यूपी की लापरवाही से उत्तराखंड में मची भयंकर तबाही
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उत्तराखंड के ऊधमसिंहनगर के लोहिया हेड बांध टूटने के मामले में उत्तर प्रदेश ने उत्तराखंड को ही जिम्मेदार ठहराया है। सिंचाई विभाग के विभागाध्यक्ष व प्रमुख अभियंता अवध नरेश गुप्ता ने कहा कि गलती उत्तराखंड की है और आरोप उत्तर प्रदेश के सिंचाई विभाग पर लगाया जा रहा है।
उत्तराखंड के लोहिया हेड बांध बिजली परियोजना में यूपी की नहर से ही पानी जाता है। उत्तराखंड की बिजली परियोजना की टरबाइन ट्रिप कर गई। लेकिन उत्तराखंड ने अपने सुरक्षा उपाय नहीं अपनाए। तुरंत ही बिजली परियोजना के गेट बंद किए जाने चाहिए थे, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
अब उत्तराखंड हमें विलंब से पानी बंद करने का आरोप लगा रहा है। जबकि हमारे अधिकारियों के पास फोन कॉल व मैसेज का समय मोबाइल पर दर्ज है। जैसे ही हमें सूचना मिली हमने नहर के गेट बंद कर दिए। चूंकि नहर का गेट से पावर हाउस के बीच की दूरी ही 14-15 किलोमीटर दूर है।
इसलिए गेट बंद करने के बावजूद बीच का जो पानी है वो तो जाएगा ही। उत्तराखंड के जल विद्युत निगम को सुरक्षा में अपने गेट बंद करने चाहिए थे। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इसलिए नुकसान ज्यादा हुआ है। अवध नरेश गुप्ता ने कहा कि जहां तक नहर की बात है तो इसे फिर चलाना हमारी मजबूरी है।
उत्तर प्रदेश में सूखे की स्थिति है। इस समय किसानों की धान की फसल सूख रही है। ऐसे में नहर हम फिर चलाएंगे। उत्तराखंड को अपने सुरक्षा उपाय खुद करने होंगे। इस समय यूपी की सारी नहरें ओवर गेट पर चलाई जा रही हैं। अगर ऐसा नहीं किया गया तो यूपी के किसान और तबाह हो जाएंगे।
यूपी सिंचाई विभाग की लापरवाही से सुरक्षा दीवार फटी
बनबसा स्थित लोहिया हेड पावर हाउस में हुई तबाही के लिए यूपी सिंचाई विभाग की लापरवाही भी कम जिम्मेदार नहीं है। चैनल (नहर) की सुरक्षा दीवार अत्यधिक रेत डंप होने से फटी है।
बनबसा बैराज का सिल्ट इजेक्टर पिछले आठ माह से चोक था और शारदा हैडवर्क्स के अधिकारियों को इससे कोई सरोकार नहीं रहा। नतीजा तबाही के रूप में सामने आया है।
अंग्रेजों ने 1946 में लोहिया हेड पावर हाउस के लिए बनबसा बैराज से पावर चैनल निकाली थी। पानी में आने वाली रेत पावर हाउस तक न पहुंचे इसके लिए बैराज से करीब डेढ़ सौ मीटर दूर चैनल में सिल्ट इजेक्टर बनाया गया, जो पिछले आठ माह से चोक था।
सिल्ट इजेक्टर के चोक होने से चैनल रेत से पट गई, जिस कारण पानी फैल कर बह रहा था और इसका तटबंधों पर इसका दबाव पड़ रहा था। लोहिया हेड पावर हाउस में फोरवे की जाली के बाद चैनल डाउन है, इससे पानी सीधे नीचे गिरकर टरबाइन को घुमाता है, लेकिन फोरवे में भी रेत डंप है।
जानकारों के मुताबिक फोरवे में रेत के डंप होने से पानी ने चैनल का तटबंध तोड़कर तबाही मचाई। इस संबंध में शारदा हैडवर्क्स के एसडीओ बलवीर सिंह यादव से संपर्क नहीं हो पाया। बैराज अटेंडेंट जगदीश श्रीवास्तव ने स्वीकारा कि सिल्ट इजेक्टर आठ माह से चोक है।
उनका कहना है कि सिल्ट इजेक्टर समेत चैनल की मरम्मत के लिए शासन से कई क्लोजर मांगे गए, लेकिन नहीं मिले। उन्होंने बताया कि 1998 के बाद पांच साल पूर्व 2011 में ही क्लोजर मांगा गया था।
लाभ यूपी को, सुरक्षा उत्तराखंड की
शारदा बैराज से निकाली गई नहर से सिंचाई का लाभ यूपी को मिल रहा है, लेकिन इसकी सुरक्षा की जिम्मेदार उत्तराखंड के पास है।
सीओ पीएस पांगती ने बताया कि बैराज की सुरक्षा को उत्तराखंड पुलिस ने चौकी स्थापित कर एक उप निरीक्षक, एक एचसी, पांच कांस्टेबल और दो महिला कांस्टेबल तैनात किए है। साथ ही गारद पुलिस का एक एचपी और तीन जवान बैराज की निगरानी करते हैं।
सभी बांधों पर है यूपी का स्वामित्व
प्रमुख अभियंता व सिंचाई विभाग के विभागाध्यक्ष अवध नरेश गुप्ता ने कहा कि सिंचाई विभाग के पास सभी 71 बांधों का स्वामित्व है। उत्तराखंड बनने से पहले जितने बांध भी पहाड़ों पर थे वे सभी यूपी के पास ही हैं।
सिंचाई विभाग के ज्यादातर बांध पहाड़ पर ही हैं। उत्तराखंड बांधों पर अपना स्वामित्व चाहता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्टे यूपी के पक्ष में दिया है।
यूपी के 10 जिलों में होती है सिंचाई
शारदा सिंचाई परियोजना से उत्तर प्रदेश के 10 जिलों में सिंचाई होती है। इनमें पीलीभीत, बरेली, लखीमपुर खीरी, शाहजहांपुर, हरदोई, सीतापुर, लखनऊ, उन्नाव, बाराबंकी व रायबरेली के करीब 22 लाख हेक्टेयर सिंचाई के लिए भूमि आती है। हालांकि इस समय आठ से 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ही इस परियोजना से सिंचाई हो पा रही है।
पानी उत्तराखंड का कब्जा यूपी का
शारदा से लेकर तुमड़िया, नानकसागर, बैगुल, धौरा, बौर और हरिपुरा जलाशय हमारी जमीन पर हैं और इनका पानी भी हमारा है। मगर इन पर कब्जा यूपी का है। उत्तराखंड के पानी से यूपी में फसलें लहलहा रही हैं और लाखों की आबपाशी भी यूपी ही वसूलता है।
यूपी के दो लाख गांवों को उत्तराखंड के पानी से सिंचाई होती है। इसके बदले उत्तराखंड के हिस्से में तबाही आ रही है। खटीमा में हुई तबाही इसका ताजा उदाहरण है। राज्य के नेताओं और उत्तराखंड सरकार के नकारापन की वजह से राज्य बनने के चौदह साल बाद भी सिंचाई विभाग की ये परिसंपत्तियां राज्य को नहीं मिल पाई हैं।
अब कई परिसंपत्तियों का विवाद सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। लोहियाहेड जल विद्युत परियोजना का स्वामित्व उत्तराखंड सरकार के अधीन है। मगर हमें अपने ही राज्य में जल विद्युत परियोजना को चलाने के लिए यूपी के मुंह ताकना पड़ता है।
बताते हैं कि यूपी पहले अपनी सिंचाई की जरूरत को पूरा करता है, इसके बाद ही विद्युत परियोजना को पानी मिलता है। पानी बंद करना और छोड़ना भी आसान नहीं है। इसके लिए बनबसा सिंचाई विभाग के कर्मचारियों को इजाजत बरेली खंड के अफसरों से लेनी पड़ती है।
विधायक पुष्कर सिंह धामी का कहना है कि नहर ओवरफ्लो दो बजे हुई थी। इसके बाद साढ़े तीन बजे तक बनबसा सिंचाई विभाग को फोन कर बताया जाता रहा लेकिन समय पर पानी बंद नहीं किया गया। पूर्व विधायक गोपाल सिंह राणा ने इस हादसे के लिए पावर हाउस और बनबसा सिंचाई विभाग के कर्मचारियों को जिम्मेदार बताया।
परिसंपत्तियों के मामले को विधान सभा में कई बार उठाया है। लोहियाहेड विद्युत परियोजना में आने वाले पानी पर नियंत्रण उत्तराखंड सरकार का होना चाहिए। यह मामला छह नहरों का है। इन नदियों का उद्गम उत्तराखंड में होने के बाद भी कब्जा यूपी का है।
- विधायक खटीमा, पुष्कर सिंह धामी