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नहीं दिखेगा रसीला सेब और पहाड़ी आलू
सूरत सिंह रावत
Updated Sat, 29 Jun 2013 08:57 AM IST
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गंगोत्री हाईवे के कई बड़े हिस्से तहस-नहस होने से इस बार मैदानी मंडियों में न हर्षिल के रसीले सेब की खुशबू महकेगी और न ही कहीं पहाड़ी आलू नजर आएगा।
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उत्तराखंड आपदा की विशेष कवरेज
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तीर्थाटन के साथ ही सेब और आलू पर टिकी आजीविका वाले उपला टकनौर क्षेत्र को जोड़ने वाला हाईवे सितंबर तक यातायात लायक तैयार होने के आसार नहीं हैं।
अपर भागीरथी घाटी के सुक्की से लेकर हर्षिल, मुखबा, धराली आदि गांवों में आजीविका का आधार सेब, आलू और राजमा है। आलू तथा सेब को खेत-बागीचों से सीधे मंडियों तक पहुंचना होता है। उत्तरकाशी से धराली तक 75 किमी हाईवे के हिस्से में छह किमी सड़क भागीरथी में समा चुकी है।
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फंसी हैं बीआरो मशीनें
बीआरओ की मशीनें नेलांग की ओर फंसी हैं। उनके अधिकारी संसाधनों का अभाव बताकर हाईवे के इस हिस्से में यातायात बहाली को लेकर कोई सही जानकारी नहीं दे पा रहे हैं। वहां से पैदल चलकर आ रहे स्थानीय लोगों का कहना है कि अभी बरसात का सीजन शुरू हो रहा है।
ऐसे में सेब तथा आलू की फसल के सीजन तक सड़क तैयार होना मुश्किल है। ज्ञातव्य है कि हर्षिल क्षेत्र में 365 हेक्टेयर क्षेत्र में 5 हजार मीट्रिक टन सेब की पैदावार होती है। आलू भी यहां 3 हजार मीट्रिक टन से ज्यादा पैदा होता है।
सेब के बगीचे और राजमा की खेती तबाह
किन्नौर के तरह हर्षिल के सेब की भी अपनी खुशबू और मिठास है। पर आपदा ने यहां के बगीचों को उजाड़ कर रख दिया है। हर्षिल घाटी के सेब ही नही यहां की राजमा भी लोगों की रसोई को महकाती है, मगर अब लोगों का मन बचे खेतों की ओर जाने के लिये नहीं है। अब बाजारों में न हर्षिल के सेबों के लिए आवाज लगेगी न कहीं राजमा नजर आएगी।
हर्षिल घाटी में सेब अपनी तैयारी में थे। बगीचों में छोटे-छोटे हरे सेब नजर आने लगे थे। कुछ ही समय बाद इन्हें बाजार और मंडियों में पहुंचना था। लेकिन अब यह फसल चौपट हो गई है। अब ये सेब अपनी पूरी बहार में नहीं होंगे, पेड़ों से तोड़ने के लायक भी नहीं है। हर्षिल-धराली के इस पूरे क्षेत्र में विल्सन के लगाये पौधों के बाद यहां सेबों के पेड़ लहला उठे।
राजमा के लिए जाना जाता है
देखते ही देखते हर्षिल-धराली अपने मीठे सेबों और स्वादिष्ट राजमा के लिये जाना गया। प्राकृतिक सौंदर्य, शीतल हवा और सेब के बागानों की खुशबू इस क्षेत्र को मनोरम बनाते थे। सेबों की बेहतरीन प्रजातियों में डेलिसियस, गोल्डन, रायल, डेनियल सेब की प्रजाति यहां के बागानों में नजर आती थी।
यहां के सेब दिल्ली, बंगलुरू, सहारनपुर के बाजारों में पहुंचते हैं। यहां के सेब को काफी उन्नत किस्म का माना गया है लेकिन अब इसकी खेती को फिर से जमाने के लिये काफी जद्दोजहद करनी होगी। सेब बागबान कुशाल सिंह पंवार कहते है कि एक सेब का पेड़ फल देने में 20 से 25 वर्ष का समय लगाता है। जितने पेड़ नष्ट हुए हैं, उनकी जल्दी भरपाई करना संभव नहीं। सेब इस क्षेत्र की आर्थिकी को सुदृढ़ करते रहे हैं।
नजर नहीं आएगा सेब
अब आपदा ने यहां के सेब बागवान को तोड़ कर रख दिया है। अब फिलहाल यह सेब नजर नहीं आएगा। अक्टूबर माह तक 20 से 25 किमी के हर्षिल-धराली क्षेत्र में सेब की फसल तैयार हो जानी थी। देशभर के यात्री अपनी जरूरत के हिसाब से इसे खरीदते थे।
हर्षिल घाटी के सेबों की महक की तरह यहां की सफेद राजमा के स्वाद का भी जवाब नहीं। इन दिनों खेतों में राजमा की बुआई करते हुए लोग नजर आते थे और अक्टूबर तक राजमा की फसल लहला उठती थी। रसोई में जायके को बढ़ाने के लिए हर्षिल की सफेद राजमा की तलाश की जाती है।
महाविपदा ने खेतों को किसी लायक नहीं छोड़ा और किसानों का मनोबल भी तोड़ कर रख दिया। इससे अब बाजारों में यहां की राजमा नहीं दिखेगी, बस उसके स्वाद का एहसास लोगों के दिलोदिमाग पर रहेगा।
उपला टकनौर के आठ गांवों में ज्यादातर लोगों की रोजी-रोटी सेब तथा आलू पर ही टिकी है। सड़कें ठीक नहीं हुई तो उन्हें कीमत देकर भी राशन नहीं मिलेगा और उनकी फसल मंडियों तक न पहुंचने से पैसे भी नहीं आएंगे। इस दोहरी मार से बचाने के लिए युद्धस्तर पर सड़क खोलने का काम कहीं नजर नहीं आ रहा है।
- डा.नागेंद्र सिंह हर्षिल, मोहन सिंह सुक्की, रमेश सेमवाल मुखबा