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हमेशा जवां रहेंगे सचिन के किस्से
सत्येन्द्र पाल सिंह/अमर उजाला, दिल्ली
Updated Thu, 14 Nov 2013 09:16 PM IST
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क्रिकेट, क्रिकेट और सिर्फ क्रिकेट। हर क्षण क्रिकेट में जीना। केवल क्रिकेट की बाबत सोचना। बालपन से ही क्रिकेट का ऐसा जुनून की बड़े से बड़ा धुरंधर दांतों तले उंगली चबा ले।
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स्कूल क्रिकेट से ही ऐसा जलवा की क्रिकेट के माहिरों की जुबां से बरबस यही निकला: नायाब, विलक्षण, अदभुत। क्रिकेट की इस नायाब शख्िसयत का नाम है सचिन तेंदुलकर।
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16 बरस की उम्र में पाकिस्तान के खिलाफ 1989 में टेस्ट क्रिकेट का सफर शुरू किया। सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट में इतनी बुलंदियां चूमीं कि बुलंदियों का पर्याय बन गए।
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अपनी 24 बरस लंबी क्रिकेट यात्रा में मानों शिखर चूमना उनकी आदत में ही शुमार हो गया है। क्रिकेट के मैदान पर हर कोई उनकी हर अदा पर फिदा।
एक पूरी पीढ़ी सचिन को रोल मॉडल मान कर जवां हो गई। सचिन अब 14 नवंबर से अपने घर में वेस्ट इंडीज के खिलाफ सीरीज के दूसरे और आखिरी टेस्ट के साथ अपना बल्ला टांग देंगे। यह उनके करियर का 200 वां और आखिरी टेस्ट होगा।
क्रिकेट का महानायक क्रिकेट के हर फॉर्मेट को अलविदा कह देगा। इसके साथ ही थम जाएगी क्रिकेट मैदान पर बल्ले से नित रिकॉर्डो का नया फलसफा जोडऩे वाले सचिन की क्रिकेट यात्रा। लेकिन हमेशा जवां रहेंगे सचिन की कामयाबी के किस्से।
सचिन, सौरभ और द्रविड़ जैसे क्रिकेटरों के उदय से पहले भारतीय क्रिकेट टीम विदेश की धरती पर पहले कभी टेस्ट मैदान पर 400 रन बनाने की कल्पना नहीं तक नहीं करती है। सचिन की अगुवाई में सौरभ गांगुली, राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्ष्मण के रूप में फैब फोर के नाम से प्रख्यात चौगडडों ने भारतीय क्रिकेट की तस्वीर और तकदीर, दोनों ही बदल ली।
भारत को विदेशी धरती पर खासतौर पर पिछले एक दशक में टेस्ट में जो कामयाबियां मिली हैं उसका श्रेय फैब फोर की ही जाता है।
सौरभ, लक्ष्मण, द्रविड़ जैसे फैब फोर के तीन धुरंधर पहले ही अपना बल्ला टांग चुके हैं। मुंबई टेस्ट में सचिन की क्रिकेट के हर फॉर्मेट को अलविदा कह देंगे। इसके साथ ही 'फैब फोर' की भारतीय क्रिकेट की यात्रा पूरी हो जाएगी।
सचिन की मौजूदगी में भारतीय बल्लेबाजों ने दुनिया के तूफानी गेंदबाजों की तूफानी बॉलिंग से निबटने का शउर सीखा।
शॉर्ट पिच गेंदबाजी पर पलट कर प्रहार करने का भारतीय बल्लेबाजों में भरोसा सचिन ने ही भरा। अपर कट जैसे शॉट दरअसल भारतीय बल्लेबाजों की ही पहचान बन गए।
सचिन खुद यह मानते हैं कि वह खुशकिस्मत रहे कि उनके साथ सौरभ, द्रविड़ और लक्ष्मण जैसे क्रिकेट के हर मैदान पर उनका साथ निभाने वाली त्रिमूर्ति रही।
क्रिकेट में दुनिया के हर मैदान पर अपने बल्ले के कमाल से सचिन ने जितने मुरीद बनाए उतने ब्रैडमैन के बाद शायद ही किसी और क्रिकेटर ने बनाए हों।
ब्रैडमैन जैसा लीजेंड भी उनकी बल्लेबाजी का कायल हो गया। सच तो यह है कि टेस्ट (51) और वन डे (49) सहित इंटरनेशनल क्रिकेट में कुल 100 शतक।
कामयाबी की ऐसी कहानी जिस पर दुनिया के क्रिकेट को रश्क हो सकता है।
क्रिकेट भद्रजनों का खेल कहा जाता है। यदि मॉडर्न क्रिकेट के पैमाने पर इसका आकलन करें तो अब इसमें वाकई भद्रजन कहने के हकदार उंगलियों पर गिने जा सकते हैं।
करीब ढाई दशक के क्रिकेट करियर में खुद हमेशा मैदान पर अंपायर के फैसले पर बिना कोई प्रतिवाद किए सिर नवाए मैदान से जाना सचिन की फितरत रहा है।
अंपायर के फैसले का सम्मान करना आज जहां मॉडर्न क्रिकेटर लगभग भूल गए हैं। ऐसे में हर यंग क्रिकेटर के लिए सचिन का मैदान पर व्यवहार एक नजीर हो सकता है।
सचिन के साथ क्रिकेट में कोई विवाद नहीं जुड़ा है। इसका बड़ा कारण यह है कि उन्होंने क्रिकेट को हमेशा सबसे आगे रखा है। उन्होंने खुद को पीछे रखा है।
सचिन की बल्लेबाजी को यदि सुनील गावसकर के धैर्य और विवियन रिचडर्स के आतिशी तेवरों का मिली-जुली शैली माना जाए तो बेहतर होगा।
बतौर भद्रजन क्रिकेटरों में उनके समकालीन में भारत के राहुल द्रविड़ और ब्रायन लारा ही उनके करीब नजर आते हैं। रिकी पॉन्टिंग और इंजमाम उल हक उनके समकालीन रहे। हकीकत यह है कि ये दोनों मैदान पर प्रदर्शन तो छोडि़ए उनके कद के करीब कभी नहीं पहुंच सकते।
सचिन मन से हमेशा बच्चे हैं। उनके पास बच्चों के लिए हमेशा वक्त ही वक्त रहा है। वह कितनी देर रात होटल की लॉबी या फिर मैदान से बाहर आ रहे तो अपने यंग फैंस को ऑटोग्राफ खुशी खुशी देते हैं।
ऑटोफग्राफ लेते आए बच्चे से पलट कर सवाल कर उससे ऐसे बात करते हैं मानों किसी दोस्त से बात कर रहे हों।
बच्चा यदि जवाब देता है कि वह क्रिकेट खेलता है तो उससे पलट कर पूछ लेते हैं भई क्रिकेट ही क्यों, फुटबॉल क्यों नहीं। वह चैरिटी में पीछे नहीं रहते हैं।
यदि अस्पताल में कोई बीमार बच्चा या कोई भी ऐसा, जो जिंदगी से संघर्ष कर रहा है वह सचिन से मिलने की इच्छा जताता है तो इसका पता लगने के बाद वह उससे मिल कर दो मिनट हंस बोलने का वक्त निकाल ही लेते हैं।
इससे वह बच्चे या बीमार शख्स को हंसने के कुछ क्षण तो मुहैया करा ही देते हैं। सचिन का एक और मानवीय पक्ष है। इसका पता संभवत: बहुत ही कम लोगों को होगा।
सचिन स्लम के करीब 200 बच्चों की शिक्षा और उनके नाश्ते और खाने का खर्च उठाते हैं। इसका वह जिक्र करना भी गवारा नहीं करते। सचिन के पिता कॉलेज में प्रोफेसर रहे।
मराठी में साहित्यिक क्षेत्र में उनके पिता का खासा नाम रहा। सचिन क्रिकेट के अपने जुनून में ऐसे मग्न रहे कि उनकी पढ़ाई पीछे छूट गई।
सचिन को इसलिए खुद पढ़ाई की अहमियत का अहसास है। सचिन ने अपने बच्चों की पढ़ाई के मामले में खासे सख्त है।
सचिन ने अपने बच्चों- बेटी सारा और बेटे अर्जुन की पढ़ाई को लेकर कोई समझौता नहीं है। सचिन की बिटिया सारा तो पढ़ाई में खासी तेज है। अर्जुन की पढ़ाई को सचिन खेल से ज्यादा तवज्जो देते हैं।
कामयाबी के शिखर पर चढऩे में सचिन जो नहीं कर पाए वह उन्हें अपने बच्चों के माध्यम से उसे पूरा होते देखना चाहते हैं। सचिन ने भी क्रिकेट में उतार से ज्यादा बुलंदियों को चूमा है।
सचिन अब 40 बरस के हो गए हैं। सचिन का क्रिकेट के लिए जुनून आज भी कम नहीं हुआ। सचिन का मन आज भी यही कहता है क्रिकेट जारी रखे।
लेकिन 24 बरस की लंबी क्रिकेट यात्रा पर शरीर सचिन का जवानी के दिनों की तरह साथ नहीं देता दिखता है। बतौर क्रिकेटर सचिन जिंदगी उस पड़ाव पर हैं जब उन्हें यह अहसास हो गया है कि यह वाकई बल्ला टांगने का वक्त है।
भारत की तकदीर कहिए या फिर यहां क्रिकेट पर फिदा इस मुल्क का जुनून की यहां एक मास्टर क्रिकेट को अलविदा कहता है तो दूसरा एथलेटिक्स की तरह उससे बेटन थाम नई क्रिकेट यात्रा की कामयाब यात्रा के लिए तुरंत खड़ा मिलता है।
जब सुनील गावसकर ने क्रिकेट को अलविदा कहा था तब भारतीय क्रिकेट के सामने सबसे बड़ा सवाल था, उनके बाद कौन? तब जवाब मिला था कि सचिन तेंदुलकर।
अब जब सचिन क्रिकेट को अलविदा कह रहे तो उनकी विरासत को आगे बढ़ाने के लिए निश्चित रूप से जो नया सितारा नजर आता है वह विराट कोहली हैं।
सुनील गावसकर, मोहिंदर अमरनाथ, कपिल देव और रवि शास्त्री को सचिन के करीब पहुंचने का माद्दा विराट में नजर आता है। मुंबई टेस्ट के साथ क्रिकेट को अलविदा कहने के साथ फैंस का मैदान पर स-चि-न, स-चि-न का शोर जरूर नहीं दिखाई देगा।
इसके बावजूद हर भारतीय क्रिकेट प्रेमी के दिल में सचिन जैसे लीजेंड के लिए इज्जत हमेशा बनी रहेगी। सचिन को सलाम, क्रिकेट के सबसे भद्रजन को सलाम।