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जानना जरूरी है: विष्णु ने कैसे किया कालनेमि का अंत, चक्र से क्यों काटने पड़े सौ भयंकर मस्तक?

Sun, 30 Aug 2026 08:40 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 30 Aug 2026 08:40 AM IST
सार

श्रीहरि ने चक्र चलाया और देखते ही देखते कालनेमि की सौ भुजाएं कटकर भूमि पर गिर गईं। फिर उसके सौ भयंकर मस्तकों को भी चक्र ने काट डाला।

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Pages of Mythology and Culture When Vishnu Ended Kalnemi Hundred Fearsome Heads cut from Sudarshan chakra
श्रीहरि ने चक्र चलाया और देखते ही देखते कालनेमि की सौ भुजाएं कटकर भूमि पर गिर गईं - फोटो : अमर उजाला प्रिंट-ग्राफिक्स

विस्तार

देवताओं और दानवों के बीच एक बार ऐसा भयंकर युद्ध हुआ, जिसकी कल्पना करना भी कठिन था। दानवों की ओर से कालनेमि नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर युद्ध का नेतृत्व कर रहा था। वह केवल बलवान ही नहीं, बल्कि अपने अद्भुत आकार और भयानक स्वरूप की वजह से सभी के लिए भय का कारण था। उसके मस्तक पर सूर्य के समान चमकता हुआ मुकुट था और उसका शरीर चांदी के कवच से ढका हुआ था। उसकी सौ भुजाएं थीं और प्रत्येक हाथ में एक आयुध था। उसके सौ मुख और सौ मस्तक उसे किसी विशाल पर्वत के समान बना देते थे, जिसके अनगिनत शिखर आकाश को छू रहे हों।

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कालनेमि जब युद्धभूमि की ओर बढ़ता तो ऐसा लगता, मानो कोई चलता-फिरता पर्वत तीनों लोकों को रौंदने निकल पड़ा हो। वह अपनी भुजाओं से आकाश को तौलता हुआ प्रतीत होता था, पैरों की ठोकर से पर्वतों को दूर फेंक देता और उसके प्रचंड नि:श्वासों से बादल तक दिशाहीन होकर उड़ जाते। उसे देखकर देवताओं के मन में भय उत्पन्न हो गया। इंद्र सहित सभी देवता समझ गए कि आज का युद्ध साधारण नहीं होगा। दानवों ने कालनेमि को अपना सेनापति बनाया और उसके पीछे युद्धभूमि में उतर पड़े। दूसरी ओर, चंद्रमा और सूर्य के प्रकाश से दीप्त देवसेना सजकर तैयार थी। अग्नि और वायु भी देवताओं के साथ थे और पूरी सेना भगवान नारायण के संरक्षण में थी। दोनों सेनाएं जब आमने-सामने आईं तो ऐसा लगा, जैसे प्रलय के समय आकाश और पृथ्वी एक-दूसरे से टकरा रहे हों।
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युद्ध आरंभ होते ही चारों ओर अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा होने लगी। देवता वज्र और लोहे के परिघ चलाने लगे, तो दानव तलवारों और भारी गदाओं से उनका सामना करने लगे। किसी के शरीर पर बाणों की चोट लगी, किसी के अंग गदा के प्रहार से टूट गए और अनेक योद्धा घायल होकर भूमि पर गिर पड़े। इसी बीच कालनेमि ने अपना विशाल रूप धारण कर लिया।

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  • क्रोध से उसकी भौंहें तन गईं और मुख से अग्नि की लपटों के समान प्रचंड ज्वाला निकलने लगी। उसकी भुजाओं के प्रहार से देवता, यक्ष, गंधर्व और नाग तक घायल होकर गिरने लगे।
  • उसने ऐरावत पर बैठे इंद्र को बाणों से बांध दिया और वरुण का पाश छीन लिया। उसने लोकपालों को उनके स्थानों से हटा दिया और अग्नि तथा वायु तक को अपने अधीन कर लिया।

अपने अहंकार में वह स्वयं को तीनों लोकों का स्वामी समझने लगा। कालनेमि ने निश्चय किया कि वह श्रीहरि को पराजित करके वैकुंठ पर अधिकार कर लेगा। वह भगवान विष्णु के सामने पहुंचा। श्रीहरि गरुड़ पर विराजमान थे और उनके हाथ में कौमोदकी गदा थी। कालनेमि ने श्रीहरि को देखकर कटु वचन कहे। कालनेमि ने कहा, ‘तुमने अनेक असुरों और उनके पूर्वजों का संहार किया है। तुम देवताओं के रक्षक और दानवों के घोर विरोधी हो।’

विष्णु जी ने शांत स्वर में कहा, ‘कालनेमि! तुम्हारे पास बल से अधिक अहंकार है। तुमने देवताओं के अधिकार छीनकर धर्म की मर्यादा तोड़ी है। आज तुम्हारे अधर्म का अंत हो जाएगा।’ इस बीच क्रोध में कालनेमि ने एक विशाल गदा उठाकर गरुड़ पर प्रहार किया। गदा गरुड़ के मस्तक पर लगी। गरुड़ को घायल देखकर विष्णु जी क्रोध से लाल हो उठे। उन्होंने अपना सुदर्शन चक्र उठाया। सुदर्शन सूर्य के समान चमक रहा था।



श्रीहरि ने चक्र चलाया और देखते ही देखते कालनेमि की सौ भुजाएं कटकर भूमि पर गिर गईं। फिर उसके सौ भयंकर मस्तकों को भी चक्र ने काट डाला। इसके बाद भी कालनेमि का विशाल धड़ कुछ समय तक युद्धभूमि में खड़ा रहा। तभी गरुड़ ने अपने विशाल पंख फैलाए और तीव्र गति से कालनेमि की ओर झपटे। उन्होंने अपनी छाती के प्रचंड आघात से उस दानव को धरती पर गिरा दिया। कालनेमि के मरते ही देवताओं और ऋषियों ने भगवान विष्णु की जय-जयकार की। तीनों लोकों में फिर से शांति स्थापित हो गई।

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