पता चलता है तो कि हिंदू बुढ़िया रह गई है तो उनकी कोशिश होती है कि उसे निकालें, लेकिन यही परिवार उसे बचाता है। बाद में जब वो मरती है तो सवाल उठता है कि इसका क्रियाकर्म कैसे किया जाए। स्थानीय मौलवी की राय पर उसका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से किया जाता है। उसके शव को राम-नाम सत्य कहते हुए ले जाते हैं और रावी के किनारे जला देते हैं। इसकी प्रतिक्रिया में गुंडे मौलवी की हत्या कर देते हैं। बुधवार को कार्यक्रम का शुभारंभ प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री डा. धन सिंह रावत ने किया। इस अवसर पर महेश गिरि, सत्यजीत खंडूड़ी, विकास कुकरेती, परवेज अहमद, पंकज मैंदोली, ऋतांशु कंडारी, विवेक ममगांई और निलेश थपलियाल आदि मौजूद थे।
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इन कलाकारों ने किया अभिनय
काकोली गौड़-माई, राहुल खन्ना-मिर्जा, देवेंद्र कौर-पत्नी, सावेरी गौड़-बेटी, अमित रावल-पहलवान, प्रभाकर पांडेय-शायर, शिवम भसीन-बेटा, शशांक वर्मा-मौलवी।
बंटवारे के दौर के इसी मंजर को ‘जश्न-ए-विरासत’ नाट्य महोत्सव के मंच पर दिखाया गया। दिल्ली के अस्मिता थियेटर ग्रुप ने असगर वजाहत के चर्चित नाटक ‘जिस लाहौर नहीं देख्या, वो जम्या ही नहीं’ नाटक का मंचन किया। अरविंद गौड़ के निर्देशन में कलाकारों ने 1947 में हुए बंटवारे के समय की स्थिति का मंचन किया। कथानक के अनुसार, विभाजन के बाद एक परिवार लखनऊ से लाहौर चला जाता है। शरणार्थी शिविर में रहने के बाद उसे एक बड़ा मकान आवंटित होता है, लेकिन जब वो वहां पहुंचते हैं तो देखते हैं कि एक बूढ़ी औरत रह गई है। उन्हें लगता है कि जब तक यह रहेगी, मकान हमारा नहीं हो सकता। वो बूढ़ी औरत भी चाहती है कि वह लोग चले जाएं।
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बूढ़ी औरत स्वभाव से बड़ी मददगार है और धीरे-धीरे दोनों परिवारों के बीच एक रिश्ता पनपने लगता है। जब शहर के गुंडों को पता चलता है तो कि हिंदू बुढ़िया रह गई है तो उनकी कोशिश होती है कि उसे निकालें, लेकिन यही परिवार उसे बचाता है। बाद में जब वो मरती है तो सवाल उठता है कि इसका क्रियाकर्म कैसे किया जाए। स्थानीय मौलवी की राय पर उसका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से किया जाता है। उसके शव को राम-नाम सत्य कहते हुए ले जाते हैं और रावी के किनारे जला देते हैं। इसकी प्रतिक्रिया में गुंडे मौलवी की हत्या कर देते हैं। बुधवार को कार्यक्रम का शुभारंभ प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री डा. धन सिंह रावत ने किया। इस अवसर पर महेश गिरि, सत्यजीत खंडूड़ी, विकास कुकरेती, परवेज अहमद, पंकज मैंदोली, ऋतांशु कंडारी, विवेक ममगांई और निलेश थपलियाल आदि मौजूद थे।
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इन कलाकारों ने किया अभिनय
काकोली गौड़-माई, राहुल खन्ना-मिर्जा, देवेंद्र कौर-पत्नी, सावेरी गौड़-बेटी, अमित रावल-पहलवान, प्रभाकर पांडेय-शायर, शिवम भसीन-बेटा, शशांक वर्मा-मौलवी।