उत्तराखंड के 14 साल, क्या खोया क्या पाया?
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14 साल की यात्रा में उत्तराखंड ने बहुत कुछ हासिल किया पर राज्य गठन की अपेक्षाओं को पूरा करने की चुनौती से पार नही पा पाया। प्रदेश ने 18 प्रतिशत की विकास दर हासिल की पर पहाड़ पर डॉक्टर, शिक्षक, कर्मचारियों को नहीं पहुंचा पाया। अब विकास दर नौ प्रतिशत है और कम होने से रोकने की चुनौती सामने है।
प्रति व्यक्ति औसत आय 90 हजार तक पहुंची पर गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों का 47 प्रतिशत आंकड़ा कम नहीं हुआ। केदारनाथ की जून 2013 की आपदा के जख्म अभी भरे जाने हैं और आपदाओं की यह चुनौती अब और बड़ी होकर सामने है।
राज्य गठन के समय प्रदेश की आर्थिक स्थिति खास अच्छी नहीं थी। विकास दर कुल तीन प्रतिशत थी। प्रदेश में उद्योग, बैंक की उपस्थिति न के बराबर थी। पहाड़ में सड़कों का नेटवर्क बेहद सीमित था। पहाड़ को पनिसमेंट पोस्टिंग के नाम से जाना जाता था। पहाड़ की आर्थिकी मनि आर्डर पर निर्भर थी।
18% तक पहुंची विकास दर, अब दस से नीचे
इन 14 सालों में इसमें बदलाव आया। 2008 में 18 प्रतिशत की विकास दर को छूने के बाद अब वर्तमान में प्रदेश की विकास दर करीब 10 प्रतिशत है। प्रति व्यक्ति 22 हजार से बढ़कर 90 हजार के आसपास है। जीडीपी करीब 94 हजार करोड़ रुपये की है। प्रदेश में अब करीब 150 भारी उद्योग हैं। जीडीपी में उद्योगों का योगदान 18 प्रतिशत से बढ़कर 35 प्रतिशत हो गया है।
पर इसके साथ ही चुनौतियों का अंबार भी खड़ा हो गया है। विकास दर ग्लोबल मंदी और सरकार के अपने खर्च से पिसकर करीब नौ प्रतिशत पर पहुंच गई है। उद्योग आए पर पहाड़ इनसे अछूता ही रहा। कृषि में विकास दर दो प्रतिशत पर आकर अटक गई है। हालांकि प्रदेश की जनसंख्या का 70 प्रतिशत आज भी खेती पर आजीविका के लिए निर्भर है।
2003 में राज्य स्थापना दिवस पर आयोजित व्याख्यान में न्यायविद डॉ. एलएम सिंघवी ने कहा था कि अपेक्षाओं पर खरा उतरना प्रदेश की सबसे बड़ी चुनौती होगी। प्रदेश के सामने यह चुनौती अब भी बनी हुई है। 2010 से पहले राज्य के कई हिस्से सूखे से प्रभावित रहे।
न ऊर्जा हब बना और न ही पर्यटन हब
2010 के बाद लगातार मौसम बदलाव और आपदाओं का हमला जारी है। जून 2013 की केदारनाथ आपदा ने पिछले सारे रिकार्ड ही तोड़ डाले। 2005 में आपदा प्रबंधन एक्ट लागू होने के बाद भी प्रदेश का आपदा प्रबंधन तंत्र पटरी पर नही है। चार धाम यात्रा 2013 से पहले अव्यवस्थित थी और 2013 के बाद करीब-करीब ठप।
प्रदेश में करीब 27 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता हैं। पर 14 साल में इसमें से केवल साढ़े तीन हजार मेगावाट का उत्पादन ही हो पाया। पुनर्वास का मसला जस का तस है और 14 साल में प्रदेश इस समस्या को नहीं सुलझा पाया।
2001 से अब तक दस हजार किलोमीटर रोड नेटवर्क बढ़ा पर क्वालिटी रोड नहीं मिली। रेल नेटवर्क में एक इंच भी इजाफा नहीं हुआ। अब कर्णप्रयाग-ऋषिकेश रेल नेटवर्क से उम्मीद है। लोगों की अपेक्षाएं थीं कि हर गांव को साफ पानी, बिजली और हर युवा को रोजगार मिलेगा। इस समय रोजगार कार्यालयों में ही पांच लाख से अधिक बेरोजगार हैं।