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राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में न्याय शास्त्र की उपयोगिता पर आयोजित हुआ सेमिनार
Updated Wed, 28 Feb 2018 10:52 PM IST
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देवप्रयाग। रघुनाथ कीर्ति राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमीनार में उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय हरिद्वार के कुलपति प्रो. पीयूष कांत दीक्षित ने कहा कि गौतम ऋषि का न्याय शास्त्र आज भी अत्यंत उपयोगी है जो समुचित तथ्यों के आधार पर समस्याओं के समाधान करने में सहायक सिद्ध हो रहा है।
बुधवार को रघुनाथ कीर्ति राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में न्याय शास्त्र में पदवृत्ति विचार पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का विधिवत समापन हुआ। इस अवसर पर कर्नाटक संस्कृत विश्वविद्यालय बंगलूरू के वेदांत शास्त्र के प्रो. वीरनारायण पांडुरंगी ने कहा कि न्याय शास्त्र सभी शास्त्रों का उपकारक शास्त्र है। न्याय शास्त्र के माध्यम से ही पदार्थों का यथार्थ निर्णय होता है। संगोष्ठी के संयोजक डा. आर बालमुरुगन ने कहा कि न्याय शास्त्र पुराणों द्वारा अर्थपरीक्षण करता है तथा प्रमाण से रहित पदार्थों का अस्तित्व स्वीकार नहीं करता। न्याय शास्त्र के अध्ययन से व्यक्ति के अंदर तर्कशक्ति और चिंतन शक्ति का विकास होता है। प्रो. के बी सुब्बारायदु ने कहा कि राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान संस्कृत भाषा और उसमें निहित सभी प्रकार के ज्ञान विज्ञान के संरक्षण और प्रचार प्रसार के लिए प्रयत्नशील है। संस्थान की ओर से संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे है। कार्यक्रम के दौरान शोधार्थियों द्वारा 20 शोध पत्र भी पढ़े गए। इस मौके पर डा. मनीष जुगराण, डा. शैलेंद्र उनियाल, डा. प्रफुल गढ़पाल, डा. अरविंद गौड़, डा. मुकेश, डा. बीरेंद्र आदि मौजूद थे।
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बुधवार को रघुनाथ कीर्ति राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में न्याय शास्त्र में पदवृत्ति विचार पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का विधिवत समापन हुआ। इस अवसर पर कर्नाटक संस्कृत विश्वविद्यालय बंगलूरू के वेदांत शास्त्र के प्रो. वीरनारायण पांडुरंगी ने कहा कि न्याय शास्त्र सभी शास्त्रों का उपकारक शास्त्र है। न्याय शास्त्र के माध्यम से ही पदार्थों का यथार्थ निर्णय होता है। संगोष्ठी के संयोजक डा. आर बालमुरुगन ने कहा कि न्याय शास्त्र पुराणों द्वारा अर्थपरीक्षण करता है तथा प्रमाण से रहित पदार्थों का अस्तित्व स्वीकार नहीं करता। न्याय शास्त्र के अध्ययन से व्यक्ति के अंदर तर्कशक्ति और चिंतन शक्ति का विकास होता है। प्रो. के बी सुब्बारायदु ने कहा कि राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान संस्कृत भाषा और उसमें निहित सभी प्रकार के ज्ञान विज्ञान के संरक्षण और प्रचार प्रसार के लिए प्रयत्नशील है। संस्थान की ओर से संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे है। कार्यक्रम के दौरान शोधार्थियों द्वारा 20 शोध पत्र भी पढ़े गए। इस मौके पर डा. मनीष जुगराण, डा. शैलेंद्र उनियाल, डा. प्रफुल गढ़पाल, डा. अरविंद गौड़, डा. मुकेश, डा. बीरेंद्र आदि मौजूद थे।
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