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Sushil Doshi Interview: 13 साल की उम्र में बिना टिकट पहला मैच देखा; जानें सुशील कैसे बने क्रिकेट की आवाज
Wed, 16 Aug 2023 10:35 AM IST
शक्तिराज सिंह
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शक्तिराज सिंह
Updated Wed, 16 Aug 2023 10:35 AM IST
सार
क्रिकेट जगत या इससे जुड़ी चीजों में अपना करियर बनाने वाले अधिकतर लोगों ने बहुत कुछ हासिल किया है, लेकिन चुनिंदा लोग ही ऐसे रहे हैं, जिनकी वजह से क्रिकेट को कुछ हासिल हुआ हो। सुशील दोशी इनमें से एक हैं। उन्होंने भारत की अपनी भाषा हिंदी में कमेंट्री कर इस खेल को गांव-गांव के लोगों के बीच पहुंचाया और क्रिकेट लोकप्रियता बढ़ाने में अहम योगदान दिया।
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सुशील दोशी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भारत मे क्रिकेट एक धर्म की तरह है। अगर किसी खेल को इस देश में सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है तो वह यही है। खिलाड़ियों के करोड़ों फैंस तो हैं ही, साथ ही खेल के बारे में बताने वाले एक्सपर्ट और मैच में लाइव कमेंट्री करने वाले कमेंटेटर्स के भी प्रशंसक बड़ी संख्या में हैं। उन्हीं में से एक कमेंटेटर सुशील दोशी हैं। जब भारत में हर घर में टीवी नहीं था तो लोग रेडियो पर ही क्रिकेट मैच सुना करते थे। उस दौर में सुशील दोशी देश में क्रिकेट की आवाज कहे जाते थे, क्योंकि उनकी आवाज के जरिए ही हर क्रिकेट फैन को मैच की लाइव कमेंट्री सुनने को मिलती थी। क्रिकेट जगत या इससे जुड़ी चीजों में अपना करियर बनाने वाले अधिकतर लोगों ने बहुत कुछ हासिल किया है, लेकिन चुनिंदा लोग ही ऐसे रहे हैं, जिनकी वजह से क्रिकेट को कुछ हासिल हुआ हो। सुशील दोशी इनमें से एक हैं। उन्होंने भारत की अपनी भाषा हिंदी में कमेंट्री कर इस खेल को गांव-गांव के लोगों के बीच पहुंचाया और क्रिकेट लोकप्रियता बढ़ाने में अहम योगदान दिया। अब टीवी और स्मार्टफोन के दौर में रेडियो में कमेंट्री शायद ही कोई सुनता हो, लेकिन क्रिकेट के पुराने फैंस आज भी सुशील दोशी की आवाज में कमेंट्री सुनना पसंद करते हैं। हिंदी कमेंट्री के दिग्गज सुशील दोशी के साथ अमर उजाला ने बातचीत की। पढ़िए इस बातचीत के कुछ खास हिस्से...
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सवालः आपसे बात करके बचपन की याद आती है। जब हम सुनते थे कि नमस्कार मैं सुशील दोशी बोल रहा हूँ। भाषा वाली जो तहजीब क्रिकेट की कमेंट्री को सुशील जी ने दी है वो निश्चित ही ऐसा योगदान है जिसको सदियों याद किया जाएगा।
जवाबः प्रतिस्पर्धा बहुत बड़ी रहती। क्रिकेट कमेंट्री जिसका आपने जिक्र किया, ये भी एक कड़ी प्रतिस्पर्धा का माना था। हिंदी में कोई क्रिकेट कमेंट्री सुनना नहीं चाहता था। लोग कहते थे, एफपीएस सिस्टम का खेल है फुट पाउंड सेकेंड और दूसरी बात 22 यार्ड से जो खेल शुरू हो रहा है। 22 गज का खेल कहते थे उस खेल में हिंदी का क्या काम? लोग कहते थे कमेंट्री हो ही नहीं सकती।
जवाबः प्रतिस्पर्धा बहुत बड़ी रहती। क्रिकेट कमेंट्री जिसका आपने जिक्र किया, ये भी एक कड़ी प्रतिस्पर्धा का माना था। हिंदी में कोई क्रिकेट कमेंट्री सुनना नहीं चाहता था। लोग कहते थे, एफपीएस सिस्टम का खेल है फुट पाउंड सेकेंड और दूसरी बात 22 यार्ड से जो खेल शुरू हो रहा है। 22 गज का खेल कहते थे उस खेल में हिंदी का क्या काम? लोग कहते थे कमेंट्री हो ही नहीं सकती।
सवालः सुशील जी कैसे आपको पहला ख्याल आया? क्रिकेट के प्रति लगाव कैसे हुआ, बचपन कैसे बीता?
जवाबः मैं तो मध्यम वर्गीय परिवार से हूं। हुकमचंद मार्ग तिवारिया बाजार में 15 रुपये महीने के मकान में किराये पर रहते थे। हालात बहुत मुश्किल थे, हम चार भाई हैं। माता-पिता ने बड़ी मुश्किल से मेहनत करके चारों को इंजीनियर बनाया। मैं भी इंजीनियर हूं, शक्ल से लगता नहीं कितना पढ़ा-लिखा हूं, लेकिन मैं इंजीनियर हूं। उन्होंने हर एक व्यक्ति का शौक पूरा किया। उनको मालूम था कि मैं अपने भाइयों के मुकाबले पढ़ाई में कमजोर हूं। क्रिकेट में मेरा शौक था तो क्रिकेट में मुझे आगे बढ़ाया। खेल-कूद रुचि थी, लेकिन कोई उधर आपको भेजना नहीं चाहता था। सबको लगता था कि बिगड़ जाएंगे। सब माता-पिता से कहते कि लड़का बिगड़ गया है। कोई काम नहीं मिलेगा।
मैं बचपन में खिलाड़ियों के फोटो काटकर इकट्ठे किया करता था। हम फोटो अपने एल्बम में चिपकाते। तब फोटो आते नहीं थे। बड़ी मुश्किल से लाइब्रेरी में जाते थे, ब्लेड छुपाकर ले जाते थे और ब्लेड से काट लेते थे। मुझे याद है कि एक बार लाइब्रेरी में फोटो काटते हुए पकड़े गए, मैं और मेरा दोस्त। मेरे दोस्त को दो चपत लगाई। दोस्त ने कहा कि घरवालों से मत कहना कि ऐसा हुआ है, नहीं तो वह मुझे तुम्हारे साथ घुमने से मात कर देंगे। फिर हम ये काम नहीं कर पाएंगे। पद्मश्री जैसी उपाधि मुझे मिली है। इसमें माता-पिता और मेरे दोस्तों का भी हक है, जिन्होंने उस समय मेरी मदद की थी।
जवाबः मैं तो मध्यम वर्गीय परिवार से हूं। हुकमचंद मार्ग तिवारिया बाजार में 15 रुपये महीने के मकान में किराये पर रहते थे। हालात बहुत मुश्किल थे, हम चार भाई हैं। माता-पिता ने बड़ी मुश्किल से मेहनत करके चारों को इंजीनियर बनाया। मैं भी इंजीनियर हूं, शक्ल से लगता नहीं कितना पढ़ा-लिखा हूं, लेकिन मैं इंजीनियर हूं। उन्होंने हर एक व्यक्ति का शौक पूरा किया। उनको मालूम था कि मैं अपने भाइयों के मुकाबले पढ़ाई में कमजोर हूं। क्रिकेट में मेरा शौक था तो क्रिकेट में मुझे आगे बढ़ाया। खेल-कूद रुचि थी, लेकिन कोई उधर आपको भेजना नहीं चाहता था। सबको लगता था कि बिगड़ जाएंगे। सब माता-पिता से कहते कि लड़का बिगड़ गया है। कोई काम नहीं मिलेगा।
मैं बचपन में खिलाड़ियों के फोटो काटकर इकट्ठे किया करता था। हम फोटो अपने एल्बम में चिपकाते। तब फोटो आते नहीं थे। बड़ी मुश्किल से लाइब्रेरी में जाते थे, ब्लेड छुपाकर ले जाते थे और ब्लेड से काट लेते थे। मुझे याद है कि एक बार लाइब्रेरी में फोटो काटते हुए पकड़े गए, मैं और मेरा दोस्त। मेरे दोस्त को दो चपत लगाई। दोस्त ने कहा कि घरवालों से मत कहना कि ऐसा हुआ है, नहीं तो वह मुझे तुम्हारे साथ घुमने से मात कर देंगे। फिर हम ये काम नहीं कर पाएंगे। पद्मश्री जैसी उपाधि मुझे मिली है। इसमें माता-पिता और मेरे दोस्तों का भी हक है, जिन्होंने उस समय मेरी मदद की थी।
सवालः कमेंट्री वाला सिलसिला कैसे शुरू हुआ?
जवाबः बचपन से ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के जो कमेंटेटर सुनते थे, उनकी कंमेंट्री सुनता था और उनकी नकल करता था अंग्रेजी में उन्हीं की शैली में। ब्रायन जॉन्सटन जॉन ऑरट। जैसे लोग गाने गाते हैं ना मैं क्रिकेट कमेंट्री कर के मजे लेता था और सब भाई लोग कहते थे, बड़बड़ मत किया कर यार ये क्या और इस तरह चलता रहा? मुझे याद है की रिची बेनो की टीम 1959-60 में भारत आई थी। रिची बेनो के नेतृत्व में जिसमें बड़े-बड़े नील, हार्वे नॉर्मल नील रेल जैसे खिलाड़ी थे, जिनके फोटो में एल्बम में इकट्ठे किया करता था। वो लोग आये थे तो मैंने जिद पकड़ी कि मुझे मुंबई टेस्ट मैच देखना है। मुझे पता नहीं था कि मुंबई टेस्ट मैच देखना कोई आसान था क्या? टिकट तो मिलते नहीं थे, पिताजी को भी मालूम नहीं था, क्रिकेट में दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन बेटे में दिलचस्पी थी। उन्होंने कहा ले चलूंगा, मां ने डाटा भी अरे इसकी हर जिद पूरी करते हों, ये क्या तरीका पैसा कहाँ से आएगा? लेकिन मुझे समझ में नहीं आता क्यों मैं अगर होता उनकी जगह होता तो कभी भी अपने बेटे को नहीं ले जाता, लेकिन वो मुझे बम्बई ले गए।
हम पिता-पुत्र चार-पांच दिन तक ब्रेबोर्न स्टेडियम के चक्कर काटते हैं। ऐसे तो टिकट का इंतजाम ही नहीं हो सका। चौथे दिन एक पुलिसवाले ने हमें देख लिया, उसको दया आ गई। उन्होंने पिताजी से पूछा की भाई साहब क्या कुछ जुगाड़ नहीं हुआ? क्या आप भटक रहे हैं चार दिन से मैं पहचान गया। पिताजी ने कहा देखिये मुझे तो कोई दिलचस्पी नहीं है। ये बेटे का दिल टूट जाएगा। (तब मैं 13 साल का था) और ये घर वापस चला गया ऐसा तो इसका दर्द मुझसे देखा नहीं जाएगा। तो इसको देखना है, मुझे तो नहीं देखना।
पुलिसवाले ने कहा एक काम करता हूं। चाय-पान के बाद जो रेला बाहर आता है ना वो फिर जब वापस अंदर से जाता है तो मैं उसमें आपको घुसा दूंगा। हालांकि, आपको बाहर खड़ा रहना पड़ेगा। पिताजी राजी हो गए। शायद पिता होते ही ऐसे हैं। मैं खुशी से अंदर फुदकता चला गया और मैच देखा। नॉर्मन और नील हार्वे की साझेदारी चल रही थी। बापू नादकर्णी गेंदबाजी कर रहे थे। रिचि बेनॉ, रेल इंडवॉल को देखा। तबियत खुश हो गई। मैंने देखा क्या वातावरण है कि सारा स्टेडियम खचा-खच भरा है, लोग नारे लगा रहे हैं कोई झंडा लहरा रहा है तो देखके लगा कि क्या अद्भुत नजारा है। यह सब पहली बार देखा था। फिर कमेंट्री बॉक्स की तरफ देखा और मैंने देखा कि क्या जगह है ये तो बिल्कुल पिच की सीध में, बिल्कुल बर्ड साइव व्यू, इसमें कितना अच्छा गेंद का स्विंग और सीम और सब दिखाई दे रहा होगा। तो तो मैंने कहा कि कौन कमेंट्री कर रहा है, किसी ने बताया है भाई बॉबी तल्यार का और विजय मर्चेंट का कमेंट्री कर रहे हैं। तो मेरे मन में हुक उठी कि क्या कभी यहां बैठने का मौका मिलेगा। देखिए जंगली सपने काई बार कैसे सच होते हैं। 1972-73 में जब टॉनी लूइस की इंग्लैंड की टीम आई ना, अपनी जिंदगी का पहला टेस्ट मैच मैंने उसी ब्रेबॉन स्टेडियम से और उसी कमेंट्री बॉक्स से किया।
जवाबः बचपन से ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के जो कमेंटेटर सुनते थे, उनकी कंमेंट्री सुनता था और उनकी नकल करता था अंग्रेजी में उन्हीं की शैली में। ब्रायन जॉन्सटन जॉन ऑरट। जैसे लोग गाने गाते हैं ना मैं क्रिकेट कमेंट्री कर के मजे लेता था और सब भाई लोग कहते थे, बड़बड़ मत किया कर यार ये क्या और इस तरह चलता रहा? मुझे याद है की रिची बेनो की टीम 1959-60 में भारत आई थी। रिची बेनो के नेतृत्व में जिसमें बड़े-बड़े नील, हार्वे नॉर्मल नील रेल जैसे खिलाड़ी थे, जिनके फोटो में एल्बम में इकट्ठे किया करता था। वो लोग आये थे तो मैंने जिद पकड़ी कि मुझे मुंबई टेस्ट मैच देखना है। मुझे पता नहीं था कि मुंबई टेस्ट मैच देखना कोई आसान था क्या? टिकट तो मिलते नहीं थे, पिताजी को भी मालूम नहीं था, क्रिकेट में दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन बेटे में दिलचस्पी थी। उन्होंने कहा ले चलूंगा, मां ने डाटा भी अरे इसकी हर जिद पूरी करते हों, ये क्या तरीका पैसा कहाँ से आएगा? लेकिन मुझे समझ में नहीं आता क्यों मैं अगर होता उनकी जगह होता तो कभी भी अपने बेटे को नहीं ले जाता, लेकिन वो मुझे बम्बई ले गए।
हम पिता-पुत्र चार-पांच दिन तक ब्रेबोर्न स्टेडियम के चक्कर काटते हैं। ऐसे तो टिकट का इंतजाम ही नहीं हो सका। चौथे दिन एक पुलिसवाले ने हमें देख लिया, उसको दया आ गई। उन्होंने पिताजी से पूछा की भाई साहब क्या कुछ जुगाड़ नहीं हुआ? क्या आप भटक रहे हैं चार दिन से मैं पहचान गया। पिताजी ने कहा देखिये मुझे तो कोई दिलचस्पी नहीं है। ये बेटे का दिल टूट जाएगा। (तब मैं 13 साल का था) और ये घर वापस चला गया ऐसा तो इसका दर्द मुझसे देखा नहीं जाएगा। तो इसको देखना है, मुझे तो नहीं देखना।
पुलिसवाले ने कहा एक काम करता हूं। चाय-पान के बाद जो रेला बाहर आता है ना वो फिर जब वापस अंदर से जाता है तो मैं उसमें आपको घुसा दूंगा। हालांकि, आपको बाहर खड़ा रहना पड़ेगा। पिताजी राजी हो गए। शायद पिता होते ही ऐसे हैं। मैं खुशी से अंदर फुदकता चला गया और मैच देखा। नॉर्मन और नील हार्वे की साझेदारी चल रही थी। बापू नादकर्णी गेंदबाजी कर रहे थे। रिचि बेनॉ, रेल इंडवॉल को देखा। तबियत खुश हो गई। मैंने देखा क्या वातावरण है कि सारा स्टेडियम खचा-खच भरा है, लोग नारे लगा रहे हैं कोई झंडा लहरा रहा है तो देखके लगा कि क्या अद्भुत नजारा है। यह सब पहली बार देखा था। फिर कमेंट्री बॉक्स की तरफ देखा और मैंने देखा कि क्या जगह है ये तो बिल्कुल पिच की सीध में, बिल्कुल बर्ड साइव व्यू, इसमें कितना अच्छा गेंद का स्विंग और सीम और सब दिखाई दे रहा होगा। तो तो मैंने कहा कि कौन कमेंट्री कर रहा है, किसी ने बताया है भाई बॉबी तल्यार का और विजय मर्चेंट का कमेंट्री कर रहे हैं। तो मेरे मन में हुक उठी कि क्या कभी यहां बैठने का मौका मिलेगा। देखिए जंगली सपने काई बार कैसे सच होते हैं। 1972-73 में जब टॉनी लूइस की इंग्लैंड की टीम आई ना, अपनी जिंदगी का पहला टेस्ट मैच मैंने उसी ब्रेबॉन स्टेडियम से और उसी कमेंट्री बॉक्स से किया।
सवालः वो तेरा साल का बच्चा, जिसकी आंखों में लक्ष्य समा गया था। उस लक्ष्य का फिर आपने दिन-रात पीछा किया और अपने जुनून को पा लिया। कैसे पा लिया?
जवाबः इसमें ऐसा हुआ कि 1968 के वक्त भारत सरकार से एक नोटिस आया कि सभी जगह हिंदी कमेंट्री होनी चाहिए। जरूरी है कि सब आकाशवाणी के केंद्रों में अब रणजी ट्रॉफी कमेंट्री होनी चाहिए। तो उन्होंने ढूंढ़ मचाई कि कोई कर सकता है क्या कमेंट्री?
इंदौर में भी रणजी ट्रॉफी मैच हो रहा था। मध्यपदेश और राजस्थान का। बड़े-बड़े क्रिकेटर्स को पूछा तो उन्होंने कहा पागल हैं? हिंदी भाषा में कोई कमेंट्री हो सकती है? हो ही नहीं सकती, किसी ने कभी सुनी ही नहीं, यह तो अजीब बात है। तब मैं नई दुनिया अखबार में कुछ लेख लिखा करता था, क्रिकेट के बारे में सुना तो मैंने सोचा कि चलो जाकर देखता हूं, मैं चला गया और मैंने कहा मैं कमेंट्री कर सकता हूं, मुझे याद है कि मैं हाफ पैंट और टीशर्ट पहनकर पहनकर चला गया था। गरीबी के दिन थे। जो स्टेशन डायरेक्टर थे, उन्होंने पहले तो मुझे नीचे से उपर तक देखा और कहा कि यार सिम्प्ली गेट आउट, पुट आउन सम ग्रे हेयर्स (चुपचाप बाहर चले जाओ और थोड़ा अनुभव लेकर आओ) उस समय बॉबी तलियार खान, विजेय मर्चेंट, 60 साल के होते थे। क्रिकेट कुछ सीखे होते थे तब वो कॉमेंट्री करते थे तो सबके मन में ही ख्याल था कि बहुत अनुभव चाहिए। उन्होंने मुझे भगा दिया और मैंने भी कोई बेज्जती की बात नहीं समझी। लड़का ही था वापस आ गया, कोई बात नहीं मन में ठेस भी नहीं लगी, वापस आ गए।
फिर शायद कोई मिला नहीं होगा। कमेंट्री का दिन आ गया, तब उनको याद आया कि एक पागल सा लड़का आया था देखते हैं, उसको कोशिश करते हैं कि वो कभी कर ले तो मैं गया। उन्होंने कहा कि आप काल्पिनक कमेंट्री करके दिखाएं। तो मैंने अंग्रेजी में कमेंट्री करके दिखाई। उन्होंने कहा कि आप तो इतनी शानदार कमेंट्री कर रहे हो, लेकिन हमें तो हिंदी में कमेंट्री करना है। तो मैंने कहा सिर्फ कोशिश करता हूं, हिंदी में तो मैंने भी कभी की नहीं, तब मैंने कमेंट्री की। मेरी हिंदी बचपन से अच्छी थी। अधिकतर लोगों की हिंदी अच्छी होती थी। मैंने हिंदी में कमेंट्री करके दिखाई, तो अच्छी तो नहीं की होगी? पर उन्होंने कहा की ये लड़का काम चला लेगा। सरकारी आदेश पूरा हो जाएगा।
वहां मैंने पहली बार हिंदी कमेंट्री की और सच मानिये इतनी आलोचना हुई कि इतनी खराब कमेंट्री कभी जिंदगी में नहीं हुई। किसी ने लिखा कि ये जिंदगी भर कमेंट्री सीखें तो भी कमेंटेटर नहीं बन सकते हैं। बताइए अब देखिये 19 साल का लड़का 18-19 साल का था। मासूम दिल और इतना दिल टूटा और पिताजी भी बहुत दुखी हुए। उन्होंने कहा यार भैया तो मेहनत करो या छोड़ दो। पिताजी ने कहा- नाम बदनाम हो रहा है। या तो कोशिश करो या छोड़ दो। दिल से महसूस करो फिर लोगों के दिलों को छूने की कोशिश करो। ये बात मैंने मूलमंत्र की तरह मान ली। जब बल्लेबाज खेलता है तो मुझे लगता है कि मैं ही बल्लेबाजी कर रहा हूं, जब गेंदबाज गेंद करता है तो लगता है कि मैं ही गेंदबाजी कर रहा हूं। जब फील्डर दौड़ता है तो लगता है कि मैं ही गेंद की तरफ भाग रहा हूं। ये भावना आती है तो लगता है कि खेल जीवंत हो गया।
कमेंट्री की बात करें तो महाभारत के संजय सबसे आगे हैं। अगर आप अंधे आदमी को महाभारत के दृश्य दिखा पाते हो तो इससे बड़ा कमेंटेटर दुनिया में कोई नहीं हो सकता। कमेंट्री की कला सच बोलने की कला है। सत्य बोलने की आदत जिसमें है, वह अच्छा कमेंटेटर बन सकता है। दूसरी बात आप मधुर आवाज में बात करिए, जैसे सगाई के बाद आप अपनी होने वाली पत्नी से बात करते हैं।
जवाबः इसमें ऐसा हुआ कि 1968 के वक्त भारत सरकार से एक नोटिस आया कि सभी जगह हिंदी कमेंट्री होनी चाहिए। जरूरी है कि सब आकाशवाणी के केंद्रों में अब रणजी ट्रॉफी कमेंट्री होनी चाहिए। तो उन्होंने ढूंढ़ मचाई कि कोई कर सकता है क्या कमेंट्री?
इंदौर में भी रणजी ट्रॉफी मैच हो रहा था। मध्यपदेश और राजस्थान का। बड़े-बड़े क्रिकेटर्स को पूछा तो उन्होंने कहा पागल हैं? हिंदी भाषा में कोई कमेंट्री हो सकती है? हो ही नहीं सकती, किसी ने कभी सुनी ही नहीं, यह तो अजीब बात है। तब मैं नई दुनिया अखबार में कुछ लेख लिखा करता था, क्रिकेट के बारे में सुना तो मैंने सोचा कि चलो जाकर देखता हूं, मैं चला गया और मैंने कहा मैं कमेंट्री कर सकता हूं, मुझे याद है कि मैं हाफ पैंट और टीशर्ट पहनकर पहनकर चला गया था। गरीबी के दिन थे। जो स्टेशन डायरेक्टर थे, उन्होंने पहले तो मुझे नीचे से उपर तक देखा और कहा कि यार सिम्प्ली गेट आउट, पुट आउन सम ग्रे हेयर्स (चुपचाप बाहर चले जाओ और थोड़ा अनुभव लेकर आओ) उस समय बॉबी तलियार खान, विजेय मर्चेंट, 60 साल के होते थे। क्रिकेट कुछ सीखे होते थे तब वो कॉमेंट्री करते थे तो सबके मन में ही ख्याल था कि बहुत अनुभव चाहिए। उन्होंने मुझे भगा दिया और मैंने भी कोई बेज्जती की बात नहीं समझी। लड़का ही था वापस आ गया, कोई बात नहीं मन में ठेस भी नहीं लगी, वापस आ गए।
फिर शायद कोई मिला नहीं होगा। कमेंट्री का दिन आ गया, तब उनको याद आया कि एक पागल सा लड़का आया था देखते हैं, उसको कोशिश करते हैं कि वो कभी कर ले तो मैं गया। उन्होंने कहा कि आप काल्पिनक कमेंट्री करके दिखाएं। तो मैंने अंग्रेजी में कमेंट्री करके दिखाई। उन्होंने कहा कि आप तो इतनी शानदार कमेंट्री कर रहे हो, लेकिन हमें तो हिंदी में कमेंट्री करना है। तो मैंने कहा सिर्फ कोशिश करता हूं, हिंदी में तो मैंने भी कभी की नहीं, तब मैंने कमेंट्री की। मेरी हिंदी बचपन से अच्छी थी। अधिकतर लोगों की हिंदी अच्छी होती थी। मैंने हिंदी में कमेंट्री करके दिखाई, तो अच्छी तो नहीं की होगी? पर उन्होंने कहा की ये लड़का काम चला लेगा। सरकारी आदेश पूरा हो जाएगा।
वहां मैंने पहली बार हिंदी कमेंट्री की और सच मानिये इतनी आलोचना हुई कि इतनी खराब कमेंट्री कभी जिंदगी में नहीं हुई। किसी ने लिखा कि ये जिंदगी भर कमेंट्री सीखें तो भी कमेंटेटर नहीं बन सकते हैं। बताइए अब देखिये 19 साल का लड़का 18-19 साल का था। मासूम दिल और इतना दिल टूटा और पिताजी भी बहुत दुखी हुए। उन्होंने कहा यार भैया तो मेहनत करो या छोड़ दो। पिताजी ने कहा- नाम बदनाम हो रहा है। या तो कोशिश करो या छोड़ दो। दिल से महसूस करो फिर लोगों के दिलों को छूने की कोशिश करो। ये बात मैंने मूलमंत्र की तरह मान ली। जब बल्लेबाज खेलता है तो मुझे लगता है कि मैं ही बल्लेबाजी कर रहा हूं, जब गेंदबाज गेंद करता है तो लगता है कि मैं ही गेंदबाजी कर रहा हूं। जब फील्डर दौड़ता है तो लगता है कि मैं ही गेंद की तरफ भाग रहा हूं। ये भावना आती है तो लगता है कि खेल जीवंत हो गया।
कमेंट्री की बात करें तो महाभारत के संजय सबसे आगे हैं। अगर आप अंधे आदमी को महाभारत के दृश्य दिखा पाते हो तो इससे बड़ा कमेंटेटर दुनिया में कोई नहीं हो सकता। कमेंट्री की कला सच बोलने की कला है। सत्य बोलने की आदत जिसमें है, वह अच्छा कमेंटेटर बन सकता है। दूसरी बात आप मधुर आवाज में बात करिए, जैसे सगाई के बाद आप अपनी होने वाली पत्नी से बात करते हैं।
सवालः रणजी ट्रॉफी में कमेंट्री से ब्रेबोर्न स्टेडियम तक कैसे पहुंचे?
जवाबः वहां से जो चला तो फिर देश में भी हिंदी कमेंट्री की शुरुआत हो गई। मैं और जसदेव सिंह पहले हिंदी कमेंटेटर थे। वह चयनकर्ता भी थे। उनको राशिक डूंगरपुर जी ने कहा कि आपको हिंदी में कमेंटेटर नहीं मिल रहे हैं। इंदौर में एक लड़का है, जो थोड़ा बहुत क्रिकेट भी जानता है, भाषा अच्छी है और आवाज मीठी है। उसको मौका दो। पहले तो आकाशवाणी पर दबाव बना कि इसे बाहर कर दो, लेकिन स्टेशन डायरेक्टर को आवाज की सही पहचान थी। उन्होंने कहा कि कुछ भी हो इस लड़के की आवाज ईमानदार आवाज है। उन्होंने जब यह कहा तो मेरा दिल बड़ा हो गया। इसके बाद मैंने सोचना शुरू किया।
मैंने देखा कि जब बल्लेबाज स्क्वॉयर कट करता है तो क्या करता है। छोटी गेंद आती है तो खुद को गेंद की लाइन से अलग करता है और फिर स्क्वॉयर कट कर देता है चार रन के लिए। इससे आवाज भी बन गई, शैली भी बन गई और आवाज भी बन गई। ये जो छोटे-छोटे वाक्य बोलने की शैली बन गई कि छोटी गेंद, बल्लेबाज ने खुद को गेंद की लाइन से अलग किया, स्क्वॉयर कट कर दिया, चार रन के लिए। मुझे खुशी है कि अधिकांश कमेंट्रेटर उसकी नकल कर रहे हैं।
जवाबः वहां से जो चला तो फिर देश में भी हिंदी कमेंट्री की शुरुआत हो गई। मैं और जसदेव सिंह पहले हिंदी कमेंटेटर थे। वह चयनकर्ता भी थे। उनको राशिक डूंगरपुर जी ने कहा कि आपको हिंदी में कमेंटेटर नहीं मिल रहे हैं। इंदौर में एक लड़का है, जो थोड़ा बहुत क्रिकेट भी जानता है, भाषा अच्छी है और आवाज मीठी है। उसको मौका दो। पहले तो आकाशवाणी पर दबाव बना कि इसे बाहर कर दो, लेकिन स्टेशन डायरेक्टर को आवाज की सही पहचान थी। उन्होंने कहा कि कुछ भी हो इस लड़के की आवाज ईमानदार आवाज है। उन्होंने जब यह कहा तो मेरा दिल बड़ा हो गया। इसके बाद मैंने सोचना शुरू किया।
मैंने देखा कि जब बल्लेबाज स्क्वॉयर कट करता है तो क्या करता है। छोटी गेंद आती है तो खुद को गेंद की लाइन से अलग करता है और फिर स्क्वॉयर कट कर देता है चार रन के लिए। इससे आवाज भी बन गई, शैली भी बन गई और आवाज भी बन गई। ये जो छोटे-छोटे वाक्य बोलने की शैली बन गई कि छोटी गेंद, बल्लेबाज ने खुद को गेंद की लाइन से अलग किया, स्क्वॉयर कट कर दिया, चार रन के लिए। मुझे खुशी है कि अधिकांश कमेंट्रेटर उसकी नकल कर रहे हैं।
सवालः आपको पहला ब्रेक डूंगरपुर जी के कहने पर मिला?
जवाबः पहला टेस्ट मैच 1972-73 में किया। इसके बाद लगातार कमेंट्री करता रहा फिर प्रतिस्पर्धा भी शुरू हो गई।
जवाबः पहला टेस्ट मैच 1972-73 में किया। इसके बाद लगातार कमेंट्री करता रहा फिर प्रतिस्पर्धा भी शुरू हो गई।
सवालः अब तो क्रिकेटर ही कमेंट्री करने लगे हैं, इससे बाढ़ सी आ गई कमेंटेटर्स की/
जवाबः क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड समझता है कि खिलाड़ियों को पैसा देना और उनकी देख-रेख करने के लिए ही बोर्ड बना। जिन खिलाड़ियों के पास काम नहीं है, उनको काम देना बोर्ड का काम है। मुझे इसमें आपत्ति नहीं है। उन्हें कई चीजों का बेहतर अनुमान रहता है। कप्तान ने कोई बदलाव क्यों किया, वो हम लोगों से बेहतर सोचते हैं, लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि मैं उनसे कहता हूं कि आप कमेंट्री करें, लेकिन उस भाषा का सम्मान करें, जिसमें आप कमेंट्री कर रहे हैं। बीसीसीआई ने खेलों के अधिकार बेचे हैं, लेकिन देश की भाषा खराब करने के अधिकार नहीं बेचे हैं। जब बड़े क्रिकेटर कोई बात कहते हैं और सुशील दोशी कोई बात कहते हैं तो आज के बच्चों को लगता है कि बड़ा क्रिकेटर है, बड़ा नाम है, ये ठीक ही कह रहा होगा। ऐसे में आप देश की भाषा और संस्कार खराब कर रहे हैं। इससे अविश्वास पैदा होता है और देश टूटता है। मैं चैनलों से यही कहता हूं कि आप क्रिकेटर्स के लिए भाषा के कैंप लगाइए।
मुझे याद है एक बार वीवीएस लक्ष्मण मेरे पास आए और कहा कि मैं आपसे सीखना चाहता हूं। उनकी विनम्रता अच्छी लगी। वह दक्षिण भारत से हैं, लेकिन वह सीखना चाहते हैं। वहीं, उत्तर भारत के क्रिकेटर कहते हैं कि हिंदी भी कोई भाषा है? उत्तर प्रदेश में अलग तरह से बोली जाती है, राजस्थान में अलग तरह से बोली जाती है। मुझे याद है हम रेडियो कमेंट्री करते थे। शाम का वक्त था, सुनील गावस्कर खेल रहे थे और मैं कमेंट्री कर रहा था। मैंने कहा शाम ढल रही है, खिलाड़ियों की परछाई लंबी हो रही है, लेकिन भारत का सूरज शनी गावस्कर अभी भी विद्यमान है। अंग्रेज फील्डर ने देखा कि लोग मैदान के बाहर तालियां बजा रहे हैं, जबकि मैदान में तो कुछ ऐसा नहीं हो रहा। उन्होंने कुछ लोगों से अंग्रेजी में पूछा कि आप क्यों ताली बजा रहे हैं? इस पर लोगों ने कहा कि हिंदी कमेंटेटर ने कुछ अद्भुत कह दिया है। मुझे यह बहुत अच्छा लगा।
जवाबः क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड समझता है कि खिलाड़ियों को पैसा देना और उनकी देख-रेख करने के लिए ही बोर्ड बना। जिन खिलाड़ियों के पास काम नहीं है, उनको काम देना बोर्ड का काम है। मुझे इसमें आपत्ति नहीं है। उन्हें कई चीजों का बेहतर अनुमान रहता है। कप्तान ने कोई बदलाव क्यों किया, वो हम लोगों से बेहतर सोचते हैं, लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि मैं उनसे कहता हूं कि आप कमेंट्री करें, लेकिन उस भाषा का सम्मान करें, जिसमें आप कमेंट्री कर रहे हैं। बीसीसीआई ने खेलों के अधिकार बेचे हैं, लेकिन देश की भाषा खराब करने के अधिकार नहीं बेचे हैं। जब बड़े क्रिकेटर कोई बात कहते हैं और सुशील दोशी कोई बात कहते हैं तो आज के बच्चों को लगता है कि बड़ा क्रिकेटर है, बड़ा नाम है, ये ठीक ही कह रहा होगा। ऐसे में आप देश की भाषा और संस्कार खराब कर रहे हैं। इससे अविश्वास पैदा होता है और देश टूटता है। मैं चैनलों से यही कहता हूं कि आप क्रिकेटर्स के लिए भाषा के कैंप लगाइए।
मुझे याद है एक बार वीवीएस लक्ष्मण मेरे पास आए और कहा कि मैं आपसे सीखना चाहता हूं। उनकी विनम्रता अच्छी लगी। वह दक्षिण भारत से हैं, लेकिन वह सीखना चाहते हैं। वहीं, उत्तर भारत के क्रिकेटर कहते हैं कि हिंदी भी कोई भाषा है? उत्तर प्रदेश में अलग तरह से बोली जाती है, राजस्थान में अलग तरह से बोली जाती है। मुझे याद है हम रेडियो कमेंट्री करते थे। शाम का वक्त था, सुनील गावस्कर खेल रहे थे और मैं कमेंट्री कर रहा था। मैंने कहा शाम ढल रही है, खिलाड़ियों की परछाई लंबी हो रही है, लेकिन भारत का सूरज शनी गावस्कर अभी भी विद्यमान है। अंग्रेज फील्डर ने देखा कि लोग मैदान के बाहर तालियां बजा रहे हैं, जबकि मैदान में तो कुछ ऐसा नहीं हो रहा। उन्होंने कुछ लोगों से अंग्रेजी में पूछा कि आप क्यों ताली बजा रहे हैं? इस पर लोगों ने कहा कि हिंदी कमेंटेटर ने कुछ अद्भुत कह दिया है। मुझे यह बहुत अच्छा लगा।
सवालः अपनी कमेंट्री से जुड़ा कुछा ऐसा सुनाइए, जिससे मजा आ जाए
जवाबः मुंबई के ब्रेबोर्न स्टेडियम से मैं सुशील दोशी आपका स्वागत करता हूं आप तो जानते ही हैं कि आज भारत और पाकिस्तान के बीच में एक बहुत ही महत्वपूर्ण मैच शुरू हो रहा है। पूरा स्टेडियम खचाखच भरा है। इमरान खान के हाथ में गेंद है और बॉलिंग के लिए तैयार हो रहे हैं, जबकि भारत की तरफ से सुनील गावस्कर बल्लेबाजी के लिए तैयार हैं। उनके सामने हैं चेतन शर्मा। 50 हजार दर्शकों की उपस्थिति, पूरे स्टेडियम में खचाखच भरे लोग। दिलचस्पी का वारावरण, रोमांच हर पल, भारत और पाकिस्तान के मैच में यही होता है कि दिलचस्पी चरम सीमा पर पहुंच जाती है। दिलचस्पी के मामले में सभी मुकाबलों का यह बाप कहा जाता है और काफी हलचल है। इसी बीच इमरान लंबा रन अप लेते हुए। शुरू में ही विकेट लेने के आदी हैं, लेकिन गावस्कर विकेट देने के आदी नहीं हैं। ये भी एक महत्वपूर्ण मुकाबला है। इमरान बॉलिंग करने के लिए तैयार। गेंद ऑफ स्टंप पर, गावस्कर आगे आए, हॉफ वाली पर लिया और ड्रॉइव कर दिया है एक्सट्रा कवर और मिड ऑफ के बीच में से चार रन के लिए।
हिंदी और क्रिकेट ने एक-दूसरे की काफी मदद की है। हिंदी ने क्रिकेट को वहां तक पहुंचाया। चौके-चूल्हे तक, किसान तक। शुरू के दिनो में सिर्फ रेडियो था। एक रेडियो के सामने 500 लोग खड़े रहते थे। क्रिकेट की लोकप्रियता से हिंदी को भी फायदा हुआ। दक्षिण भारत के कई लोग मुझे लिखते थे कि क्रिकेट के कारण हम हिंदी सीख गए। हिंदी ने क्रिकेट की मदद की और आज भी कर रही है, लेकिन क्या क्रिकेट हिंदी की मदद कर रहा है। आकाशवाणी अपने अधिकारों के लिए तरस रहा है। चैनलों में भी हिंदी सुनने को नहीं मिलती है।
जवाबः मुंबई के ब्रेबोर्न स्टेडियम से मैं सुशील दोशी आपका स्वागत करता हूं आप तो जानते ही हैं कि आज भारत और पाकिस्तान के बीच में एक बहुत ही महत्वपूर्ण मैच शुरू हो रहा है। पूरा स्टेडियम खचाखच भरा है। इमरान खान के हाथ में गेंद है और बॉलिंग के लिए तैयार हो रहे हैं, जबकि भारत की तरफ से सुनील गावस्कर बल्लेबाजी के लिए तैयार हैं। उनके सामने हैं चेतन शर्मा। 50 हजार दर्शकों की उपस्थिति, पूरे स्टेडियम में खचाखच भरे लोग। दिलचस्पी का वारावरण, रोमांच हर पल, भारत और पाकिस्तान के मैच में यही होता है कि दिलचस्पी चरम सीमा पर पहुंच जाती है। दिलचस्पी के मामले में सभी मुकाबलों का यह बाप कहा जाता है और काफी हलचल है। इसी बीच इमरान लंबा रन अप लेते हुए। शुरू में ही विकेट लेने के आदी हैं, लेकिन गावस्कर विकेट देने के आदी नहीं हैं। ये भी एक महत्वपूर्ण मुकाबला है। इमरान बॉलिंग करने के लिए तैयार। गेंद ऑफ स्टंप पर, गावस्कर आगे आए, हॉफ वाली पर लिया और ड्रॉइव कर दिया है एक्सट्रा कवर और मिड ऑफ के बीच में से चार रन के लिए।
हिंदी और क्रिकेट ने एक-दूसरे की काफी मदद की है। हिंदी ने क्रिकेट को वहां तक पहुंचाया। चौके-चूल्हे तक, किसान तक। शुरू के दिनो में सिर्फ रेडियो था। एक रेडियो के सामने 500 लोग खड़े रहते थे। क्रिकेट की लोकप्रियता से हिंदी को भी फायदा हुआ। दक्षिण भारत के कई लोग मुझे लिखते थे कि क्रिकेट के कारण हम हिंदी सीख गए। हिंदी ने क्रिकेट की मदद की और आज भी कर रही है, लेकिन क्या क्रिकेट हिंदी की मदद कर रहा है। आकाशवाणी अपने अधिकारों के लिए तरस रहा है। चैनलों में भी हिंदी सुनने को नहीं मिलती है।
सवालः आपको नहीं लगता कि हिंदी की एक अकादमी होनी चाहिए, जहां अच्छे कमेंटेटर तैयार हों। आप ऐसी अकादमी बनाए?
जवाबः विचार अच्छा है, लेकिन मेरी भी व्यस्तताएं हैं, मैं चाहता हूं कि अच्छे कमेंटेटर निकलें।
जवाबः विचार अच्छा है, लेकिन मेरी भी व्यस्तताएं हैं, मैं चाहता हूं कि अच्छे कमेंटेटर निकलें।
सवालः आपको लगता है कि भारतीय टीम विश्व कप के लिए तैयार नहीं है?
जवाबः पिछली बार भी यही हुआ था। जब आखिरी वक्त तक प्रयोग किए जा रहे थे। अगर चार खिलाड़ी सफल हो गए तो आप किसे मौका देंगे? दुनिया ने अपनी टीमें तैयार कर ली हैं। वहां, आप प्रयोग कर रहे हैं। इतना व्यस्त कार्यक्रम है और यह समझ लिया गया है कि जितना ज्यादा मैच होंगे, उतने ज्यादा पैसे आएंगे। उनती ज्यादा लोकप्रियता मिलेगी। क्रिकेट से लोकप्रियता बहुत मिलती है और खिलाड़ियों को पैसा भी बहुत मिलता है। खिलाड़ी आईपीएल खेलने के लिए तैयार हैं, लेकिन देश के लिए नहीं खेलना चाहते। जब तक आदमी पैसे को चलाएगा, तब तक ठीक है, लेकिन जब पैसा आदमी को चलाएगा तो बात बिगड़ जाएगी। इंसान अपनी नजरों में गिर जाएगा।
जवाबः पिछली बार भी यही हुआ था। जब आखिरी वक्त तक प्रयोग किए जा रहे थे। अगर चार खिलाड़ी सफल हो गए तो आप किसे मौका देंगे? दुनिया ने अपनी टीमें तैयार कर ली हैं। वहां, आप प्रयोग कर रहे हैं। इतना व्यस्त कार्यक्रम है और यह समझ लिया गया है कि जितना ज्यादा मैच होंगे, उतने ज्यादा पैसे आएंगे। उनती ज्यादा लोकप्रियता मिलेगी। क्रिकेट से लोकप्रियता बहुत मिलती है और खिलाड़ियों को पैसा भी बहुत मिलता है। खिलाड़ी आईपीएल खेलने के लिए तैयार हैं, लेकिन देश के लिए नहीं खेलना चाहते। जब तक आदमी पैसे को चलाएगा, तब तक ठीक है, लेकिन जब पैसा आदमी को चलाएगा तो बात बिगड़ जाएगी। इंसान अपनी नजरों में गिर जाएगा।
सवालः आप अभी भी इतने फिट हैं, फिटनेस का राज क्या है?
जवाबः आपने जो सवाल पूछा वह मेरे दिल के करीब है। एक दिन मैं अपने बेटे से बात कर रहा था कि मैं कैसे तुम्हारे बिजनेस में तुम्हारी मदद कर सकता हूं। उसने कहा कि आप यहां नहीं आएं तो मेरी बड़ी मदद होगी। मैं उस बात को समझ गया। अगर आप वक्त के साथ नहीं बदले तो वक्त आपको ठुकरा देगा। मैं समझ गया कि उनकी मीन-मेख निकालना जरूरी नहीं है। नई पीढ़ी का तरीका यह है कि ज्यादा कमाओ और ज्यादा खर्च करो। हम लोग बचाने में लगे हैं तो वो एक दिक्कत की बात है तो नई पीढ़ी की सोच के साथ चलना शुरू कर दिया है। कमेंट्री में भी यही होता है। पहले पांच दिन का क्रिकेट था तो अलग तरह की कमेंट्री होती थी फिर वनडे क्रिकेट आया तो थोड़े ज्यादा उत्साह के साथ कमेंट्री होने लगी। अब टी20 क्रिकेट में सांस रोक के कमेंट्री होती है। वक्त के साथ नहीं बदले तो वक्त आपको ठोकर मार देगा, आपको पीछे थोड़ देगा।
जवाबः आपने जो सवाल पूछा वह मेरे दिल के करीब है। एक दिन मैं अपने बेटे से बात कर रहा था कि मैं कैसे तुम्हारे बिजनेस में तुम्हारी मदद कर सकता हूं। उसने कहा कि आप यहां नहीं आएं तो मेरी बड़ी मदद होगी। मैं उस बात को समझ गया। अगर आप वक्त के साथ नहीं बदले तो वक्त आपको ठुकरा देगा। मैं समझ गया कि उनकी मीन-मेख निकालना जरूरी नहीं है। नई पीढ़ी का तरीका यह है कि ज्यादा कमाओ और ज्यादा खर्च करो। हम लोग बचाने में लगे हैं तो वो एक दिक्कत की बात है तो नई पीढ़ी की सोच के साथ चलना शुरू कर दिया है। कमेंट्री में भी यही होता है। पहले पांच दिन का क्रिकेट था तो अलग तरह की कमेंट्री होती थी फिर वनडे क्रिकेट आया तो थोड़े ज्यादा उत्साह के साथ कमेंट्री होने लगी। अब टी20 क्रिकेट में सांस रोक के कमेंट्री होती है। वक्त के साथ नहीं बदले तो वक्त आपको ठोकर मार देगा, आपको पीछे थोड़ देगा।
सवालः आखिरी सवाल आपकी पुस्तक 'आखों देखा हाल से' इस पुस्तक का कोई अंश जो आपके सबसे करीब हो?
जवाबः बहुत सारी ऐसी चीजें हैं, जो मुझे याद है। जब मैं लिखने बैठा तो मुझे लगा कि मेरी कहानी कोई क्यों पढ़ेगा, लेकिन 15 रुपये किराए वाले मकान में रहने वाले लड़के की संघर्षगाथा, शायद बहुत सारे लोगों को प्रेरित करेगी। दूसरी बात मैं कोई विद्वान नहीं था। पांच साल सप्लीमेंट्री के जरिए पास हुआ। ऐसा लड़का अगर पद्मश्री जीत सकता है, कमेंट्री कर सकता है तो आप लोग कर ही सकते हैं। इससे प्रेरित होने की जरूरत है। दूसरी बात जो मुझे खिलाड़ियों के साथ रहने से सीखने को मिली। गावस्कर साहब कहते थे कि दुनिया कहती है कि मैं सबसे बड़ा ओपनिंग बल्लेबाज हूं, लेकिन मैं आज भी यही मानता हूं कि दुनिया अगर ये कहे, चार आदमी भी कि ये अच्छा आदमी है तो मेरा जीवन सफल है। सुनील गावस्कर की इस बात का मतलब है कि लोकप्रिय होने से बड़ी बात होती है, अच्छा आदमी होना। मैं सभी से यही कहता हूं, उम्मीद रखता हूं कि आप अच्छा आदमी बनने की कोशिश करें। आखिरी में यही कहना चाहूंगा कि मेरे नाम से एक कमेंट्री बॉक्स भी है, जो दुनिया में तीसरे नंबर पर है। इंदौर के होल्कर स्टेडियम में यह कमेंट्री बॉक्स है।
जवाबः बहुत सारी ऐसी चीजें हैं, जो मुझे याद है। जब मैं लिखने बैठा तो मुझे लगा कि मेरी कहानी कोई क्यों पढ़ेगा, लेकिन 15 रुपये किराए वाले मकान में रहने वाले लड़के की संघर्षगाथा, शायद बहुत सारे लोगों को प्रेरित करेगी। दूसरी बात मैं कोई विद्वान नहीं था। पांच साल सप्लीमेंट्री के जरिए पास हुआ। ऐसा लड़का अगर पद्मश्री जीत सकता है, कमेंट्री कर सकता है तो आप लोग कर ही सकते हैं। इससे प्रेरित होने की जरूरत है। दूसरी बात जो मुझे खिलाड़ियों के साथ रहने से सीखने को मिली। गावस्कर साहब कहते थे कि दुनिया कहती है कि मैं सबसे बड़ा ओपनिंग बल्लेबाज हूं, लेकिन मैं आज भी यही मानता हूं कि दुनिया अगर ये कहे, चार आदमी भी कि ये अच्छा आदमी है तो मेरा जीवन सफल है। सुनील गावस्कर की इस बात का मतलब है कि लोकप्रिय होने से बड़ी बात होती है, अच्छा आदमी होना। मैं सभी से यही कहता हूं, उम्मीद रखता हूं कि आप अच्छा आदमी बनने की कोशिश करें। आखिरी में यही कहना चाहूंगा कि मेरे नाम से एक कमेंट्री बॉक्स भी है, जो दुनिया में तीसरे नंबर पर है। इंदौर के होल्कर स्टेडियम में यह कमेंट्री बॉक्स है।
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