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सौरव गांगुली के BCCI अध्यक्ष बनने के मायने, क्या धो पाएंगे भारतीय क्रिकेट का कलंक?

Sat, 26 Oct 2019 08:01 AM IST
Anshul Talmale अंशुल तलमले
Updated Sat, 26 Oct 2019 08:01 AM IST
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How Sourav Ganguly become president of BCCI and can he justify his role and responsibility
सौरव गांगुली - फोटो : Amar Ujala

11 जनवरी 1992 को वेस्टइंडीज के खिलाफ अपने पहले मैच में सौरव गांगुली बुरी तरह फेल रहे। टेस्ट में सफल डेब्यू के बावजूद उन्हें वन-डे टीम से बाहर कर दिया गया। चार साल तक टीम में वापसी के लिए जूझते रहे, लेकिन हार नहीं मानी। आखिरकार दोबारा 1996 में उनकी वापसी हुई। उस वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि यह पतला-दुबला सा हल्की मूंछों वाला खिलाड़ी न सिर्फ भारत का सबसे कामयाब कप्तान बनेगा बल्कि दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड बीसीसीआई का मुखिया भी बन जाएगा। 

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अब सबसे बड़ा सवाल कि जिस विवाद के कारण पूरी बीसीसीआई का सफाया सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय के बाद हो गया था क्या सौरव गांगुली उस पर पूर्ण रूप से लगाम लगा पाएंगे। यानि बीसीसीआई के अपने ही टूर्नामेंट आईपीएल में कथित सट्टेबाजी और क्या बीसीसीआई आईसीसी से मिलने वाला अपना हिस्सा बढ़ा पाएगा और लाख टके का सवाल कि भाई-भतीजावाद से भरी पड़ी बीसीसीआई और राज्य क्रिकेट संघों को कैसे संभालेंगे।
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अब सबसे बड़ा सवाल कि जिस विवाद के कारण पूरी बीसीसीआई का सफाया सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय के बाद हो गया था क्या सौरव गांगुली उस पर पूर्ण रूप से लगाम लगा पाएंगे। यानि बीसीसीआई के अपने ही टूर्नामेंट आईपीएल में कथित सट्टेबाजी और क्या बीसीसीआई आईसीसी से मिलने वाला अपना हिस्सा बढ़ा पाएगा और लाख टके का सवाल कि भाई-भतीजावाद से भरी पड़ी बीसीसीआई और राज्य क्रिकेट संघों को कैसे संभालेंगे? 
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सौरव के पास सिर्फ 10 माह का समय था। तकनीकी रूप से उसके बाद उनका कार्यकाल समाप्त हो जाएगा। विशेषज्ञों की माने तो सौरव गांगुली से किसी ने इस पर बात नहीं की, यही वह कारण है जिसके चलते वह आज बीसीसीआई के अध्यक्ष पद तक पहुचेंगे।

धो पाएंगे भ्रष्टाचार के दाग?

अगर भ्रष्टाचार का मामला सामने नहीं आता तो शायद ऐसा नही होता। अब आईपीएल के नए गर्वनर होंगे पूर्व क्रिकेटर ब्रजेश पटेल। गांगुली को उनके साथ मिलकर इसे साफ सुथरा बनाने की नीति बनानी चाहिए। अभी कुछ दिन पहले ही तमिलनाडु प्रीमियर लीग और कर्नाटक प्रीमियर लीग में भ्रष्टाचार के मामले सामने आए। 100 प्रतिशत तो कहीं भी सही नहीं होता लेकिन कुछ तो करना होगा।

सौरव गांगुली की टीम में परिवारवाद जमकर हावी है। बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष अनुराग ठाकुर के भाई कोषाध्यक्ष हैं। देश के गृह मंत्री अमित शाह के सुपुत्र जय शाह सचिव हैं। इनके बीच सौरव गांगुली कैसे काम कर सकेंगे।

ऐसे में यह सवाल भी उठा कि क्या आने वाले समय में वह बंगाल में बीजेपी का चेहरा होंगे, हालांकि गांगुली ने इससे इनकार किया। भारत में और खासकर क्रिकेट में राजनीति अपना रोल इतना अदा करती है कि तो यह कहना इसमें कोई एंगल नहीं है कहना मुश्किल है, लेकिन अगर क्रिकेट पर ध्यान दे तो सौरव गांगुली के पास केवल दस महीने है और वह किस तेजी से अपने निर्णय लेते है वह देखना होगा।

समय कम, काम ज्यादा

अब अगर क्रिकेट से जुडे राज्य संघों की बात हो तो उसमें अधिकतर पूर्व पदाधिकारियों के रिश्तेदारों का अधिपत्य है। पूर्व अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन के बेटी के नाम तक शामिल है। एक्सपर्ट का मानना है कि सौरव गांगुली खुद कप्तान रह चुके हैं, वह इनसे निपटना खूब जानते हैं।

सबसे बड़ी बात बीसीसीआई को भ्रष्टाचार मुक्त बनाना। इसे लेकर अयाज मेमन मानते हैं कि पिछले कुछ सालों में बीसीसीआई पर बहुत दाग लगे हैं और उसे नई टीम के लिए भी आसान नही होगा, लेकिन अगर सौरव गांगुली जैसा इंसान बीसीसीआई का अध्यक्ष बनाता है तो सबकी उम्मीदें उनसे होंगी ही। वह न सिर्फ खिलाड़ी और कप्तान रहे हैं।

वह भले ही जगमोहन डालमिया जैसे व्यवसायी या चार्टर अकाउंटेंट ना हों लेकिन व्यवसाय और वित्त को अच्छी तरह समझते है। अच्छी बात यह है कि पहली बार कोई नामचीन क्रिकेटर बीसीसीआई का अध्यक्ष बनेगा, और लोढ़ा समिति भी यही चाहती थी कि क्रिकेटरों का बोलबाला बीसीसीआई में हो।

तो कुल मिलाकर कई चुनौतियां सौरव गांगुली के सामने है। सबको साथ लेकर चलना और वह भी केवल 10 महिनों के लिए यह उनके लिए समय के खिलाफ रेस की तरह है। अपने साथियों में दादा के नाम से मशहूर सौरव गांगुली क्रिकेट की नई पिच पर कितनी दादागीरी दिखा पाते है समय बताएगा।

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