{"_id":"5a7e03124f1c1ba4268b98c5","slug":"15182079633-rishikesh-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"निजी परिवहन कंपनियों को पहाड़ी रूटों पर घाटे का सौदा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
निजी परिवहन कंपनियों को पहाड़ी रूटों पर घाटे का सौदा
Updated Sat, 10 Feb 2018 01:52 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
ब्यूरो/ऋषिकेश। पहाड़ी क्षेत्रों में यातायात संचालन के सबसे बड़े बस बेड़े संयुक्त रोटेशन यात्रा व्यवस्था समिति के अंतर्गत आने वाली परिवहन कंपनियों का पहाड़ में वाहनों संचालन करना घाटे का सौदा बना हुआ है। वजह वर्ष 2013 की आपदा से नुकसान में चल रहे पहाड़ के निजी परिवहन व्यवसाय को नुकसान से उबारने के लिए राज्य सरकार राहत देने की बात तो दूर पिछले पांच वर्षों से वाहनों का किराया तक नहीं बढ़ाया गया है। निजी परिवहन कंपनियां राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में यात्रियों को 95 पैसे प्रति किलोमीटर (राज्य परिवहन प्राधिकरण द्वारा निर्धारित) के लिहाज से यात्रा करा रही हैं।
वहीं एक ही स्टेट में सरकार का राज्य परिवहन निगम (एसटीसी) एक किलोमीटर का 1.72 रुपये वसूल रही है। किराए में यह अंतर राज्य सरकार के स्टेट ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी द्वारा बीते पांच वर्षों में निजी परिवहन सेवाओं के किराया रिवाइज करने से आया है। राज्य सरकार के स्टेट ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी (एसटीए) ने वर्ष 2013 से अब तक गढ़वाल मंडल के विभिन्न जनपदों व उत्तराखंड की चारधाम यात्रा में संचालित होने वाली निजी परिवहन संस्थाओं की बसों के किराए में कोई बढ़ोतरी नहीं की है। वहीं एसटीसी की बसों का किराया पिछले पांच वर्षों में तीन बार रिवाइज किया जा चुका है, जिससे पहाड़ी इलाकों में संचालित होने वाली निजी परिवहन सेवाएं घाटे में चल रही हैं।
पांच साल में 60 फीसदी बढ़े खर्चे
ऋषिकेश। संयुक्त रोटेशन यात्रा व्यवस्था समिति के अनुसार वर्ष 2013 से एसटीए द्वारा निजी परिवहन के किराए में वृद्धि नहीं की है। जबकि बीते पांच वर्ष में इंश्योरेंस, डीजल, टायर, मेंटीनेंस, स्पेयर पार्ट्स आदि में 55 से 60 फीसदी तक बढ़ोतरी हो चुकी है। लिहाजा निजी परिवहन संस्थाओं को कम फायदे वाले पहाड़ी रूटों पर आर्थिक नुकसान उठाकर सेवाएं देनी पड़ रही हैं।
विज्ञापन
पांच साल में दामों में अंतर
वर्ष 2013 वर्ष 2017
डीजल-57-59
मोबिल ऑयल 240-250
टायर-02 30,000- 40,000
मैकेनिक 500-1000
इंश्योरेंस बीमा 35,000-55,000
वाहन चेसिस 13,76000 -18,50000
वाहन बॉडी 3,50000-500,000
स्टाफ वेतन 10,000-15,000
अन्य खर्चे 700-2300
लोकल रूट घाटे के, दो माह में सिमटी यात्रा
निजी परिवहन कंपनियों के पास पहाड़ में जो भी रूट हैं। उन पर सवारियों की कमी के चलते नियमित सेवाएं देना किसी जोखिम से कम नहीं हैं। संयुक्त रोटेशन के प्रशासनिक अधिकारी बृजभानु प्रकाश गिरि के अनुसार घाटे के बावजूद कंपनियां इन पर अपने वाहनों का संचालन कर रही हैं। जबकि उत्तराखंड की चारधाम यात्रा महज दो महीने में सिमटकर रह गई है। यात्रा में हर साल शुरुआती दो महीने में ही ठीकठाक यात्रियों की आमद होती है। बरसात में यात्रा लगभग थम सी जाती है, और सितंबर से कपाट बंद होने तक यात्रियों की छुटपुट आमद होती है।
कब-कब बढ़ा परिवहन निगम का किराया
एसटीए ने पांच मई-2013 को पहाड़ी रूटों पर मंजिली वाहनों स्टेज कैरिज की बसों का किराया 95 पैसे प्रति किमी. तय किया था। जबकि 11 मई 2013 को राज्य परिवहन का किराया मैदानी भागों में 89 पैसे व पहाड़ी रूटों पर 1.42 रुपये किया गया था। इसके बाद निजी परिवहन का किराया नहीं बढ़ा। जबकि निगम के वाहनों का वर्ष 2016 में 98 पैसे व 1.56 रुपये जबकि अक्टूबर -2017 को बढ़कर मैदानों में 1.08 रुपये व पहाड़ी रूटों पर 1.72 रुपये बढ़ा।
क्या कहते हैं रोटेशन अध्यक्ष
सरकार हमेशा पर्वतीय क्षेत्रों के विकास के लिए पड़ोसी राज्य हिमाचल की नीति को रोल मॉडल के तौर पर पेश करती है। मगर परिवहन के मामले का सरकार बिल्कुल संज्ञान नहीं लेती। हिमाचल की सड़कें व इंफ्रास्ट्रक्चर उत्तराखंड से काफी बेहतर हैं, फिर भी वहां प्रति किलोमीटर किराया उत्तराखंड की तुलना में काफी अधिक है। यहां सड़कों की स्थिति के हिसाब से निजी वाहनों का किराया न्यूनतम 1.80 रुपये होना चाहिए। यदि सरकार भविष्य में जिस तरह परिवहन निगम का किराया बढ़ाएगी, उसी अनुपात में निजी परिवहन कंपनियों का किराया भी बढ़ाना चाहिए।
- सुधीर राय, अध्यक्ष संयुक्त रोटेशन यात्रा व्यवस्था समिति ।
विज्ञापन
वहीं एक ही स्टेट में सरकार का राज्य परिवहन निगम (एसटीसी) एक किलोमीटर का 1.72 रुपये वसूल रही है। किराए में यह अंतर राज्य सरकार के स्टेट ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी द्वारा बीते पांच वर्षों में निजी परिवहन सेवाओं के किराया रिवाइज करने से आया है। राज्य सरकार के स्टेट ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी (एसटीए) ने वर्ष 2013 से अब तक गढ़वाल मंडल के विभिन्न जनपदों व उत्तराखंड की चारधाम यात्रा में संचालित होने वाली निजी परिवहन संस्थाओं की बसों के किराए में कोई बढ़ोतरी नहीं की है। वहीं एसटीसी की बसों का किराया पिछले पांच वर्षों में तीन बार रिवाइज किया जा चुका है, जिससे पहाड़ी इलाकों में संचालित होने वाली निजी परिवहन सेवाएं घाटे में चल रही हैं।
विज्ञापन
पांच साल में 60 फीसदी बढ़े खर्चे
ऋषिकेश। संयुक्त रोटेशन यात्रा व्यवस्था समिति के अनुसार वर्ष 2013 से एसटीए द्वारा निजी परिवहन के किराए में वृद्धि नहीं की है। जबकि बीते पांच वर्ष में इंश्योरेंस, डीजल, टायर, मेंटीनेंस, स्पेयर पार्ट्स आदि में 55 से 60 फीसदी तक बढ़ोतरी हो चुकी है। लिहाजा निजी परिवहन संस्थाओं को कम फायदे वाले पहाड़ी रूटों पर आर्थिक नुकसान उठाकर सेवाएं देनी पड़ रही हैं।
विज्ञापन
पांच साल में दामों में अंतर
वर्ष 2013 वर्ष 2017
डीजल-57-59
मोबिल ऑयल 240-250
टायर-02 30,000- 40,000
मैकेनिक 500-1000
इंश्योरेंस बीमा 35,000-55,000
वाहन चेसिस 13,76000 -18,50000
वाहन बॉडी 3,50000-500,000
स्टाफ वेतन 10,000-15,000
अन्य खर्चे 700-2300
लोकल रूट घाटे के, दो माह में सिमटी यात्रा
निजी परिवहन कंपनियों के पास पहाड़ में जो भी रूट हैं। उन पर सवारियों की कमी के चलते नियमित सेवाएं देना किसी जोखिम से कम नहीं हैं। संयुक्त रोटेशन के प्रशासनिक अधिकारी बृजभानु प्रकाश गिरि के अनुसार घाटे के बावजूद कंपनियां इन पर अपने वाहनों का संचालन कर रही हैं। जबकि उत्तराखंड की चारधाम यात्रा महज दो महीने में सिमटकर रह गई है। यात्रा में हर साल शुरुआती दो महीने में ही ठीकठाक यात्रियों की आमद होती है। बरसात में यात्रा लगभग थम सी जाती है, और सितंबर से कपाट बंद होने तक यात्रियों की छुटपुट आमद होती है।
कब-कब बढ़ा परिवहन निगम का किराया
एसटीए ने पांच मई-2013 को पहाड़ी रूटों पर मंजिली वाहनों स्टेज कैरिज की बसों का किराया 95 पैसे प्रति किमी. तय किया था। जबकि 11 मई 2013 को राज्य परिवहन का किराया मैदानी भागों में 89 पैसे व पहाड़ी रूटों पर 1.42 रुपये किया गया था। इसके बाद निजी परिवहन का किराया नहीं बढ़ा। जबकि निगम के वाहनों का वर्ष 2016 में 98 पैसे व 1.56 रुपये जबकि अक्टूबर -2017 को बढ़कर मैदानों में 1.08 रुपये व पहाड़ी रूटों पर 1.72 रुपये बढ़ा।
क्या कहते हैं रोटेशन अध्यक्ष
सरकार हमेशा पर्वतीय क्षेत्रों के विकास के लिए पड़ोसी राज्य हिमाचल की नीति को रोल मॉडल के तौर पर पेश करती है। मगर परिवहन के मामले का सरकार बिल्कुल संज्ञान नहीं लेती। हिमाचल की सड़कें व इंफ्रास्ट्रक्चर उत्तराखंड से काफी बेहतर हैं, फिर भी वहां प्रति किलोमीटर किराया उत्तराखंड की तुलना में काफी अधिक है। यहां सड़कों की स्थिति के हिसाब से निजी वाहनों का किराया न्यूनतम 1.80 रुपये होना चाहिए। यदि सरकार भविष्य में जिस तरह परिवहन निगम का किराया बढ़ाएगी, उसी अनुपात में निजी परिवहन कंपनियों का किराया भी बढ़ाना चाहिए।
- सुधीर राय, अध्यक्ष संयुक्त रोटेशन यात्रा व्यवस्था समिति ।