जेन-जी से कितनी उम्मीद की जाए: आंदोलन व्यवस्था परिवर्तन के लिए... लेकिन युवा अंततः असफल ही रहा
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विस्तार
पिछले कुछ दिनों में ‘जेन-जी’ अकस्मात चर्चा में आया और देखते-देखते एक बड़े वर्ग के मनोविज्ञान पर छा गया। वैसे तो यह शब्दावली उस पीढ़ी के लिए इस्तेमाल की गई है, जो वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्मी। असल प्रश्न यह नहीं है कि इसे कैसे देखा जाए? यह लंबे समय तक रहने वाला है या अंश काल तक? ‘जेन-जी’ कृत्रिम रूप से गढ़ा गया शब्द है या फिर नेचुरल शब्द, जो आज की युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहा है? तो क्या यह रचनाधर्मी है? यह विचारवान है, यह विजनरी है, अथवा क्रांतिधर्मी? इसका उद्देश्य केवल व्यवस्था परिवर्तन है अथवा नए युग का निर्माण? वैसे सामान्यतया क्रांतियां तात्कालिक रूप में हमेशा सफल रही हैं, लेकिन दीर्घकाल में असफल। इतिहास तो इस बात का गवाह है कि फ्रांसीसी क्रांति ने पुरातन व्यवस्था को खत्म कर जिस नई व्यवस्था की परिकल्पना पेश की उसी से नेपोलियन पैदा हुआ, जिसने अंततः क्रांति को ही खत्म कर दिया। अरब स्प्रिंग में भी यही देखा गया और बांग्लादेश में भी यही।
यह ऐसा पहला अवसर नहीं है, जब इस तरह की कोई शब्दावली सामने आई है। राजनीतिक समाजशास्त्र में ऐसा प्रायः होता रहा है। युवा तो हर युग में हुआ और इतिहास के प्रत्येक कालखंड में उसने विरोध, प्रतिरोध, क्रांति अथवा विद्रोह किया है। भारतीय इतिहास में इसे उपनिषदों में खंगालेंगे, तो नचिकेता जैसे युवा दिख जाएंगे, बल्कि श्रीकृष्ण सबसे आगे दिखेंगे, जो सात वर्ष की उम्र में इंद्र की सत्ता को चुनौती दे देते हैं। आधुनिक कालखंड में आएं, तो अमेरिकी क्रांति से लेकर फ्रांस की क्रांति तक को एक निश्चित आकार किसने दिया?
भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद सहित अधिकांश क्रांतिकारी कौन थे? सभी के सभी युवा। 21वीं सदी में देखें तो अरब स्प्रिंग से लेकर ईरान में महिलाओं के आंदोलन तक, एशिया में श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल तक। यह तो सभी ने देखा, लेकिन यूरोप के विभिन्न देशों में युवाओं का आंदोलन जिस तरह से सत्ता पर अपना दबाव बनाने में सफल होता जा रहा है, विशेषकर फ्रांस में, अथवा इंडोनेशिया में जिस तरह से सरकार को पीछे हटने पर विवश कर दे रहा है, वह कुछ और संकेत दे रहा है।
अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर युवाओं को गुस्सा क्यों आ रहा है? क्या यह आकस्मिक है अथवा लंबे समय से चली आ रही असहमतियों का परिणाम, जिन्हें सरकारें स्वीकारना तो दूर सुनना ही नहीं चाह रही थीं? यह विषय वास्तव में विचार करने योग्य है कि ट्यूनीशिया में एक सब्जी विक्रेता बाउजिजो के आत्महत्या कर लेने पर इतनी बड़ी क्रांति कैसे हो गई कि ट्यूनीशिया के शासक बेन अली को भागना पड़ा, मिस्र के होस्नी मुबारक को सत्ताच्युत होना पड़ा, लीबिया के तानाशाह गद्दाफी मारे गए और अंततः सीरिया के बसर अल असद भी सत्ताच्युत हुए और देश छोड़कर भागे। क्यों? श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में इसी तरह की प्रतिध्वनियां और प्रतिरोध की अभिव्यंजनाएं रहीं, जो करीब डेढ़ दशक बाद एशिया में देखी गईं।
वर्तमान की बात करें तो सही अर्थों में ‘जेन-जी’ दुनिया की सबसे बड़ी ‘डेमोग्राफिक शक्ति’ बनती हुई दिख रही है। यह न सिर्फ संख्या बल में अधिक है, बल्कि यह तकनीकी रूप से समृद्ध है और राजनीतिक रूप से जागरूक है। सोशल मीडिया और डिजिटल कनेक्टिविटी ने इन्हें एक ऐसा माइंडसेट और राजनीतिक चेतना दी है, जो राजनीति की परंपरागत व्यवस्था से अलग है।
अभी पिछले दिनों नेपाल में जो हुआ या जो इंडोनेशिया में चल रहा है अथवा जो फ्रांस सहित यूरोप के कई देशों में कम या ज्यादा पैमाने पर दिख रहा है, उसका यदि माइक्रो विश्लेषण किया जाए, तो एक बात तो स्पष्ट हो जाएगी कि ‘जेन-जी’ भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के ही खिलाफ नहीं है, बल्कि सरकारों के गैर-लोकतांत्रिक व्यवहार से भी नाराज है।
गौर से देखें, तो इंडोनेशिया और नेपाल में छात्र आंदोलन में क्लाइमेट जस्टिस और डेमोक्रेटिक रिफाॅर्म्स की मांग को लेकर ‘जेन-जी’ अगुवाई करता हुआ दिखेगा। फ्रांस और यूरोप में पेंशन सुधार विरोधी आंदोलन में सबसे मुखर यही युवा रहा। और तो और, स्वयं लोकतंत्र का नेता और संरक्षक मानने वाले अमेरिका में भी गन कंट्रोल, ब्लैक लाइव्स मैटर और क्लाइमेट एक्शन जैसी मुहिमों में ‘जेन-जी’ की निर्णायक भूमिका रही है।
दरअसल, यह पहली पीढ़ी है, जो स्मार्टफोन और इंटरनेट के साथ बड़ी हुई है। ये सही मायने में ‘डिजिटल नेटिव्स’ हैं और सोशल मीडिया, एआई, ब्लॉकचेन आदि उनके डीएनए में हैं। हम कह सकते हैं कि ‘जेन-जी’ का आंदोलन सड़क से लेकर हैशटैग तक समानांतर चलता है। यही कारण है कि इन्हें अब किसी संस्थागत समाचार माध्यम की आवश्यकता भी महसूस नहीं होती। जेन-जी में एक और विशेष बात दिखी कि वह सिर्फ रिएक्टिव नहीं है, बल्कि विजनरी भी है। इसे देखते हुए यह कहना तर्कसंगत लगता है कि ‘जेन-जी’ की राजनीति पारंपरिक ‘लेफ्ट’ और ‘राइट’ से आगे निकलकर मूल्य आधारित और वैश्विक है। हालांकि, यह ऐसे ही चलती रहेगी और इसके अंतिम परिणाम क्या होंगे, यह कहना अभी मुश्किल है।
वैसे श्रीलंका की सरकार को पदच्युत करने से लेकर बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार को सत्ता से बाहर करना सभी ने देखा, लेकिन क्या इन देशों में उसी प्रकार से व्यवस्था परिवर्तित हो पाई, जैसी आंदोलनकारियों की परिकल्पना में थी। स्पष्टतया नहीं। सामंतवाद से राज्य-राष्ट्रवाद और राज्य-राष्ट्रवाद से राष्ट्रवाद के वर्तमान दौर तक जितनी भी क्रांतियां अथवा आंदोलन या फिर संघर्ष व्यवस्था परिवर्तन को लेकर हुए, उनमें युवा अंततः असफल ही रहा। फिर ‘जेन जी’ से कितनी उम्मीद की जानी चाहिए? फिलहाल, फ्रांस व अमेरिका की क्रांतियों को प्रेस और विचारों के प्रसार ने संभव बनाया था और अरब स्प्रिंग को सोशल मीडिया ने। लेकिन, इतिहास गवाह है कि युवाओं के आंदोलनों का परिणाम सदैव ‘बुर्जुआ वर्ग’ ने अपने हिस्से में कर लिया और सत्ता हासिल करने में सफल हो गया। यह सच है कि 18वीं सदी में वर्साय में लुई 16वें के महल के सामने खड़े होकर भीड़ तब भी रोटी मांग रही थी और आज भी।