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वर्ल्ड हेरिटेज सप्ताह: इतिहास के अंधेरे में कल का उजियारा
Wed, 25 Nov 2020 06:26 AM IST
नवीन जैन
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Published by: नवीन जैन
Updated Wed, 25 Nov 2020 06:26 AM IST
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Tajmahal
- फोटो : PTI
बार-बार इतिहास के फेर में पड़ने की सलाह जानकार नहीं देते। मगर, उतना ही सही यह भी माना जाता है कि वर्तमान की बेहतरी और भविष्य को आंकने के लिए इतिहास को जानना जरूरी है। इतिहास के अंधेरे में ही हमारे कल का उजियारा छिपा हुआ होता है। अपने गौरवशाली अतीत को संजोकर रखने की जिम्मेदारी प्रत्येक नागरिक की है। जब हम अपनी ऐतिहासिक धरोहरों को रखवाली करेंगे, तभी आने वाली पीढ़ियां राष्ट्र के भव्य इतिहास से रूबरू होती रहेंगी। बिना बीते कल को जाने, आने वाले कल के बारे में तर्कपूर्ण फैसला नहीं लिया जा सकता।
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इन जानकारियों के बिना जवान नस्ल की जिदंगी की किताब अधूरी रह सकती है। शायद, इसी विचार के आधार पर दुनिया में प्रत्येक वर्ष दुनिया में 18 से 25 नवंबर तक विश्व धरोहर सप्ताह यानी, वर्ल्ड हेरिटेज वीक यूनेस्को के नेतृत्व में संपन्न होता है। भारत में कुल 38 धरोहर चिह्नित की जा चुकी हैं, जिनमें आगरा में स्थित ताजमहल और महाराष्ट्र स्थित अजंता तथा एलोरा की गुफाएं मुख्य हैं। संयुक्त राष्ट्र की शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संस्था यूनेस्को ने दुनिया की कुल 1075 ऐसी अमानतों को सूचीबद्ध कर रखा है। इस संगठन में 195 देश शामिल हैं। पहले स्थान पर 53 धरोहरों के साथ इटली तथा सबसे कम धरोहर चेक गणराज्य में हैं।
अहमदाबाद कई बातों के लिए मशहूर है। दीवारों से घिरे इस शहर को यूनेस्को ने वैश्विक धरोहर का दर्जा दे रखा है। मोहब्बत की सदियों से निशानी आगरा का ताजमहल यूनेस्को की उक्त सूची में दूसरे स्थान पर है। पहला स्थान कंबोडिया के सुप्रसिद्ध अंकोरवाट मंदिर को प्राप्त है। गर्व की बात यह है कि ताजमहल उन चंद इमारतों में है, जो सबसे अधिक देखी जाती हैं। एक आंकड़े के अनुसार सामान्य दिनों में रोजाना करीब 12,000 सैलानी ताजमहल का दीदार करते हैं। भारत की प्रमुख धरोहरों में अजंता-एलोरा की गुफाएं, सांची का बौद्ध स्मारक, कुतुबमीनार, खजुराहो के मंदिर, राजस्थान के दर्शनीय स्थल, सूर्य मंदिर, कोणार्क, लाल किला परिसर आदि प्रमुख हैं। कुछ इमारतों को दोबारा बनाने की कोशिश की गई, पर उनमें कोई न कोई कमी रह ही गई।
भारत की प्राचीन धरोहरों की खूबसूरती बनाए रखना सरकार का भी दायित्व है। ये धरोहर अपने मूल स्वरूप में नहीं रहीं, तो भारत की शान को बट्टा लगेगा। पिछले साल ताजमहल पर काले तथा भूरे धब्बे दिखाई देने लगे थे। कारण जो भी रहे हों, लेकिन सेंटजोंस कॉलेज आगरा के एंटोमोलॉजी विभाग के डॉ.गिरीश माहेश्वरी का कहना है कि यमुना नदी के बढ़ते प्रदूषण के कारण वहां गोल्डीकायरोनोमस प्रजाति के कीड़ों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। हालांकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारियों ने ताजमल पर मड पैक थेरेपी का इस्तेमाल करना शुरू किया, जिसके बहुत अच्छे परिणाम निकले। दरअसल वैश्विक धरोहरों को अपने मूल रूप में सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी हमारी भी है, लेकिन यह विडंबना है कि खुद हम इसे नुकसान पहुंचाते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार स्मारक का प्राकृतिक रूप से क्षरण होना तो प्रकृति का नियम है, लेकिन मानव द्वारा भी इसे क्षति पहुंचाई जाती है। कुछ लोग इन इमारतों पर स्लोगन या नाम लिखकर खराब करते हैं, तो कुछ नक्काशी या कुरेद कर इनका सौंदर्य बिगाड़ते हैं। इन धरोहरों को बचाने के लिए हर विभाग तथा हर व्यक्ति को प्रयास करने होंगे। धरोहरों की स्वच्छता को लेकर नियम बनाने होंगे तथा कठोरता से पालन करने के अलावा प्लास्टिक कचरा मुक्त संदेश भी जारी करने होंगे। तेजी से क्षतिग्रस्त होती स्थानीय धरोहरों के साथ लुप्त होते इतिहास को संजोने के लिए इंदौर के सीबीएसई के स्कूलों में स्थानीय ऐतिहासिक स्थलों को भी कोर्स में शामिल किया गया है।
अधिकांश बच्चों को इतिहास सबसे उबाऊ विषय लगता है। इसलिए इसे ज्यादा मजेदार और प्रायोगिक बनाने के लिए बोर्ड ने इतिहास में भी प्रायोगिक विषय शुरू कर दिए हैं। इसमें बच्चों को स्थानीय स्मारकों के इतिहास, वास्तुशैली, महत्व और संरक्षण के तरीकों पर उन स्थानों पर जाकर रिपोर्ट तैयार करनी होती है। इसमें न सिर्फ बच्चों का ज्ञान बढ़ता है, बल्कि उन्हें इन धरोहरों को संरक्षित रखने के तरीके भी पता लगते हैं। ऐसे प्रयासों का विस्तार किए जाने की जरूरत है, ताकि धरोहरों को संरक्षित रखा जा सके।