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आधी आबादी: राजनीति का चेहरा बदलने वाला विधेयक, मोदी सरकार का ऐतिहासिक कदम

Wed, 20 Sep 2023 07:41 AM IST
Neerja Chowdhary नीरजा चौधरी
Updated Wed, 20 Sep 2023 07:41 AM IST
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सार
महिला आरक्षण विधेयक की अब तक की यात्रा में बेशक विभिन्न दलों का योगदान रहा है। लेकिन अंततः जीतने वाले को ही सिकंदर माना जाता है। हालांकि तुरंत लागू नहीं होने के कारण 2024 के चुनाव पर इसका क्या असर पड़ता है, यह देखने वाली बात होगी।
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Womens Reservation Bill historic step of Modi government, will change trend of indian politics
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

नरेंद्र मोदी सरकार ने जब संसद के विशेष सत्र बुलाने की घोषणा की, तो लोग तरह-तरह के कयास लगा रहे थे, लेकिन अब इसका मकसद सामने आ गया है। आधी आबादी को संसद एवं राज्यों की विधानसभाओं में राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के लिए जिस महिला आरक्षण विधेयक की मांग पिछले 27 वर्षों से उठ रही थी, उसे पारित करने के उद्देश्य से ही प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने यह विशेष सत्र बुलाया था। नए संसद भवन की पहली कार्यवाही में लोकसभा में सबसे पहला विधेयक जो मंगलवार को पेश किया गया, वह नारी शक्ति वंदन विधेयक के नाम से महिला आरक्षण विधेयक ही है।



अभी लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र 15.21 प्रतिशत और राज्यसभा में 13.02 प्रतिशत है। जबकि आज महिलाएं जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं और अपनी छाप छोड़ रही हैं, नए-नए क्षेत्रों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं, लेकिन राजनीति ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र है, जहां उनके लिए दरवाजे तकरीबन सुनियोजित ढंग से बंद थे। कहा जाता था कि महिलाओं में चुनाव जीतने की क्षमता नहीं है।


राजनीति में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करवाने की शुरुआत राजीव गांधी ने की थी, जब स्थानीय निकायों के चुनाव में उनकी सरकार ने एक तिहाई सीटें आरक्षित करने की बात की थी, लेकिन वह विधेयक उनके प्रधानमंत्रित्व काल में पारित नहीं हो सका, क्योंकि राज्यों ने उसका तीखा विरोध किया था। नरसिंहा राव के कार्यकाल में वह विधेयक पारित हुआ। इसमें स्थानीय निकायों के चुनाव में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित की गईं। बिहार जैसे राज्यों ने महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत तक सीटें आरक्षित कर दीं। उसकी वजह से जमीनी स्तर पर आज ऐसी महिलाओं का एक बड़ा तबका है, जिन्हें पंचायत चलाने का राजनीतिक अनुभव है।

महिलाएं आज अपने दम-खम पर बेहतर ढंग से पंचायतों का संचालन कर रही हैं। कई अध्ययनों से पता चलता है कि जहां महिलाएं पंचायत में प्रधान या सरपंच रही हैं, उन्होंने बुनियादी मुद्दों-शिक्षा, स्वास्थ्य आदि को अहमियत दी है। राजनीतिक रूप से जागरूक उन महिलाओं के विशाल समूह को अब पंचायत से ऊपर राज्य विधानसभाओं और लोकसभा में प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिलेगा। महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा, तो कानून भी महिला संवेदनशील बनेंगे और नीति-निर्माण में उनकी भूमिका बढ़ेगी।

वर्ष 1996 में जब पहली बार एचडी देवगौड़ा सरकार ने लोकसभा में इसे पेश किया था, तो विभिन्न पार्टियों के कुछ वरिष्ठ लोग सांसदों को सदन में जाने से रोक रहे थे, क्योंकि वे चाहते थे कि सदन का कोरम ही पूरा न हो। यह मैंने स्वयं देखा है। हर पार्टी के भीतर इसको लेकर प्रतिरोध था, भले ही बाहर उनका जो भी रवैया हो। पुरुष नेताओं को अपनी सीटें गंवाने का भय था। फिर अटल बिहारी वाजपेयी के समय में भी इसे पेश किया गया, पर पारित नहीं हो सका। उसके बाद डॉ. मनमोहन सिंह के समय में 2008 में राज्यसभा में इसे पेश किया गया था, फिर इसे स्टैंडिंग कमेटी के पास भेज दिया गया था। अंततः 2010 में राज्यसभा में यह पारित हो सका। इसे पारित कराने में सोनिया गांधी की बहुत बड़ी भूमिका थी। लेकिन कांग्रेस अपने गठबंधन सहयोगियों-लालू यादव और मुलायम सिंह यादव के विरोध के कारण लोकसभा में इसे पारित नहीं करवा सकी, क्योंकि सरकार पर खतरा देख वह पीछे हट गई थी।

मंगलवार को जो बिल लोकसभा में पेश किया गया है वह नया है, हालांकि मनमोहन सिंह सरकार द्वारा लाए गए विधेयक से यह बहुत अलग नहीं है। नए बिल में केवल एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए आरक्षण से संबंधित प्रावधान हटा दिए गए हैं। इसमें लोकसभा, दिल्ली विधानसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटों के आरक्षण का प्रावधान है। इन्हीं एक तिहाई सीटों में से एक तिहाई सीटें अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। राज्यसभा और विधान परिषदों में महिलाओं के आरक्षण का प्रावधान नहीं है।

इसमें ओबीसी महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं है, जिसकी मांग की जा रही थी। हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने मांग की है कि ओबीसी महिलाओं के लिए भी कोटा के भीतर कोटा का प्रावधान किया जाए, लेकिन मुझे नहीं लगता कि ओबीसी आरक्षण का प्रावधान नहीं होने से इसका ज्यादा विरोध होगा। मसलन, नीतीश कुमार महिलाओं के मतों के कारण पिछली बार जीते थे। ऐसे में, वह इस विधेयक का विरोध करके महिलाओं की नाराजगी क्यों मोल लेंगे? तेजस्वी यादव क्या लालू यादव के स्टैंड पर ही कायम रहकर राजनीति करेंगे या उससे आगे बढ़ेंगे?

दूसरी पार्टियां भी विरोध नहीं करेंगी, क्योंकि तब इसका पूरा श्रेय नरेंद्र मोदी ले जाएंगे। अगर वे समर्थन करते हैं, तो उन्हें भी इसका श्रेय मिल सकता है, क्योंकि शुरुआत तो उन्हीं लोगों ने की थी। वैसे भी पिछले कुछ वर्षों से दिख रहा है कि मतदान में महिलाएं बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं और पुरुषों के मुकाबले राजनीतिक रूप से ज्यादा जागरूक हैं। इसलिए भी कोई इस विधेयक का विरोध नहीं करना चाहेगा।

इस विधेयक की एक खामी यह कही जा सकती है कि यह परिसीमन के बाद ही लागू होगा, जो संभवतः 2027 में होगा। नतीजतन पारित होने के बाद भी अब यह कानून 2029 के लोकसभा चुनाव में ही लागू हो पाएगा। इसलिए अभी इसे प्रतीकात्मक ही कहा जा सकता है। इसके अलावा परिसीमन कानून के लिए एक अलग विधेयक या अधिसूचना की जरूरत होगी। यदि यह विधेयक इस सत्र में पारित हो जाता है, तो विभिन्न दलों में श्रेय लेने की होड़ लग जाएगी।

बेशक इसमें विभिन्न पार्टियों का योगदान है, लेकिन अंततः जीतने वाले को ही सिकंदर माना जाता है। इसलिए नरेंद्र मोदी और भाजपा को इसका श्रेय मिलेगा, और उसे चुनावी लाभ भी मिलेगा। लेकिन तुरंत लागू नहीं होने के कारण 2024 के चुनाव पर इसका क्या असर पड़ता है, यह देखने वाली बात होगी।

कुल मिलाकर, यह मोदी सरकार का एक ऐतिहासिक कदम है। इस विधेयक के पारित होने से न केवल शहरी महिलाएं, बल्कि ग्रामीण महिलाएं भी उत्साहित हो सकती हैं। इससे न केवल देश का राजनीतिक चेहरा बदलेगा, बल्कि समाज भी बहुत प्रभावित होगा। बहुत से लोग मानते हैं कि यह सदी महिलाओं की होने वाली है, खासकर युवा महत्वाकांक्षी महिलाओं की। और भारत की महिलाएं तेजी से आगे बढ़कर देश निर्माण में भूमिका निभा रही हैं। 

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