रोजाना पांच सौ गेंद और विपासना बनी मयंक की ढाल, टीम में चयन नहीं होने के बावजूद करते रहे अभ्यास
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बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब मयंक अग्रवाल का बल्ला घरेलू क्रिकेट में एक के बाद एक रनों का अंबार लगा रहा था। बावजूद इसके इंडिया कैप उनसे दूर थी। उन्हें खुद नहीं समझ में आ रहा था कि वह क्या करें। वह हताश थे और यह हताशा निराशा में बदलती जा रही थी। ऐसे में उनके कोच आर मुरलीधर ने उनसे कहा जो उनके बस में है वही करें। उनके हाथ में रन बनाना है और वह इसे जारी रखते हुए मेहनत नहीं छोड़ें। मयंक ने कोच की बात को गांठ में बांध ली और रोजाना नेट पर पांच सौ गेंदों को खेलने का लक्ष्य बना लिया। नेट पर वह बल्ले से मेहनत करते थे और नेट के बाहर निराशा से उबरने के लिए उन्होंने विपासना का सहारा लिया। कोच केमुताबिक इन दोनों ही बातों ने मयंक को डिगने नहीं दिया।
एक समय निराश हो गए थे मयंक
मयंक बंगलूरू स्थित अकादमी में आर मुरलीधर के पास पिछले सात सालों से हैं, लेकिन वह उन्हें 13 साल की उम्र से जानते हैं। मुरली स्पष्ट करते हैं कि अगर वह यह कहें कि मयंक उन दिनों निराश नहीं था तो यह कहना गलत होगा। वह हताश हो रहे थे। लेकिन उन्होंने अपने को टूटने को नहीं दिया। उन्होंने मयंक से यही कहा कि रनों को ज्यादा दिनों तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। उन्होंने उससे अपनी बैटिंग में अच्छाईयां लाने को कहा। वह अब अच्छी तरह जानता है कि बल्लेबाजी की अच्छाईयां क्या हैं। विपासना करने के लिए उन्होंने उसको नहीं बोला। उसने खुद अपने आप यह करना शुरू किया। इसका उसे बहुत फायदा मिला। फिर उसके अंदर यह खूबी है कि वह कभी प्रैक्टिस नहीं छोड़ता है। रोजाना आकर उसे नेट्स पर तेज और स्पिन पांच सौ गेंदे खेलनी ही हैं।
ग्रिप है मयंक का मजबूत पक्ष
मुरली का कहना है कि दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ लगाया गया दोहरा शतक उसके करियर को बदल देगा। यह उसके लिए बड़ा क्षण है। वह इसके इंतजार में भारतीय टीम में शामिल होने के बाद से ही था। मुरली के अनुसार मयंक का सबसे मजबूत पक्ष उसकी बैटिंग ग्रिप और बहुत ज्यादा मेहनत करना है। वह बुरे दिनों से गुजर कर यह भी सीख चुका है कि निराशा और असफलता से कैसे निपटना है।