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उतराखंड की पांडुलिपियों पर शोध की आवश्यकता
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ब्यूरो/अमर उजाला/देहरादून।
उत्तराखंड में कई पांडुलिपियां ऐसी मिली हैं, जिन्होंने इतिहास के तथ्यों को बदलने का काम किया है। कई घरों में भी ऐसी पांडुुलिपियां मिली हैं। हालांकि इन पर बहुत गंभीरता से काम नहीं हुुआ है। ऐसे में राज्य की पांडुलिपियों पर शोध की आवश्यकता है।
यह बातें वक्ताओं ने बृहस्पतिवार को कैंब्रियन हॉल स्कूल में आयोजित राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन, संस्कृति मंत्रालय और पुराना दरबार ऑर्कलॉजिकल एंड मैटेरियल कलेक्शन ट्रस्ट की राष्ट्रीय संगोष्ठी में कहीं। संगोष्ठी का शुभारंभ प्रकाशन विभाग के पूर्व महानिदेशक पद्मश्री डॉ. श्याम सिंह शशि, पूर्व मुख्य सचिव नृप सिंह नपलच्याल, पद्मश्री बसंती बिष्ट, पुराना दरबार के भवानी प्रताप सिंह, पांडुलिपि मिशन के श्रीधर बारिक और संस्कृत विवि की पूर्व कुलपति डॉ. सुधा रानी पांडे ने संयुक्त रूप किया। पद्मश्री बसंती बिष्ट ने बदरीनाथ की आरती प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि आरती के रूप में यह पांडुलिपि वर्ष 1750 के आसपास की है, जो करीब 20 वर्ष पूर्व बर्थवाल थोकदारों के यहां से मिली। अन्य वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड के चारों धामों में कई पांडुलिपियां मिली हैं, जिनका ऐतिहासिक महत्व है। पांडुलिपि में छिपे इस ज्ञान और रहस्य को पूरी दुनिया में पहुंचाने की आवश्यकता है। कार्यक्रम संयोजक डॉ. देवेंद्र कुमार ने कार्यक्रम के उद्देश्यों की जानकारी दी। संगोष्ठा में साहित्यकार डॉ. एससी ब्याला की टहकन से बनी जैमिनी याश्वमेध की पांडुलिपि पर आधारित शोध ग्रंथ का विमोचन भी किया गया। इसके अलावा प्रो. यशवंत कठोच, प्रो. शिव प्रसाद नैथानी, डॉ. विष्णु दत्त कुकरेती, बीना बेंजवाल, विजय बहुगुण ने भी अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
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उत्तराखंड में कई पांडुलिपियां ऐसी मिली हैं, जिन्होंने इतिहास के तथ्यों को बदलने का काम किया है। कई घरों में भी ऐसी पांडुुलिपियां मिली हैं। हालांकि इन पर बहुत गंभीरता से काम नहीं हुुआ है। ऐसे में राज्य की पांडुलिपियों पर शोध की आवश्यकता है।
यह बातें वक्ताओं ने बृहस्पतिवार को कैंब्रियन हॉल स्कूल में आयोजित राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन, संस्कृति मंत्रालय और पुराना दरबार ऑर्कलॉजिकल एंड मैटेरियल कलेक्शन ट्रस्ट की राष्ट्रीय संगोष्ठी में कहीं। संगोष्ठी का शुभारंभ प्रकाशन विभाग के पूर्व महानिदेशक पद्मश्री डॉ. श्याम सिंह शशि, पूर्व मुख्य सचिव नृप सिंह नपलच्याल, पद्मश्री बसंती बिष्ट, पुराना दरबार के भवानी प्रताप सिंह, पांडुलिपि मिशन के श्रीधर बारिक और संस्कृत विवि की पूर्व कुलपति डॉ. सुधा रानी पांडे ने संयुक्त रूप किया। पद्मश्री बसंती बिष्ट ने बदरीनाथ की आरती प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि आरती के रूप में यह पांडुलिपि वर्ष 1750 के आसपास की है, जो करीब 20 वर्ष पूर्व बर्थवाल थोकदारों के यहां से मिली। अन्य वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड के चारों धामों में कई पांडुलिपियां मिली हैं, जिनका ऐतिहासिक महत्व है। पांडुलिपि में छिपे इस ज्ञान और रहस्य को पूरी दुनिया में पहुंचाने की आवश्यकता है। कार्यक्रम संयोजक डॉ. देवेंद्र कुमार ने कार्यक्रम के उद्देश्यों की जानकारी दी। संगोष्ठा में साहित्यकार डॉ. एससी ब्याला की टहकन से बनी जैमिनी याश्वमेध की पांडुलिपि पर आधारित शोध ग्रंथ का विमोचन भी किया गया। इसके अलावा प्रो. यशवंत कठोच, प्रो. शिव प्रसाद नैथानी, डॉ. विष्णु दत्त कुकरेती, बीना बेंजवाल, विजय बहुगुण ने भी अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
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