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फुटबॉल ने बदली कश्मीर में युवाओं की तकदीर, 'रियल कश्मीर' से जुड़े सुहैल कभी करते थे मजदूरी
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला
Updated Sun, 03 Jun 2018 08:21 PM IST
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suhail ahmad
रियल कश्मीर क्लब के लिए फुटबॉल सिर्फ शौक या आमदनी का जरिया ही नहीं बल्कि एक जूनुन बन गया है जिसने घाटी के युवाओं को नई और उजली राह दिखाई है। रोजगार की दिक्कतें और आर्थिक तंगहाली की चुनौती भी इस खूबसूरत खेल से उनके जुड़ाव में बाधा नहीं बनी। कुछ वर्षों पहले बने क्लब ने आईलीग के लिए क्वालिफाई करके नया मुकाम हासिल कर लिया।
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एक दिहाड़ी मजदूर या एक निजी टेलीफोन कंपनी का कर्मचारी या छोटे-मोटे रोजगार से जुड़े युवाओं की पहचान अब एक फुटबॉलर की बन गई है। अलग-अलग पेशे से जुड़े लोगों को एक खेल ने आपस में जोड़ दिया। खेल उनके लिए एक मिशन बन गया। बाइस साल के डिफेंडर सुहैल अहमद बट का कहना है, 'कश्मीर में एक स्थायी रोजगार ढूंढना बड़ा मुश्किल है। मैं ड्राई फ्रूट की एक फैक्टरी में सुबह 7 से नौ बजे तक दो घंटे मजदूरी करता था फिर फुटबॉल की ट्रेनिंग करता था।'
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'उसके बाद दस बजे से शाम छह बजे तक एक अन्य फैक्टरी में पैकिंग और पार्सल बनाने का काम करता था। बट के अलावा अमीर रहमान (डिफेंडर), दानिश फारुक (मिडफील्डर) और मुहम्मद हमाद (डिफेंडर) सभी बीस की उम्र के आसपास के हैं और श्रीनगर में रहते हैं। उनके लिए फुटबॉल के शौक को परवान चढ़ाना आसान न था लेकिन अब अपने जैसे सैकड़ों युवाओं को प्रेरित कर रहे हैं।'
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आमदनी का नया जरिया बन गया खेल
real kashmir football club
बट के पिता शूगर के मरीज हैं, मां घर में कामकाज देखती हैं। बट को फुटबॉल के अलावा घर-परिवार की जिम्मेवारियों को भी देखना होता है। पूरे दिन कड़ी मेहनत करने के बाद वह रोजाना बमुश्किल तीन सौ रुपये कमा पाता है। बकौल बट इन हालात में आदमी को पत्थर बनना पड़ता है। मुझे लगता है कि एक दिन में आईलीग और आईएसएल के क्लब में खेलकर ज्यादा पैसा कमाने लगूंगा। अभी मुझे जो रियल कश्मीर क्लब से मिल रहा है वह भी अच्छी रकम है और मैं अपने परिवार की पहले से बेहतर देखभाल कर पा रहा हूं।
'अब हमने आईलीग के लिए क्वालिफाई कर लिया है। मुझे नहीं लगता कि मुझे फिर से दिहाड़ी मजदूरी करनी पड़ेगी अब फुटबॉल ही मेरा भविष्य है। तेइस साल के अमीर रहमान एक मोबाइल कंपनी के लिए काम करते हैं। पिता घर पर एम्ब्राडरी का काम करते हैं जिससे घर का खर्च नहीं निकलता। दो साल पहले संतोष ट्रॉफी खेलने वाले अमीर के लिए अब फुटबॉल भी आमदनी का जरिया हो गया है।'
'अब हमने आईलीग के लिए क्वालिफाई कर लिया है। मुझे नहीं लगता कि मुझे फिर से दिहाड़ी मजदूरी करनी पड़ेगी अब फुटबॉल ही मेरा भविष्य है। तेइस साल के अमीर रहमान एक मोबाइल कंपनी के लिए काम करते हैं। पिता घर पर एम्ब्राडरी का काम करते हैं जिससे घर का खर्च नहीं निकलता। दो साल पहले संतोष ट्रॉफी खेलने वाले अमीर के लिए अब फुटबॉल भी आमदनी का जरिया हो गया है।'
घाटी में हो आईलीग के मैच
real kashmir football club
बीए फाइनल में पढ़ने वाले दानिश फारुक के तो खून में फुटबॉल है। उसके पिता कोलकाता में मोहम्मडन स्पोर्टिंग के लिए खेल चुके हैं। पिता ही फुटबॉल के मैदान तक खींचकर ले गए। जेएंडके बैंक की अकादमी से खेला कप्तान बना। फिर रियल कश्मीर से जुड़ गया। हम्माद ने कभी क्रिकेटर बनने की सोची थी लेकिन बाद में फुटबॉल जुनून बन गया। उन्हें भारत के पूर्व फुटबॉलर अब्दुल मजीद ने अपने क्लब में ट्रेनिंग दी।
फिर लोनस्टार कश्मीर से जुड़ गया और अब रियल कश्मीर में हूं। वह कहते हैं घाटी में हिंसा से उनकी ट्रेनिंग भी काफी प्रभावित हुई लेकिन अपने खेल से अपने प्यार को प्रभावित नहीं होने दिया। उनका कहना है कि अगर सरकार ढांचागत सुविधाएं बढ़ाए और आईलीग के मैच कश्मीर में होने लगे तो बड़ा सकारात्मक असर होगा। हमें इस अवसर को नहीं गंवाना चाहिए।
फिर लोनस्टार कश्मीर से जुड़ गया और अब रियल कश्मीर में हूं। वह कहते हैं घाटी में हिंसा से उनकी ट्रेनिंग भी काफी प्रभावित हुई लेकिन अपने खेल से अपने प्यार को प्रभावित नहीं होने दिया। उनका कहना है कि अगर सरकार ढांचागत सुविधाएं बढ़ाए और आईलीग के मैच कश्मीर में होने लगे तो बड़ा सकारात्मक असर होगा। हमें इस अवसर को नहीं गंवाना चाहिए।