दुनिया भर में इस वक्त महेंद्र सिंह धोनी की संन्यास की खबरें छाई हुई हैं। क्रिकेट जगत दो धड़ों में बंट चुका है। एक तरफ वे लोग हैं, जो मानते हैं कि अब माही का वक्त गुजर चुका है तो कुछ ऐसे भी लोग हैं जो संन्यास जैसे फैसलों को व्यक्तिगत मानते है। जिस वक्त एबीपी न्यूज में यह बहस चल रही थी, उसी दौरान वीरेंद्र सहवाग का दर्द भी छलका पड़ा, जब उन्हें टीम से बाहर कर दिया गया था और उसके बाद वे कभी क्रिकेट के मैदान में वापसी तक नहीं कर पाए।
मजबूरी में लेना पड़ा था सहवाग को संन्यास, छह साल बाद दुनिया के सामने छलका दर्द
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पूर्व भारतीय सलामी बल्लेबाज ने कहा कि चयनकर्ताओं का दायित्व है कि वे धोनी से बात करें और उसे सूचित करें कि भविष्य में वह भारत के विकेटकीपर बल्लेबाज नहीं होंगे। काश चयनकर्ताओं ने मुझसे भी मेरी योजना के बारे में पूछा होता। सहवाग ने पैनल के सदस्य संदीप पाटिल को निशाना बनाते हुए यह बात कही।
पाटिल उस समय मुख्य चयनकर्ता थे जब सहवाग को 2013 में टीम से बाहर किया गया था और इसके बाद से वह वापसी नहीं कर पाए। पाटिल ने फिर राष्ट्रीय टेलीविजन पर सहवाग से माफी मांगी।
पाटिल ने वहां कहा, 'सचिन (तेंदुलकर) से भविष्य के बारे में बात करने की जिम्मेदारी मुझे और राजिंदर सिंह हंस को दी गई थी जबकि यही जिम्मेदारी सहवाग के लिए विकी (विक्रम राठौड़) को सौंपी गई थी। हमने उससे पूछा तो उसने कहा कि उसने सहवाग से बात कर ली है, लेकिन अगर सहवाग कह रहा है कि विक्रम ने उससे बात नहीं की थी, तो मैं इसकी जिम्मेदारी लेना चाहूंगा।'
सहवाग ने पाटिल को याद दिलाया कि टीम की घोषणा के बाद खिलाड़ियों से बात करने का कोई मतलब नहीं है। उन्होंने कहा, 'विक्रम ने मुझसे तब बात की जब मुझे बाहर कर दिया गया था। अगर वह मुझसे टीम की घोषणा से पहले बात करते तो यह औचित्यपूर्ण होता। एक बार क्रिकेटर को बाहर किए जाने के बाद उससे बात करने का कोई मतलब नहीं है।
सहवाग आगे बोले कि, 'अगर एमएसके प्रसाद धोनी से तब बात करें जब उन्हें टीम से बाहर कर दिया जाए तो धोनी क्या कहेगा कि वह प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेलेगा और अगर वह रन जुटाता है तो चयनकर्ताओं को उसे तब चुनना चाहिए। बात यह है कि चयनकर्ताओं को बाहर किए जाने से पहले क्रिकेटरों से बात करनी चाहिए।'