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उत्तराखंड ने सेना को दिए 50 युवा अधिकारी

Sat, 08 Jun 2013 05:52 PM IST
देहरादून/ ब्यूरो
देहरादून/ ब्यूरो Updated Sat, 08 Jun 2013 05:52 PM IST
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indian army gets 50 officer from uttarakhand

भारतीय सेना में सेवाएं देना उत्तराखंड की पंरपरा है जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है। जनसंख्या के लिहाज से भले ही उत्तराखंड छोटे राज्यों में शुमार है, लेकिन सेना को यंग आफिसर्स प्रदान करने में यहां के युवा कई बड़े राज्यों को कई बरसों से पछाड़ते रहे हैं। बीते पांच वर्ष में 551 युवा भारतीय सैन्य अकादमी से पास आउट होकर सेना में सेवाएं दे रहे हैं।

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युवाओं की सेना में शामिल होने की दृढ़ इच्छाशक्ति का नतीजा है कि इस बरस 132 वें कोर्स की पासिंग आउट परेड में एक बार फिर जांबाजों अधिकारियों की फौज में उत्तराखंड के युवाओं ने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई है। खास बात यह है कि प्रदेश के दुर्गम इलाकों में भी एक बार फिर विरासत में मिली जांबाजी सामने आई।
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परंपरा को बढ़ा रहे आगेPOP celebration

टिहरी के सारजुला पट्टी के सगवान गांव निवासी जितेंद्र सिंह नेगी का बेटा जीसी अभय प्रताप सिंह नेगी भी पीओपी में पासआउट होकर सेना का हिस्सा बना। जीसी अभय प्रताप ने बताया कि उनके दादा आजाद हिंद फौज में रहे थे। वह हमेशा चाहते थे कि उनका एक और बेटा देश की सेवा के लिए सेना में आए। उनके मामा सुरेंद्र सिंह परमार भी एयर फोर्स से रिटायर्ड हैं।


श्रीनगर के डांग गांव निवासी दिगंबर सिंह रावत का बेटा जीसी दिग्विजय सिंह रावत भी पास आउट हुआ। दिग्विजय के दादा आलम सिंह रावत भी नेवी में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। टिहरी के सूजड़ गांव निवासी रिटायर्ड हवलदार रमेश चंद रांगड का बेटा जीसी रितेश रांगड भी इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सेना में अधिकारी बना है।

सेना का हिस्सा बने
पौड़ी के गुमखाल के तिलसा गांव निवासी पूर्व सूबेदार मेजर बलवंत सिंह रावत का बेटा जीसी राजेश रावत भी पिता की नक्शेकदम पर चलते हुए पीओपी से पासआउट होकर देश की सेना का हिस्सा बना। प्रदेश के पासआउट होने वाले तमाम ऐसे कैडेट्स थे, जिन्होंने अपने परिवार की जोश, जज्बे और समर्पण की इस परंपरा का बखूबी निर्वहन किया।

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